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विचारधारा में गिरावट और माओवाद के अंदर जातिगत संघर्ष नक्सलवाद को खोखला कर रहा है

नक्सली नेताओं की कथनी और करनी में भेद, माओवाद में जातीय वर्चस्व की लड़ाई और सरकार द्वारा चलाया जा रहा बहुआयामी मोर्चे पर प्रयास राज्य में नक्सलियों की कमर तोड़ने में बहुत हद तक कामयाब हो पाया है

Updated On: Dec 02, 2018 04:41 PM IST

Pankaj Kumar Pankaj Kumar

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विचारधारा में गिरावट और माओवाद के अंदर जातिगत संघर्ष नक्सलवाद को खोखला कर रहा है

लातेहार की तरह झारखंड के अन्य जिलों में भी नक्सली बेहद कमजोर दिखने लगे हैं. नक्सली विचारधारा लोगों के बीच आकर्षण खोता जा रहा है. राज्य में नक्सली विचारक इक्के-दुक्के ही शेष रह गए हैं जो लोगों को प्रभावित कर पाने में नाकाम साबित हो रहे हैं.

आंकड़े भी इस बात की तस्दीक करते हैं कि राज्य में पिछले 3 वर्षों में नक्सली वारदात की संख्या में लगातार गिरावट हुई है. साल 2016 में नक्सली वारदात (Left Wing Extremism) की संख्या 196 थी. वहीं यह संख्या 2017 में कम होकर 186 हो गई और 2018, अक्टूबर तक घटकर 94 रह गई है जो कि पिछले दो साल की तुलना में लगभग आधी है.

आर्थिक नकेल कसने से नक्सलियों पर अंकुश लगाने में मिली कामयाबी 

दरअसल नक्सलियों की विचारधारा और गतिविधियों पर अंकुश लगने के पीछे उन पर आर्थिक नकेल कसने में मिली कामयाबी एक बड़ी वजह बताई जा रही है. नक्सलियों द्वारा टैक्स के रूप में वसूला गया पैसा सुरक्षा एजेंसियों के द्वारा पकड़े जाने और जब्त किए जाने की वजह से उन्हें लगातार कमजोर करता जा रहा है. साल 2016 में 3.02 करोड़ और साल 2017 में 1.41 करोड़ और अक्टूबर 2018 तक 38.98 लाख लेवी मनी बरामद कर सुरक्षा एजेंसियों ने नक्सलियों पर जबरदस्त आर्थिक प्रहार किया है.

एक के बाद एक लगातार मिल रही कामयाबी से सुरक्षा एजेंसियां प्रोएक्टिव रोल अपनाने लगी हैं. नक्सलियों को उनके गढ़ में जाकर मारने का सिलसिला 2016 से बदस्तूर जारी है. 2016 में उनके गढ़ में घुसकर सुरक्षा एजेंसियों द्वारा 1 बंकर ध्वस्त किया गया था जो साल 2018 अक्टूबर तक बढ़कर 8 हो गया है. यही हाल नक्सली कैंप का भी है. अक्टूबर 2018 तक राज्य में 3 नक्सली कैंप ध्वस्त किए जा चुके हैं.

Naxal Police Camp In Jharkhand

झारखंड में सुरक्षाबलों की लगातार दबिश की वजह से नक्सलियों के पांव उखड़ने लगे हैं

सुरक्षा एजेंसियों का रोल नक्सली हिंसा की कब्र खोदने में सहायक 

राज्य में पुलिस मुठभेड़ भी पिछले 3 वर्षों में क्रमश: 63, 38 और 48 की संख्या में हुई हैं. जाहिर है आंकड़े इस बात की तस्दीक करते हैं कि सुरक्षा एजेंसियों का रोल नक्सली हिंसा की कब्र खोदने में किस हद तक सहायक हुआ है.

जानकार मानते हैं कि विचारधारा लगभग मृतप्राय हो चुकी है. कुछ लोग कई मुकदमों में नामजद होने की वजह से नक्सली चोला ओढ़े घूम रहे हैं वहीं कुछ नक्सली नाम का चोला ओढ़ पैसा बनाने और निजी दुश्मनी निकालने में लगे हुए हैं.

कभी नक्सली समर्थक रह चुके रमा सिंह कहते हैं कि नक्सली नेताओं की कथनी और करनी में भेद, माओवाद में जातीय वर्चस्व की लड़ाई और सरकार द्वारा चलाया जा रहा बहुआयामी मोर्चे पर प्रयास राज्य में नक्सलियों की कमर तोड़ने में बहुत हद तक कामयाब हो पाया है.

दरअसल राज्य में यह आम चर्चा है कि नक्सली नेता अपने बच्चों को बड़े-बड़े कॉलेजों और शिक्षण संस्थानों में दाखिला दिलाकर पढ़ाते-लिखाते हैं. वहीं आम कार्यकर्ता और उसका परिवार जंगलों की खाक छानते-छानते अपनी जान यूं ही गंवा बैठता है.

कुछ बड़े नक्सली विचारक अरविंद कुमार सिंह उर्फ निशांत का बेटा केमिकल इंजीनियर है. वहीं कुछ और माओवादियों के नाम लोगों की जुबान पर आम हो चले हैं जिनके बच्चे अच्छे कॉलेजों में दाखिला लेकर पढ़ाई कर रहे हैं.

झारखंड के एडीजी राज कुमार मल्लिक कहते हैं कि राज्य में नक्सली नेताओं में जातिगत आधार पर वर्चस्व की लड़ाई सर्वविदित है. गिरिडीह से संथाल परगना को छोटा परगना जोड़ता है. यहां कई संथाल नेता भी हैं. चतरा में तृतीय प्रस्तुती कमेटी का बनना और गंजू का एमसीसी से निकलना माओवादियों में जातीय संघर्ष की सारी हकीकत की कलई खोल देता है.

लातेहार में भी माओवादियों के बीच यादव और ट्राइबल के बीच वर्चस्व की लड़ाई जगजाहिर है. नक्सली जीतन सिंह खैरवार का सरेंडर किया जाना जातीय संघर्ष का ही परिणाम रहा है.

R K Mallick

राज कुमार मल्लिक

नक्सल प्रभावित जिलों में दूसरे चरण का विकास कार्य करने में जुटी सरकार

फिलहाल भारत सरकार नक्सली उग्रवाद से प्रभावित जिलों में दूसरे चरण का विकास कार्य करने में जुटी है. मूलभूत सुविधाओं को चुस्त-दुरुस्त करने से लेकर स्कूल, कॉलेज, मोबाइल टावर और रेलवे नेटवर्क फैलाने को लेकर काम करने का प्रावधान है.

गृह मंत्रालय से मिली जानकारी के मुताबिक भारत सरकार झारखंड में उग्रवाद से प्रभावित जिलों में दूसरे चरण में 654 पोस्ट ऑफिस और 1054 मोबाइल टावर स्थापित करने जा रही है. भारत सरकार पहले चरण में 331 पोस्ट ऑफिस और 816 मोबाइल टावर स्थापित कर चुकी है. इन प्रभावित जिलों में 16 आईटीआई कॉलेज प्रस्तावित हैं जिनमें से 5 बनकर तैयार हैं. वहीं 20 स्किल डेवलपमेंट सेंटर प्रस्तावित है जिनमें 14 बनकर तैयार हैं.

भारत सरकार राज्य के उग्रवाद से प्रभावित इन जिलों में 96 बैंको शाखाएं, 394 एटीएम और 3022 बैंकिंग कॉरेस्पोंडेंट बहाल कर चुकी है.

इस सबके अलावा अति उग्रवाद से प्रभावित जिले के लिए देश के 30 जिलों के लिए कुल 1000 करोड़ का विशेष प्रावधान है. जिसके तहत वहां के डीसी या डीएम जिले के विकास के मद में जरूरत के मुताबिक खर्च करने का फैसला कर सकते हैं.

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