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मुश्किल है जयललिता के जाने से खाली हुई जगह की भरपाई

ऐसा माना जाता है कि वर्तमान में राज्य की राजनीति जया के इर्द-गिर्द घूमती है.

Updated On: Dec 06, 2016 08:07 AM IST

N Sathiya Moorthy

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मुश्किल है जयललिता के जाने से खाली हुई जगह की भरपाई

मुख्यमंत्री जयललिता जयरामन के निधन से जो जगह खाली हुई है, वह सिर्फ तमिलनाडु तक सीमित नहीं है. केंद्र-राज्य संबंधों और केंद्र में क्षेत्रीय दलों के समकालीन समीकरण के लिहाज से देखें तो राष्ट्रीय परिदृश्य में भी एक तरह की शून्यता दिखाई दे रही है जिसकी भरपाई कर पाना बहुत ही मुश्किल होगा.

बदलेगी राजनीति की तस्वीर 

तमिलनाडु की राजनीति और चुनाव अब पहले जैसे नहीं रह जाएंगे. ऐसा माना जाता है कि वर्तमान में राज्य की राजनीति जया के इर्द-गिर्द घूमती है. उनसे पहले उनके राजनीतिक गुरू एमजी रामचंद्रन यानी एमजीआर के बारे में ऐसा कहा जाता था.

हालांकि 1969 में डीएमके पार्टी के करुणानिधि के मुख्यमंत्री बनने के बाद तमिलनाडु की राजनीति के केंद्र में वही रहे हैं. इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो पहले एमजीआर और फिर जया के नेतृत्व में एआईएडीएमके करुणानिधि विरोधी राजनीति के केंद्र में रही है. इस दौरान धर्म और भ्रष्टाचार मुख्य चुनावी मुद्दे रहे. यह अलग बात है कि भ्रष्टाचार एमजीआर और जया दोनों के राज में खूब फला-फूला.

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आज जब जया इस दुनिया में नहीं हैं, यह कहना मुनासिब होगा कि एआईएडीएमके के पास उनका कोई उत्तराधिकारी नहीं है जो अपने बूते चुनाव में जीत दिलवा सके.

यह काम जया ने तमिलनाडु के द्रविड़ प्रभाव वाली राजनीति के बीच अपनी पहचान बनाकर कर दिखाया था. वह भी बिना किसी अन्य पार्टी से सांठगांठ किए. अब ढलती उम्र के साथ खुद करुणानिधि की तबीयत ठीक नहीं रहती और वह डीएमके की अंदरुनी राजनीति में अपने बेटे स्टालिन के के दबदबे से खुद हाशिए पर हैं.

नए समीकरण बनेंगे 

ऐसे में जया के निधन से राज्य में नए समीकरण जन्म ले सकते हैं. हालांकि ये महज संभवानाएं हैं जिनका मूर्तरूप लेना बाकी है.

क्या ये सब संगठित होंगे या तमिलनाडु का राजनीतिक भविष्य अस्थिर होगा. इस पर आने वाले महीनों और हो सकता है वर्षों तक चर्चा चलती रहे. अगर ऐसा है तो क्यों, ऐसा नहीं है तो क्यों नहीं?

जैसे सवाल 22 सितंबर को जया के अस्पताल जाने के दिन से ही बंद कमरों में चर्चा का विषय रहे हैं. कभी-कभार ऐसा भी लगा मानो इस तरह के सवाल उठाने वाले जया के जीते जी कितने निष्ठुर हो गए हैं.

जया का जन्म समृद्ध परिवार में हुआ. उनकी माँ संध्या कैरियर संवारने शाही मैसूर से चेन्नई आ गईं थीं. जया उन्हीं के रास्ते पर चली और किशोरावस्था में ही उनका रुझान फिल्मों की ओर हो गया.

तमिल फिल्मों की लोकप्रिय स्टार

एक्टिंग की शुरुआत के बाद देखते ही देखते वह दक्षिण भारतीय और खासकर तमिल फिल्मों की लोकप्रिय स्टार बन गईं. तब तमिल फिल्मों के निर्माण के लिए कोडम्बकम का नाम कॉलीवुड पड़ गया था. ठीक वैसे ही जैसे बॉम्बे को हॉलीवुड की तर्ज पर बॉलीवुड कहा जाने लगा था.

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एमजीआर की पारखी नजर जया पर पड़ी. तब वह भारतीय सिनेमा के सुपर स्टार थे. यही छवि उन्होंने 1972 में डीएमके से अलग होने के बाद तमिलनाडु की राजनीति में भी कायम रखी.

जया ने साठ के दशक में पहले तो एमजीआर की हीरोईन के रूप में और फिर उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में कभी भी एमजीआर को, अपने निर्देशकों को, अपने चाहने वालों को या मतदाताओं को निराश नहीं किया.

लेकिन जब जिंदगी जीने की बात होती है तो जया अपने स्कूल के दिनों में भी तनहा रहीं. शायद इसलिए कि बचपन में मिले घावों को देखने और मरहम लगाने का वक्त ही उनकी माँ संध्या को नहीं मिला.

और मजबूत बनीं जया

इन तमाम चीजों ने जया को और मजबूत बनाया. पहले एक नेता के तौर पर और फिर मुख्यमंत्री और एआईएडीएमके सुप्रीमो के रूप में.

यह कहना ठीक होगा कि एआईएडीएमके का गठन करने के बाद एमजीआर ने खुद ही अकेलेपन को मजबूत हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया. शायद वह डीएमके और करुणानिधि से अलग होने वाले हर शख्स पर भरोसा नहीं करना चाहते थे.

अकेलेपन के कारण जया बचपन से ही पुस्तकप्रेमी हो गई थीं. इसका असर बाद में दिखा. पहले फिल्म स्टार के तौर पर और फिर एक राजनेता के तौर पर.

गहरी समझ और शानदार प्रस्तुतीकरण या संवाद के बूते बतौर राज्यसभा सांसद, उन्होंने दिल्ली की निष्ठुर राजनीति में सम्मानजक स्थान हासिल कर लिया.

जया ने कई दोस्त बनाए लेकिन किसी को भी अपने समानांतर चलने की छूट नहीं दी. जैसा की एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने बताया था कि यह कला जया ने इंदिरा से सीखी थी जिन्हें वह अपना आदर्श मानती थीं.

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ऐसा रोजमर्रा के कामकाज में भी दिखता था. जया अपनी ही पार्टी के उन नेताओं को नहीं बख्शती थीं जो अपनी छवि उनसे बड़ा दिखाने की हिमाकत करते थे.

तमिलनाडु के मौजूदा कांग्रेस अध्यक्ष एस तिरुनावुक्करासर ऐसे ही एक उदाहरण हैं जो कभी एआईएडीएमके में अहम भूमिका निभाते थे. हालांकि वे अकेले ऐसे नेता नहीं हैं.

अभी जया के अंतिम दर्शन के लिए पार्टी सदस्यों और समर्थकों का हुजूम जमा है. वे भी जब उनका जिक्र करेंगे तो आत्मविश्लेषण करते हुए फुसफुसाहट में इस सवाल को उठाएंगे.

अगर करुणानिधि विरोध की राजनीति को अलग कर दें जिसमें एमजीआर ने महारत हासिल कर ली थी तो जया ने और किया क्या या वो किसके लिए लड़ीं? अगर शालीनता से कहा जाए तो कुछ भी नहीं.

जया और एआईएडीएमके ने एक तरफ से और डीएमके ने दूसरी तरफ से पूरे राज्य को आपस में बांट लिया और इस तरह दशकों तक अखिल तमिल राजनीति दोनों धुरी के बीच घूमती रही.

शानदार प्रदर्शन

करिश्मा दोनों धुरी के पास नहीं था. लेकिन वर्षों की मेहनत से राजनीतिक धार जरूर प्राप्त कर ली थी जो किसी के पास नहीं था.

खास तौर पर जो टाइमिंग और जिस उद्देश्य को लेकर वे आगे बढ़े उस दिशा में प्रयोग करने वाला और कोई था ही नहीं.

इस लिहाज से एमजीआर के निधन के बाद जो स्थान रिक्त हुआ उसे भरने के लिए जया सबसे उपयुक्त दावेदार थीं. वह भी तब जब पार्टी जया और एमजीआर की विधवा जानकी रामचंद्रन के बीच बंट चुकी थी.

अगर जानकी के पास सबसे कम समय तक सीएम बनने का संदिग्ध रिकॉर्ड रहा तो जयललिता के पास लगातार दो विधानसभा चुनाव जीतने का शानदार रिकॉर्ड रहा. जया ने राजनीतिक गठबंधन का इस्तेमाल भी अपने लिए किया.

प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहराव और अटल बिहारी वाजपेयी से रिश्ते इसके उदाहरण हैं. वह कभी भी उन्हें चौंकाने में संकोच नहीं करती थी.

चाहे तब राजनीतिक गठजोड़ में सबसे ज्यादा फायदा एआईएडीएमके को मिल रहा हो पर जया पार्टी हितों के लिए टकराहट में विश्वास रखती थीं.

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हालांकि इसका बुरा असर उन पर और पार्टी पर भी दिखा. 1952 में कुमारस्वामी राजा के बाद वह पहली सीएम बनीं जो 1996 में न सिर्फ विधानसभा चुनाव हार गईं बल्कि धरमपुरी जिले की अपनी बरगुर सीट भी नहीं बचा पाईं.

इसके बावजूद वह डटी रहीं. उदाहरण 2014 रहा. जब पूरा देश मोदी के पक्ष में था तब तमिलनाडु में जया ने डंका बजाया. चेन्नई स्थित पोज गार्डन के उनके घर में हर नए पीएम का स्वागत हुआ. वह पार्टी कैडर को रिझाना जानती थीं. 1989 में जब जानकी भी चुनाव लड़ रही थीं, जया ने पार्टी कैडरों को अपनी ओर कर लिया.

अपनी हठधर्मिता और निश्चय के कारण जयललिता विवादों में भी फंसी. उनके खिलाफ कई मुकदमे हुए और बाद की अवधि में ज्यादा वक्त कोर्ट कचहरी के चक्कर लगाने में बीता. इसके बावजूद उनके चाहने वालों की तादाद में कमी नहीं आई. लोग उनकी एक झलक पाने को बेताब हो जाते चाहे वो इसके लिए तैयार हों या नहीं.

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