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भारत के इस दोस्त का संविधान महज हफ्ते भर में तैयार हो गया

दोनों ही देशों के संविधान के लिए यह कहा जाता है कि दोनों ने राजनीतिक वैचारिकता में कट्टर दक्षिणपंथ से दूरी बनाई लेकिन अपनी अवधारणा में कट्टर वामपंथ की भी छाप नहीं पड़ने दी

FP Staff Updated On: Jan 26, 2018 11:30 AM IST

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भारत के इस दोस्त का संविधान महज हफ्ते भर में तैयार हो गया

दिसंबर 1946 में भारतीय संविधान को तैयार करने वाली संविधान सभा अपने काम करने के लिए बाजुएं चढ़ा रही थी. वहीं ठीक आठ महीने पहले एक और देश था, जहां संविधान को संसद के सामने पेश किया गया. यह देश था जापान, जिसके दस्तावेज़ का नाम है 'द डायट'.

भारत में संविधान का मसौदा तैयार करने के लिए कश्मीर से कन्याकुमारी तक हर क्षेत्र, हर वर्ग, हर जाति, हर धर्म, हर पेशे के प्रतिनिधित्वों की राय मांगी गई थी. इसके ठीक उलट जापान में यह काम चंद विदेशियों ने मिलकर अंजाम तक पहुंचाया था.

फरवरी 1946 की शुरूआत में करीब 24 अमेरिकी अधिकारी जिसमें सैन्य अफसर भी शामिल थे, जापान के टोक्यो में मिले. उसके बाद सिर्फ एक हफ्ते के भीतर उन्होंने संविधान का ऐसा मसौदा तैयार किया जो उनके मुताबिक जापानवासियों के लिए एकदम मुनासिब था.

गौरतलब है कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हिरोशिमा-नागासाकी पर परमाणु हमले के बाद जापान को हार का सामना करना पड़ा. अक्ष देश (इटली, जर्मनी, जापान) की पराजय के बाद जापान पर मित्र देशों के सुप्रीम कमांडर का कब्ज़ा रहा. उसी दौरान 3 मई 1947 को जापान ने संशोधित संविधान को अपनाया.

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चंद अमेरिकियों के हाथों तैयार हुए इस संविधान को ही जापान की किस्मत समझ लिया गया. हालांकि भारतीय संविधान को भी अलग अलग देशों के संविधान से प्रेरणा लेकर ही तैयार किया गया है. लेकिन कई मुद्दों पर, जरूरत के मुताबिक उसका भारतीयकरण किया गया है. संविधान सभा में अनगिनत बहस-मुहासिब हुए जिसमें प्रतिनिधित्वों ने अपनी बात रखी. गलत को गलत और सही को सही कहा गया. भारतीय संविधान सभा में लिए जाने वाले फैसलों में अंग्रेज़ों का सीधे तौर पर दख़ल नहीं था.

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वहीं जापान के संविधान में बहस की गुंजाइश न के बराबर रखी गई थी. बताया जाता है कि जापानी संविधान का मसौदा तैयार होने के बाद उसे संसद में पेश किया जाता था. लेकिन छोटे से छोटे बदलाव को भी अमेरिकी अधिकारियों की अनुमति के बिना लागू नहीं किया जा सकता था.

दोनों ही देशों के संविधान निर्माण में खासा अंतर देखने को मिला. जहां एक को तैयार होने में तीन से भी ज्यादा साल लग गए, वहीं दूसरे संविधान का मसौदा हफ्ते में तैयार कर लिया गया. जहां एक को विदेशियों ने तैयार किया, वहीं दूसरे को नागरिकों और उनके प्रतिनिधित्वों ने मिलकर तैयार किया.

इसके बावजूद दोनों देशों के संविधान अपने उदारवादी और मानवतावादी नज़रिए के लिए जाने जाते हैं. दोनों ही देशों के संविधान के लिए यह कहा जाता है कि दोनों ने राजनीतिक वैचारिकता में कट्टर दक्षिणपंथ से दूरी बनाई लेकिन अपनी अवधारणा में कट्टर वामपंथ की भी छाप नहीं पड़ने दी.

(साभार: न्यूज18)

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