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जय शाह मानहानि मामला: अदालतों में सुनवाई अभिव्यक्ति की आजादी के साथ होनी चाहिए

ये विडंबना ही है कि बिना एक पक्ष को सुने ही आदेश जारी कर दिया गया

Utkarsh Srivastava Updated On: Oct 23, 2017 11:08 AM IST

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जय शाह मानहानि मामला: अदालतों में सुनवाई अभिव्यक्ति की आजादी के साथ होनी चाहिए

बोलने की आजादी और इज्जत की आजादी के बीच जंग लंबे वक्त से छिड़ी हुई है. अदालतें अक्सर दोनों के बीच मुश्किल से तालमेल बनाने की कोशिश करती हैं. इसके लिए वो कानून का सहारा लेती हैं. ऐसा करने के लिए कोर्ट अक्सर किसी खबर के खिलाफ शिकायत को सुनते हैं. फिर वो दूसरे पक्ष को भी सुनते हैं. फिर कोर्ट तय करते हैं कि विवादित मीडिया रिपोर्ट को हटाया जाना चाहिए या नहीं. और इसके लिए क्या हर्जाना होना चाहिए.

लेकिन, बदकिस्मती से हाल के दिनों में अदालतें इस तय रास्ते से भटकती दिखी हैं. इसकी ताजा मिसाल जय शाह का केस है. अदालत ने ‘द वायर’ नाम की वेबसाइट को जय शाह के कारोबार के बारे में कुछ भी लिखने से रोक दिया. दिलचस्प बात तो ये है कि ये विवाद जिस लेख की वजह से शुरू हुआ, वो आज भी वेबसाइट पर मौजूद है. दूसरी बात ये है कि अदालत ने ‘‘द वायर’’ का पक्ष सुने बगैर ही ये फरमान जारी कर दिया.

जिन लोगों को ये लग रहा है कि अदालत का ये आदेश कोई नई मिसाल नहीं है, वो गलतफहमी के शिकार हैं. बोलने की आजादी के खिलाफ अदालतें कई बार ऐसे आदेश दे चुकी हैं. ‘द वायर’ को ही दूसरी बार अदालत के कहने पर अपनी वेबसाइट से लेख हटाने पड़े हैं. इससे पहले अदालत के कहने पर ‘द वायर’ को सांसद राजीव चंद्रशेखर के खिलाफ दो लेख हटाने पड़े थे.

इसी तरह योग गुरू रामदेव ने जगरनॉट्स बुक के खिलाफ कोर्ट से आदेश हासिल किया था कि वो उनकी जिंदगी पर आधारित किताब न बेचे. इसी तरह आईआईपीएम के अरिंदम चौधरी ने, आउटलुक, द कारवां, फेकिंग न्यूज, काफिला, द इंडियन एक्सप्रेस, द इकोनॉमिक टाइम्स, कैरियर 360, फर्स्टपोस्ट और दूसरी कई मीडिया कंपनियों के खिलाफ ग्वालियर की अदालत से ऐसा आदेश हासिल किया था.

Baba Ramdev

ये तो वो मामले हैं जो राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बने. द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ कर्नाटक में मीडिया के खिलाफ अदालतों ने ऐसे 45 आदेश जारी किए हैं.

आखिर क्या है 'एक्स-पार्टे' या इकतरफा आदेश?

इकतरफ़ा आदेश या 'एक्स-पार्टे' ऑर्डर इंसाफ की प्रक्रिया के खिलाफ है. कानून का राज कायम रहे इसके लिए इंसाफ की कुदरती प्रक्रिया का पालन होना ही चाहिए. इसके लिए विवाद होने की सूरत में किसी को भी अपनी बात कहने का हक मिलना चाहिए. इंसाफ करने वाले को निष्पक्ष होना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार अपने आदेशों में ये बातें कही हैं.

लेकिन 'एक्स-पार्टे' ऑर्डर किसी शख्स को अपनी बात रखने के अधिकार से वंचित कर देता है. हालांकि ये गैरकानूनी नहीं है. कोड ऑफ सिविल प्रोसीजर 1908 के रूल 3 के ऑर्डर XXXIX के मुताबिक अदालतें ऐसे इकतरफा फरमान सुना सकती हैं. लेकिन ये कोई जरूरी नियम नहीं है. अदालतों को चाहिए कि किसी की अर्जी पर कोई भी आदेश देने से पहले वो दूसरा पक्ष भी सुनें.

मतलब ये कि अदालतें ऐसे आदेश उसी सूरत में दें जब देर होने पर, नोटिस जारी करने और दूसरे पक्ष को सुनने से मामले पर फर्क पड़े. अदालत को 'एक्स-पार्टे' आदेश जारी करने की वजह भी बतानी जरूरी है.

सुप्रीम कोर्ट ने किशोर सिंह रतन सिंह जाडेजा बनाम मारुति कॉर्प, मोर्गन स्टैनले बनाम कार्तिक दास और रामरामेश्वरी देवी बनाम निर्मला मामलों में ये गाइडलाइन तय की थीं.

इन गाइडलाइन के बुनियादी पहलू कुछ इस तरह थे

शिकायतकर्ता को भारी नुकसान होने का डर है-किसी की प्रतिष्ठा वक्त के साथ बढ़ती है. वो एकबारगी तय नहीं होती. इसके बढ़ने-घटने के पीछे कई वजहें होती हैं. इसीलिए कोई भी प्रकाशन किसी की प्रतिष्ठा को लगातार नुकसान पहुंचाए, ये जरूरी नहीं. अगर कोई प्रकाशन ये कहे कि वो एक माफीनामा भी प्रकाशित करेगा, तो इससे किसी की इज्जत को हुए नुकसान की भरपाई काफी हद तक हो जाती है.

इन मामलों में अगर खबरें प्रकाशित करने वाले गलत पाए जाते हैं, तो वो तमाम तरीकों से अपनी गलती सुधार सकते हैं.. माफी नामा दे सकते हैं. इससे किसी की प्रतिष्ठा को स्थायी नुकसान होने का डर नहीं होता. अगर ऐसा है, तो अदालतों को इकतरफा आदेश नहीं देना चाहिए.

सुविधा का पलड़ा शिकायतकर्ता की तरफ झुका होना चाहिए-इसका मतलब ये कि वादी के कहने पर निषेधाज्ञा या रोक जारी करने से वादी को ज्यादा नुकसान हो सकता है. जय शाह के मामले में अदालत ने ‘द वायर’ के अपनी बात रखने के बुनियादी हक की अनदेखी की. ‘द वायर’ ने अपनी सफाई में अपनी वेबसाइट पर अपना पक्ष रखा होता. लेकिन अदालत ने किसी और लेख के छापने पर रोक लगाकर एक तरह से सेंसरशिप की. ये कानून के खिलाफ है. ये नाइंसाफी है.

दूसरे मामलों में भी अगर एक बार लेख छप गया है, तो अदालत कुछ खास नहीं कर सकती. जैसे कि आल्टन्यूज नाम की वेबसाइट ने बताया भी था कि राजीव चंद्रशेखर पर ‘द वायर’ का लेख एक चेक वेबसाइट पर दर्ज था. ऐसे मामलों से सही तरीके से निपटना चाहिए. आरोपी पर भारी जुर्माना लगाना एक विकल्प हो सकता है. लेकिन इकतरफा आदेश से तो बोलने की आजादी ही खतरे में पड़ जाती है.

कारोबारी मामलों में 'एक्स-पार्टे' ऑर्डर आम हैं. खास तौर से बौद्धिक संपदा से जुड़े विवाद में. इनके खिलाफ ठोस तर्क होने के बावजूद ऐसे मामलों में नुकसान की गुंजाइश कम होती है. क्योंकि ऐसी निषेधाज्ञा बिना किसी खास नुकसान के हटाई जा सकती है. पारिवारिक विवाद के मामलों में भी इकतरफा आदेश नुकसानदेह नहीं. क्योंकि इससे बहुत सारे लोगों की सेहत पर असर पड़ता है.

लेकिन बोलने की आजादी से जुड़े मामलों में ऐसे आदेश ज्यादा कारगर नहीं होते. क्योंकि सूचना तो पहले ही काफी दूर तक पहुंच चुकी होती है. फिर प्रतिष्ठा को नुकसान की भरपाई जुर्माने या माफीनामे से हो सकती है.

निषेध का आदेश सीमित समय के लिए होना चाहिए-जय शाह के मामले में ‘द वायर’ मामले के निपटारे तक जय शाह को लेकर कोई नया लेख नहीं छाप सकती. ये बात दिक्कत तलब है. सुप्रीम कोर्ट ने रामरामेश्वरी मामले में कहा था कि ऐसे निषेध के आदेश एक हफ्ते या थो़ड़े और वक्त के लिए ही होने चाहिए. यानी सुप्रीम कोर्ट ये चाहता था कि ऐसे फरमान तय समय के बाद कोर्ट वापस ले लें. सर्वोच्च अदालत ने आशंका जताई थी कि अगर ये फरमान लंबे वक्त तक जारी रहते हैं तो इनसे बहुत नुकसान हो सकता है. फिर ऐसे आदेश खारिज कराने में दांतों पसीने आ जाते हैं.

जय शाह के मामले में निचली अदालत ने सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन का पालन नहीं किया. आगे चलकर इस बात की मिसाल दूसरे लोग भी दे सकते हैं. इससे इंसाफ की प्रक्रिया पर असर पड़ेगा. लोग अपने फायदे के लिए ऐसी रियायत लंबे वक्त के लिए ले सकते हैं.

आरोपी को अपनी बात कहने के लिए कम वक्त दिया जाना चाहिए-सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इकतरफा आदेश कम से कम पारित हों, तो ही अच्छा. जय शाह के मामले में अदालत पहले ही दो बार सुनवाई स्थगित कर चुकी है. पहली बार दिवाली की छुट्टी के चलते. और दूसरी बार जय शाह के वकील के हाजिर न होने पर. इस दौरान ‘द वायर’ का पक्ष आराम से सुना जा सकता था क्योंकि उसके वकील अदालत में मौजूद थे. साफ है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के खिलाफ जाकर जय शाह के पक्ष में कोर्ट ने आदेश जारी किया.

वायर के संपादक सिद्धार्थ वरदराजन और एम के वेणु

वायर के संपादक सिद्धार्थ वरदराजन और एम के वेणु

रोक जारी करने पर अदालत को साफ कर देना चाहिए कि अगर केस खारिज होता है तो शिकायत करने वाले को पूरा हर्जाना भरना होगा- सुप्रीम कोर्ट ने ये गाइडलाइन इसलिए तय की ताकि इकतरफा आदेश बात-बात पर न जारी हों. हालांकि हमारे पास अहमदाबाद की अदालत के आदेश की कॉपी नहीं है. मगर मीडिया रिपोर्ट्स पर यकीन करें तो अदालत ने इस गाइडलाइन की भी अनदेखी की.

अगर 'एक्स-पार्टे' आदेश जारी भी होता है तो केस जल्द से जल्द निपटाया जाना चाहिए-सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जैसे ही मामले में आरोपी पेश हो जाता है, उसके बाद फौरन से पेशतर ये मामला निपटा दिया जाना चाहिए. लेकिन जय शाह के मामले में बचाव पक्ष तो अदालत में मौजूद था, आरोप लगाने वाले ही नहीं थे. ऐसे में ‘द वायर’ के खिलाफ पाबंदी का आदेश इस गाइडलाइन के भी खिलाफ है.

विडंबना

ये अचरज की ही बात है कि बोलने की आजादी से जुड़े एक विवाद में दूसरे पक्ष की बात सुने बगैर ही आदेश जारी कर दिया गया. ये सुप्रीम कोर्ट की तमाम गाइडलाइन के तो खिलाफ है. इस मामले के हर पहलू पर विस्तार से चर्चा हो चुकी है.

फिर ऐसी रोक के आदेश का कुछ खास असर नहीं होता. जब ‘द वायर’ ने अपना लेख छापा था तो उसे पहले कुछ खास पाठकों ने ही पढ़ा. फिर ये मामला तब चर्चित हुआ जब राष्ट्रीय स्तर पर तमाम मीडिया कंपनियों ने इसे कवर किया. ये इस बात की साफ मिसाल है कि किसी भी बात को जितना ही दबाने की कोशिश होती है, उतना वो फैलती जाती है. इसे द 'स्ट्रेसैंड इफेक्ट' कहते हैं.

किसी को भी ये लगता है कि किसी अखबार या न्यूज एजेंसी या मीडिया हाउस ने उसकी बदनामी की है, तो उसे मामले को कोर्ट में ले जाने का पूरा हक है. लेकिन इसके बाद हर प्रक्रिया को कानून के तहत ही निपटाया जाना चाहिए. दोनों पक्षों की बात सुनी जानी चाहिए. वरना अभिव्यक्ति की आजादी के बुनियादी अधिकार का उल्लंघन होता है. इसके दूरगामी नतीजे होते हैं. क्योंकि वो लोग भी बेखौफ होकर लिखने से डरते हैं, जिनका ऐसे मामलों से कोई लेना-देना नहीं होता.

सुप्रीम कोर्ट ने इस नुकसान का अंदाजा पहले ही लगा लिया था. अभिव्यक्ति की आजादी की रक्षा के लिए निचली अदालतो को भी इस बात का खयाल रखना चाहिए. ताकि लोकतंत्र में खुलकर बोलने का हक बना रहे.

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