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क्या रांची में सांप्रदायिक तनाव फैलाने में सिर्फ सोशल मीडिया जिम्मेदार है?

रांची में पिछले कुछ दिनों से तनाव का माहौल है. इस दौरान सांप्रदायिक झड़प की तीन घटनाएं हुई हैं

Debjani Chakraborty Updated On: Jun 14, 2018 01:26 PM IST

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क्या रांची में सांप्रदायिक तनाव फैलाने में सिर्फ सोशल मीडिया जिम्मेदार है?

रांची में पिछले कुछ दिनों से तनाव का माहौल है. इस दौरान सांप्रदायिक झड़प की तीन घटनाएं हुई हैं. पहली घटना 10 जून को हुई. उस दिन शहर के हिंदपिरी इलाके के मेन रोड पर स्थित भीड़-भाड़ वाले ईद-बाजार में मौजूद भीड़ का उस ग्रुप से झगड़ा हो गया, जो मोदी सरकार के चार साल पूरे होने पर बाइक रैली निकालकर जश्न मना रहा था. एक बाइक की किसी महिला से टक्कर हो जाने के बाद झगड़ा शुरू हुआ.

सोशल मीडिया पर इस संबंध में ताबड़तोड़ पोस्ट डाले जाने और किसी धर्मगुरु की मौत की अफवाह फैलने के कारण मामला गरमा गया. इस इलाके में तकरीबन 4 घंटे तक सांप्रदायिक रूप से उथल-पुथल वाला माहौल बना रहा. बाद में उसी दिन शाम को मदरसा से लौटते वक्त नगड़ी में (शहरी का बाहरी इलाका) एक संप्रदाय के दो धर्मगुरुओं पर हमला किया गया और उन्हें कथित तौर पर खास 'देवता' का नाम बोलने पर मजबूर किया गया, जिससे सांप्रदायिक माहौल और गरमा गया. घटना के चार दिन बीत जाने के बाद भी पूरे इलाके में तनाव का माहौल बरकरार है और इलाके में 100 से भी ज्यादा पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया है. इसी दौरान एक मंदिर में प्रतिबंधित मीट पाए जाने की अफवाह फैलने के बाद दो समूहों के बीच पथराव की दो घटनाएं भी हुईं.

अफवाहों ने तनाव को दी हवा

इस घटना के वक्त गौरव पांडे रांची के डेली मार्केट स्थित मोबाइल एक्सेसरीज की एक दुकान में मौजूद थे. उन्होंने हिंदपिरी की घटना को कुछ इस तरह से बयां किया, 'जिस वक्त यह पूरा मामला शुरू हुआ, उस वक्त मैं अपने फोन के लिए टेंपर्ड ग्लास खरीद रहा था. मैं दूर से जय श्री राम के नारे सुन रहा था. दुकानदार मेरा जानकार था और उसने मुझे तुरंत यहां से निकल जाने को कहा. मुझे तनिक भी अंदाजा नहीं था कि क्या हो रहा है, लेकिन जब जब मैं 20 मिनट बाद घर पहुंचा, तो मेन रोड इलाके में हिंसा भड़क उठी थी. इसके बाद लोगों के मारे जाने के बारे में संदेश फैलाए जाने लगे. हालांकि, इस तरह की बात अफवाह निकली.'

रांची में डिप्टी पुलिस कमिश्नर पद पर तैनात राय महिमापत रे ने बताया, 'बीते रविवार से हर ऐसे मामलों खास तौर पर नगड़ी और हिंदपिरी इलाके में सोशल मीडिया ने अफवाहों को हवा दी. हिंदपिरी में शुरू में छोटे स्तर पर विवाद था, जिसे हल किया जा सकता था. हालांकि, इंटरनेट के जरिये काफी तेजी से मेसेज फैला और अफवाहों ने लोगों के बीच डर का माहौल बना दिया. इलाके में बुधवार रात तक पुलिस और जिला प्रशासन के लोग तैनात थे.'

उन्होंने बताया, 'मंदिर में प्रतिबंधित मीट मिलने संबंधी खबर फैलने के बाद 12 जून को दो समुदायों के बीच पथराव शुरू हो गया. हालात को शांत करने के लिए हमें बड़ी संख्या में पुलिस बल उतारना पड़ा.'

नगड़ी थाने के प्रभारी राम नारायण सिंह का कहना था, 'एक धार्मिक समुदाय द्वारा किसी लड़के की हत्या के बारे में नई अफवाह फैलने के बाद एक और झड़प शुरू हो गई. उसी वक्त शांति बनाए रखने को लेकर बातचीत भी चल रही थी. सोशल मीडिया से शुरू हुई इस बिना सिरपैर वाली इस कहानी के आधार पर कई दुकानों को जला दिया गया और संपत्तियों की जमकर तोड़फोड़ की गई.' बीते 10 जून को दो मौलानाओं (मौलाना अजहर-उल-इस्लाम और उनके दोस्त) पर हमले के सिलसिले में 5 लोगों को हिरासत में लिया गया है. उन्होंने कहा, 'हिरासत में लिए गए लोगों से एफआईआर के आधार पर घटना के बारे में विस्तार से पूछताछ की जा रही है.' मौलाना इस्लाम ने एफआईआर में आरोप लगाया है कि नगड़ी ब्लॉक के अर्गू गांव के पास रात के तकरीबन 10 बजे तकरीबन 20-25 लोगों ने उनकी पिटाई की और उन्हें किसी खास देवता का नाम जपने के लिए मजबूर किया गया.

सोशल मीडिया पर शिकंजा कस रही है पुलिस

पुलिस अब लोगों से कह रही है कि वे सोशल मीडिया पर आने वाले सांप्रदायिक तौर पर भड़काऊ संदेशों को सीधे पुलिस मुख्यालय भेजें, ताकि अफवाह फैलाने वालों पर शिकंजा कसा जा सके. एक सप्ताह पहले शहर के सीनियर एसपी कुलदीप द्विवेदी ने नोटिफिकेशन जारी कर प्रशासन को हजारीबाग में सोशल मीडिया ग्रुप की हरकतों को लेकर चेतावनी जारी की थी. इसमें अफवाह फैलाने के बारे में आगाह किया गया था. चेतावनी जारी कर कहा गया था कि इस वजह से लोगों के बीच तनाव पैदा हो सकता है.

महिमापत रे का कहना था, 'किसी भी तरह के भड़काऊ मेसेज पर सक्रिय होने से पहले लोगों को अपने कॉमन सेंस का इस्तेमाल करना चाहिए. हमने सोशल मीडिया पर आने वाले इस तरह के किसी भी मेसेज के खिलाफ शिकायत दर्ज करने के लिए पुलिस कंट्रोल रूम खोल दिया है. लोग सीधा मेरे आधिकारिक नंबर पर इस तरह के मेसेज का स्क्रीनशॉट भेज सकते हैं। सिटी एसपी और एसडीओ से भी संपर्क किया जा सकता है.'

शांतिपूर्ण रहा है झारखंड का अतीत

बहरहाल, हालात अब काबू में है, लेकिन प्रशासन की तरफ से सख्त निगरानी का काम जारी है. दरअसल, एक सप्ताह पहले भी फेसबुक पर एक संप्रदाय के खिलाफ असभ्य भाषा का इस्तेमाल किए जाने के कारण हजारीबाग (रांची से 95 किलोमीटर दूर) में तीखी झड़प हो गई थी और कई गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया गया था.

झारखंड में सांप्रदायिक घटनाओं में हालिया बढ़ोतरी इस इलाके के सांप्रदायिक सौहार्द के इतिहास के उलट है. शिक्षाविद और पूर्व पत्रकार संतोष किरो कहते हैं, 'तकरीबन एक दशक पहले तक राज्य का माहौल काफी शांतिपूर्ण था. सांप्रदायिक टकराव की घटनाएं नहीं के बराबर हुआ करती थीं. इस तरह की घटनाओं के तहत बड़े स्तर पर झड़प का मामला पहली बार साल 2015 मे देखने को मिला. उस वक्त राम नवमी के दौरान कुछ गाना के बजाए जाने को लेकर बवाल हुआ था.'

उस वक्त लोगों को दो दिनों तक घरों के अंदर रहने को मजबूर होना पड़ा था और तनावपूर्ण हालत की वजह से तमाम स्कूल भी बंद कर दिए गए थे. माहौल को शांत करने के लिए मुख्यमंत्री रघुबर दास को खुद प्रभावित इलाकों का दौरा करना पड़ा था. उस वक्त भी नफरत को फैलाने में सोशल मीडिया के मैसेज का अहम रोल रहा था. इस घटना के बाद 2017 में रांची में दंगे हुए, जिसमें कथित तौर पर प्रतिबंधित मीट बेचने को लेकर पास के रामगढ़ इलाके में अलीमुद्दीन अंसारी की पीट-पीट कर हत्या कर दी गई थी. उसके बाद से वास्तविक और काल्पनिक घटनाओं को लेकर सांप्रदायिक घटनाओं का सिलसिला जारी रहा है.

प्रतीकात्मक तस्वीर.

प्रतीकात्मक तस्वीर.

किरो फिलहाल झारखंड के इतिहास पर एक किताब को लेकर काम कर रहे हैं. उनका कहना है कि कुछ समय पहले तक रांची की तस्वीर पूरी तरह से अलग थी. उन्होंने बताया, '1990 के दशक में जब झारखंड आंदोलन अपने चरम पर था, तो उस वक्त अलग राज्य की मांग की खातिर सभी धार्मिक समुदाय के लोग एक साथ सड़कों पर उतर आए थे. उनके संघर्ष की कहानी एक थी. और इसके बाद दो दशक से भी कम वक्त में ही यही शहर जल रहा है, क्योंकि कुछ गलत तत्व अविश्वास का माहौल पैदा कर रहे हैं. मैंने जिस रांची को बढ़ते हुए देखा है, वह ऐसा नहीं था. यह काफी दुखद है.'

अलग राज्य बनने से पहले 1967 में शहर मे हुए थे दंगे

बहरहाल, झारखंड की राजधानी बनने से पहले 1967 में रांची में सांप्रदायिक दंगे हुए थे, जब यह शहर बिहार का हिस्सा हुआ करता था. उस वक्त उर्दू को दूसरी भाषा का दर्जा देने की मांग को लेकर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) ने शहर में जुलूस निकाला था, जिस पर हमला कर दिया गया था. उस वक्त पूर्वी पाकिस्तान से हिंदू शरणार्थियों के भारत आने का सिलसिला जारी था और इस वजह से देश के पूर्वी हिस्से में सांप्रदायिक तनाव का माहौल था.

किरो भले ही रांची के शांतिपूर्ण अतीत की बात कर रहे हों, लेकिन झारखंड की राजधानी में फिलहाल बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात हैं और उनकी तरफ से हालात की निगरानी का काम जारी है. पुलिस को ईद तक हाई अलर्ट का आदेश जारी किया गया है. ईद 17 जून को मनाए जाने की संभावना है. झारखंड पुलिस के प्रवक्ता वी के श्रीवास्तव ने बताया, 'हम अफवाह फैलाने वालों पर शिकंजा कस रहे हैं. उन सभी पर आईटी कानून के तहत मामला दर्ज कर उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी.'

(लेखिका रांची में स्वतंत्र पत्रकार हैं और 101Reporters.com की सदस्य हैं. यह पोर्टल (101Reporters.com ) जमीनी स्तर पर काम करने वाले संवाददताओं का देशव्यापी नेटवर्क है)

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