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हाय रे जंतर-मंतर! तुम्हारे लिए कौन करेगा आंदोलन?

इस एक जगह ने न जाने कितने लोगों को इंसाफ दिलाया है लेकिन एनजीटी के निर्णय के बाद अभी तक कोई मजबूत आवाज इसके पक्ष में नहीं आई है

Ankita Virmani Ankita Virmani Updated On: Oct 08, 2017 09:22 AM IST

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हाय रे जंतर-मंतर! तुम्हारे लिए कौन करेगा आंदोलन?

एनजीटी ने गुरुवार को जंतर-मंतर के आस-पास सभी धरना प्रदर्शनों पर पाबंदी लगा दी है. एनजीटी ने कहा है कि इसके आस-पास के इलाकों में रहने वाले लोगों को शांतिपूर्ण और आरामदायक ढंग से रहने का पूरा अधिकार है.

समय और ग्रहों की दिशा दिखाने के लिए बनाए गए जंतर-मंतर ने देश के कई बड़े आंदोलनों की दशा और दिशा तय की है. ये गवाह बना कई बड़े आंदोलनों का. इंसाफ के लिए लड़ी गई कई बड़ी लड़ाइयां भी इसी जंतर-मंतर से शुरू हुईं. देश को 29वां राज्य यानी तेलंगाना भी जंतर-मंतर से शुरू हुए आंदोलन ने ही दिया.

निर्भया के इंसाफ की लड़ाई भी इसी जंतर-मंतर से शुरू हुई और देश भर में फैल गई. जवानों को वन रैंक वन पेंशन का अधिकार भी इसी जंतर-मंतर ने दिलवाया. भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे द्वारा शुरू की गई लड़ाई भी इसी जंतर-मंतर ने देखी. हाल के समय का इतिहास देखें तो जंतर-मंतर पर कभी भीड़ द्वारा मारे गए जुनैद, अखलाक के लिए भीड़ जमा हुई तो कभी पत्रकार गौरी लंकेश के लिए.

जहां कुछ मांगें, कुछ लड़ाइयां पूरी हो गईं वहीं कुछ लोग अभी भी अपनी मांगों के पूरी होने की उम्मीद में जंतर-मंतर पर बैठे हैं. कुछ मांगे जायज हैं कुछ बेहद अजीब.

पीएम से शादी की इच्छा रखती हैं ओम शांति

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जंतर-मंतर पर धरने पर बैठीं ओम शांति

पिछले एक महीने से जयपुर से आई ओम शांति कुछ अजीब ही मांग कर रही हैं. पीछे प्रधानमंत्री मोदी की बड़ी से तस्वीर लगा उसके आगे बैठी ओम शांति मोदी जी से शादी करना चाहती है.

जब हमने उनसे कहा कि मोदी जी तो पहले से शादीशुदा हैं तो ओम शांति गुस्सा हो गईं. बोलीं, मैं भी शादीशुदा हूं और वो भी शादीशुदा हैं तो हम दोनों एक दूसरी शादी कर सकते हैं. 1989 में ओम शांति ने शादी तो की पर उसके एक साल बाद ही उनके पति ने उन्हें छोड़ दिया था. वो कहती है उन्हें अब सिर्फ मोदी जी ही समझ सकते हैं.

मनरेगा का फाउंडर मेंबर

साल 2013 से यहां बैठे श्यामलाल भारती खुद को मनरेगा योजना का फाउंडर बताते है. उत्तरप्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के रहने वाले श्याम कहते हैं कि जब तक सरकार उन्हें योजना की पहचान नहीं देगी वो यहीं बैठे रहेंगे.

हमने उनसे कहा कि योजना सालों पहले लागू हो चुकी है और कई परिवारों का भला भी कर रही है. नाम किसी का भी हो क्या फर्क पड़ता हैं? तो गुस्साएं श्यामलाल ने कहा कि आपके जीवन की संपत्ति हम किसी और को दे दें तो क्या आप चुप बैठे रहेंगे? जिस पौधे को हमने लगाया क्या उस पेड़ की छांव हम नहीं लेना चाहेंगे?

भारत को मिले इंसाफ

ratan lal sahu

रत्न लाल साहू

श्यामलाल से मिलकर जब हम आगे चले तो यहां बैठे थे रत्न लाल साहू. रत्न लाल दिसंबर 2015 से यहां भारत माता को इंसाफ दिलाने बैठे है. इनका कहना है कि भारत माता और ये देश र्निजीव नहीं है.

इनकी मांग है कि हर संसदीय क्षेत्र में राष्ट्र मंदिर निर्माण होना चाहिए और इस मंदिर में भारत माता की मूर्ति लगनी चाहिए, साथ ही भारत के नक्शे पर भी भारत माता की तस्वीर होनी चाहिए. रत्न लाल यही नहीं रुके. उन्हें शिकायत इस बात से भी है कि हमारे देश का संविधान 13 राष्ट्रों का उतारी हुई नकल है और जब तक इस देश का संविधान लागू नहीं होगा तब तक भारत माता की आत्मा को सूकून नहीं मिलेगा.

जूता मारो आंदोलन!

अखिल भारतीय जूता मारो आंदोलन के पोस्टर पर अपनी तस्वीर लगा कर उसके आगे बैठे मच्छिन्द्रनाथ सूर्यवंशी 11 साल से जंतर-मंतर पर बैठे है. महाराष्ट्र के लातूर से आएं मच्छिन्द्रनाथ से हमने पूछा कि जूता मारो आंदोलन क्यों? तो उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचारी का भूत बातों से नहीं मानता, जूते से मानता है .रिश्वतखेरी की बीमारी दवा से दुरुस्त नहीं होती, जूता सूंघाने से दुरुस्त होती है, इसलिए जूता मारो आंदोलन. अपने आंदोलन की तुलना वो आजादी के आंदोलन से करते हैं. कहते हैं बड़े आंदोलनों में समय ज्यादा लगता है.

juta maro andolan

1503 दिन से इस जंतर-मंतर पर एक आंदोलन और चल रहा है. आंदोलन बलात्कार के दोष में जेल में बंद आसाराम बापू के लिए. फ़र्स्टपोस्ट हिंदी जब वहां पहुंचा तो आसाराम की तस्वीर के आगे बापू की आरती चल रही थी. विश्व बापू के जयकारे लग रहे थे. जयकारों में एक जयकारा ये भी था, षड्यंत्रकारियों का विनाश हो, विनाश हो.

इन आंदोलनों के अलावा कुछ आंदोलन और भी थे. कुछ लोग गोरखालैंड की मांग लिए बैठे थे. कुछ संत रामपाल को निर्दोष साबित करने के लिए. कुछ अकेले ही अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं. लड़ाई देशभर में शराब बैन की, लड़ाई गौ माता को बचाने के लिए कानून की. वगैरह वगैरह... जगह बदलने से ये आंदोलन कितने बदलेंगे ये कहना फिलहाल मुश्किल है.

इस एक जगह ने न जाने कितने लोगों को इंसाफ दिलाया है लेकिन एनजीटी के निर्णय के बाद अभी तक कोई मजबूत आवाज इसके पक्ष में नहीं आई है. देखना होगा जिस जगह पर कई आंदोलन जवान हुए उसके लिए कोई आंदोलन करता है या नहीं?

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