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लक्ष्मीबाई की इस खास सहयोगी को देश ने भुला दिया

असल में मुख्यधारा के इतिहासकारों ने झलकारी को लगभग भुला ही दिया, वो जिंदा रही तो सिर्फ स्थानीय लोगों की किवदंतियों और लोक गीतों के सहारे

Updated On: Nov 22, 2017 09:11 PM IST

Nitesh Ojha

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लक्ष्मीबाई की इस खास सहयोगी को देश ने भुला दिया

दलित पिछड़े समाज की महिला, झलकारी बाई ने 1857 के विक्राट स्वतंत्रता संग्राम में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के साथ मिलकर रणभूमि में गदर मचाया था. उस दौर में किसी महिला का, वो भी दलित महिला का ऐसा साहसिक कार्य करना इस समाज को कतई गवारा न था.

ये वो दौर था जब जातियां लोगों की योग्यता का मापदंड और जाति, कुल, गोत्र ही उनकी पहचान होती थी. राजा-रंक, सवर्ण-अवर्ण कोई भी जातिप्रथा से बाहर नहीं था.

महिलाओं की स्थिति तो और भी खराब थी. अपने ही घर में दूसरे दर्जे की नागरिक थीं वे.घर में ही मौजूद अनगिनत देवताओं के भोग का साधन मात्र थी वे. विराट संस्कृति में देवी का दर्जा तो था उनका पर असल में सबसे निचले पायदान पर थीं औरतें.

ऐसी विषम परिस्थितियों में कोरी समाज की एक महिला का सामाजिक अन्याय व अंग्रेजी साम्राज्य के विरोध न सिर्फ खड़ा होना बल्कि लड़ना, तथाकथित समाज के ठेकेदार व धर्म-धुरंधरों को विचलित कर देता था और वह झलकारी के खिलाफ षड्यंत्र रचने से भी नहीं चूकते थे.

झलकारी को बनाया गया था षड्यंत्र का शिकार

झलकारी ऐसे ही एक षड्यंत्र का शिकार हुई थी जब वह उन्नाव द्वार की ओर टीले पर निशानेबाजी का अभ्यास करने गई थी. धोखे से उसकी गोली किसी जानवर को लग गई. डर के मारे उसनें जानवर को देखा भी नहीं और घर की ओर दौड़ गई. उसको आभास हो गया था कि गोली गाय की बछिया को लगी है. इस विचार से ही उसकी सांसे फूलने लगी थी. उसने ये सारा घटनाक्रम पति पूरन को बताया. लेकिन तब तक ये बात गांव में फैल चुकी थी. सब जानते थे कि झलकारी ही टीले पर निशानेबाजी का अभ्यास करने जाती है. आनन-फानन में पंचायत बुलाई गई. सजा पहले से ही तय थी.

गौ हत्या के अपराध में झलकारी और पूरन को समाज से बहिष्कृत कर दिया गया. वह तो खुद गौ हत्या के पाप तले घुट-घुट के मर रहे थे कि कहीं से पता चला कि जिस बछिया को झलकारी की गोली लगी थी वह एक ब्राह्मण की थी. जो मामूली घायल हुई थी. द्वेश से भरे ब्राह्मण और कुछ चिढ़नेवालों ने बछिया को दतिया भिजवा दिया और गौ हत्या का आरोप झलकारी के सिर मढ़ दिया.

पूरन ने यह बात जब रानी लक्ष्मी बाई को बताई तो रानी गुस्से में बोल बैठीं कि अपराधी को सजा अवश्य होगी. लेकिन ब्राह्मण को सजा दे कर रानी पहले से ही संकट से ग्रसित झांसी को और मुसीबत मे नहीं ढकेलना चाहती थीं. आस-पास के ब्राह्मणों की सलाह से झलकारी को ही प्रश्चित करने की सलाह कम सजा दी गई. जिसमें उसे गंगा स्नान कर पंडों को भोजन करवाना था. इस प्राश्चित में झलकारी के सारे जेवर तक बिक गए थे. इस बात का अफशोस रानी को था लेकिन ब्राह्मण को सजा देकर रानी मुसीबत मोल लेना नहीं चाहती थी.

स्वाधीनता की लड़ाई में सभी जाति और धर्म के लोगों को शामिल किया था लक्ष्मीबाई ने

राजा गंगाधर राव के देहांत के बाद अंग्रेजों ने झांसी पर कब्जा करना चाहा और रानी लक्ष्मीबाई ने इसका विरोध किया. बस यहीं जन्म हुआ पराधीनता से स्वाधीनता के विचार का. रानी ने अंग्रेजों से टक्कर लेने के लिए बुन्देला, ठाकुर, क्षत्रिय आदि के साथ काछी, कोरी, तेली, खटीक, अफगान और मुसलमान सभी वर्गों को सेना में भर्ती करने की योजना बनाई.

यह बात ब्राह्मणों के ब्राह्मणत्व और ठाकुरों की ठकुराई को अखर गई और उन्होंने अपना विरोध प्रकट किया. जिसका तर्कपूर्ण जवाब रानी ने दंभ भरते हुए दिया कि अंग्रेजी सेना में कितने एंग्लो इंडियन, ईसाई, मुसलमान, हिंदू, सिख हैं. क्या वह जाति पूछकर तुम्हें ठोकर मारेंगे.चारों तरफ लाशें पड़ी होंगी, उन्हें उठाने वाला कोई न होगा, तब कहां होगी जात, कहां होगा आदमी.

ये बात उन्हें कितनी समझ आई इसका अंदाजा तो नहीं है पर इसके आगे उनकी रानी से कुछ कहने की हिम्मत तो न थी.

महिलाओं को भर्ती करने की जिम्मेदारी झलकारी को दी गई थी. जो  हथियार चलाना जानती थी, बहादुर थी और रानी की खास भी थी.

वैसे पुरुषों से ज्यादा सामाजिक विषमताओं के कीटाणु स्त्रियों में थे. उन्होंने हथियार चलाना तो पूर्णतः मर्दों का काम मान रखा था. जिनमें प्राण देने की हिम्मत तो थी परन्तु अपनी इज्ज़त बचाने हेतु कुए में कूदने तक ही. लेकिन इस बार उन्हें लड़ना था. दुश्मन का सामना करना था. जिसके लिए झलकारी ने उन्हें तैयार किया. उन्हें हथियार चलाना, घुड़सवारी, तलवारबाजी आदि सिखाई. वो जानती थी कि बिना महिलाओं के यह संग्राम अधूरा था.

महिलाओं में साहस और जुनून भरने का काम किया था झलकारी बाई ने

उन्होंने वक्त आने पर ऐसा ही किया. चूडियां तोड़ कर हथियार संभाल लिए थे. नदी, नालों, कुओं और आग में कूदकर जान देने की जगह इस बार दुश्मन की छाती पर डट कर खड़ी थी. इस बार पीठ दिखाकर मरने की जगह लड़ते हुए वीरगति प्राप्त करने का रास्ता उन्होंने चुना. उनमें यह साहस और जुनून भरने का श्रेय झलकारी को जाता है.

जिसने स्वयं अपने पति की मृत्यु के बाद भी मोर्चा संभाल रखा था. किले के चारों तरफ से घिर जाने पर रानी को मांडेर फाटक से सुरक्षित निकलवाने की योजना बनी. अंग्रेजों  का ध्यान उस ओर न जाए इसलिए झलकारी बाई, जनरल ह्यूरोज के सामने रानी लक्ष्मीबाई बनकर चली गई थी. झलकारी बाई की शक्ल रानी से बहुत मिलती थी, इस कारण अंग्रेज भ्रम में पड़ गए थे और रानी अपनी प्रसिद्ध घोड़ी सारंगी पर बैठ मांडेर फाटक से निकल गई थीं.

झलकारी बाई के मृत्यु को लेकर होती हैं दो तरह की बातें

अंग्रेज भ्रम में ही थे कि दुल्हाजू नाम के व्यक्ति ने धोखा दे दिया और यह भेद खोल दिया. यह वही दुल्हाजू था जिसने ओरछा फाटक खोलकर अंग्रेजी सेना को किले के अंदर आने का अवसर दिया था. झलकारी बाई पकड़ी गई. कुछ लोगों का मानना है कि झलकारी को मार दिया गया और कुछ का मानना है कि जनरल ह्यूरोज ने उसकी बहादुरी को देख उसे छोड़ दिया. लेकिन इस बात का कोई साक्ष्य मौजूद नहीं है.

असल में मुख्यधारा के इतिहासकारों ने झलकारी को लगभग भुला ही दिया. वो जिंदा रही तो सिर्फ स्थानीय लोगों की किवदंतियों और लोक गीतों के सहारे.

‌जिस इतिहास ने इस महान स्वतंत्रता संग्राम की परिस्थितियों का निर्माण किया. उसकी निर्मात्री अकेली रानी लक्ष्मीबाई ही नहीं थी, झलकारी बाई भी थी. लेकिन सामाजिक अन्याय और अंग्रेजी साम्राज्य के खिलाफ क्रांति पैदा करने वाली दलित महिला झलकारी बाई को इतिहासकारों ने लगभग नकार ही दिया.

राजनीतिक व्यक्ति समय-समय पर महिला व दलित वर्ग को वोट बैंक मान शोर तो मचाते रहते हैं लेकिन पुरुषप्रधान समाज में आज भी महिलाएं दूसरे दर्जे की नागरिक हैं जो झलकारी की तरह ही उपेक्षा की शिकार हैं.

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