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जल्लीकट्टू विवाद: भावनाओं की अनदेखी कर रहा है केंद्र

जल्लीकट्टू को लेकर तमिल-भावनाओं को सुनने से आखिर कौन-सी बात हमें रोक रही है

Garga Chatterjee Updated On: Jan 19, 2017 06:24 PM IST

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जल्लीकट्टू विवाद: भावनाओं की अनदेखी कर रहा है केंद्र

पूरे तमिलनाडु में हजारों लोग विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं. ये लोग खुद ही यहां आ जुटे हैं, उन्हें किसी सियासी पार्टी ने नहीं बुलाया.

मीडिया में सबसे ज्यादा तवज्जो मरीना बीच पर चले विरोध प्रदर्शन को दी जा रही है. मरीना बीच पर चल रहा विरोध-प्रदर्शन भारी-भरकम जान पड़ता है, लेकिन तमिलनाडु की और जगहों जैसे मदुरै, इरोड, सलेम और कोयम्बटूर में हो रहे विरोध-प्रदर्शन की तुलना में वह छोटा ही है.

बात सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित नहीं. लोग कस्बों और गांवों में भी विरोध-प्रदर्शन पर उतारु हैं. पूरा तमिलनाडु एक सुर में आवाज लगा रहा है, ‘हमें चाहिए जलीकट्टू’. यह सांस्कृतिक मांग है तो राजनीतिक मांग भी.

हजारों लोग बीती रात से विरोध-प्रदर्शन में खड़े हैं लेकिन ‘राष्ट्रीय मीडिया’ ने इस विरोध-प्रदर्शन का लाइव टेलीकास्ट नहीं किया. चूंकि मामला दिल्ली का नहीं है तो राष्ट्रीय मीडिया ने मान लिया है कि वह देश के किसी मतलब का नहीं है.

18 जनवरी के दिन जैसे ही चढ़ना शुरू हुआ हर तबके के नौजवान सड़कों पर उतर आये. इनमें छात्र, किसान, आईटी क्षेत्र के पेशवर सभी शामिल हैं. महिलाएं भी बड़ी तादाद में सड़कों पर उतरीं. जैसे ही इनकी आवाज ने गूंजना शुरू किया मीडिया के लिए मामले की अनदेखी करना मुश्किल होने लगा.

मीडिया की मनमानी

तमिलनाडु कोई कश्मीर तो है नहीं जहां स्वतंत्र मीडिया और दूरसंचार के साधनों पर अपनी मनमानी थोपी जा सके. विरोध-प्रदर्शन ने तेवर पकड़े तो ‘राष्ट्रीय मीडिया’ ने बाकी देश को यह समझाने का जिम्मा लिया कि तमिल जनता गुस्से में क्यों है? तमिलनाडु में लोग विरोध-प्रदर्शन पर क्यों उतारु हो उठे हैं.

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जब ऐसे सवाल पूछे जा रहे थे तो ‘राष्ट्रीय मीडिया’ अपनी तरफ से यह भी जोड़ रही थी कि मामला सियासी कतई नहीं है. अब इससे ज्यादा झूठ तो कुछ हो ही नहीं सकता. विरोध-प्रदर्शन तमिलनाडु के इस या उस तबके भर तक सीमित नहीं है- पूरी तमिल जनता एक सुर में आवाज लगा रही है. कश्मीर से कन्याकुमारी को जोड़ने वाली चीजें कहीं ज्यादा हैं, जितनी कि दिल्ली का सत्ता-प्रतिष्ठान आज तक मानता या समझता आया है.

पूरे तमिलनाडु में जलीकट्टू को लेकर विरोध प्रदर्शन तेज है

पूरे तमिलनाडु में जलीकट्टू को लेकर विरोध प्रदर्शन तेज है

गैर-तमिल मीडिया अपनी कल्पना के तंग दायरे के भीतर विरोध-प्रदर्शनों की तुलना मिस्र के तहरीर चौक से कर रहा है. अगर इस मीडिया को स्थानीय मन-मिजाज की गहरी समझ होती और उसकी कल्पना पर एंग्लो-अमेरिकन सोच के रंग ना चढ़े होते तो वे तमिलनाडु के हालिया इतिहास का तनिक जायजा लेते.

उन्हें नजर आता कि विरोध-प्रदर्शन करने वाले लोगों ने अपना मोर्चा किन जगहों पर खोला है. मरीना बीच कोई साधारण जगह नहीं है. यहां सी एन अन्नादुरै का स्मारक है. वे तमिल राजनीति और तमिल-पहचान के प्रतीक-पुरुष हैं.

तमिल जनता पर हिन्दी थोपने के प्रबल विरोधी अन्नादुरैई भारत के संघवाद के निर्माताओं में से एक माने जाते हैं. अगर गैर-तमिल मीडिया ने तमिलनाडु को दिल्ली के चश्मे से नहीं बल्कि तमिल संस्कृति की नजर से देखा तो वह भांप लेती कि अभी चल रहे विरोध-प्रदर्शन की लहर अपने तेवर और तेजी में कुछ वैसी ही है जैसा 1965 के वक्त हिन्दी-विरोधी आंदोलन में देखने को मिला था.

तब केंद्र सरकार देश के गैर हिन्दीभाषी लोगों के मुंह मे जबरिया हिन्दी ठूंसने पर उतारु थी. उस वक्त कई राज्यों में विरोध-प्रदर्शन हुए लेकिन मोर्चे पर सबसे आगे रहा तमिलनाडु. केंद्र ने बड़ी तेजी से कदम उठाये. आनन-फानन में केंद्रीय बल पहुंचे और उस साल तकरीबन 400 तमिल प्रदर्शनकारी मारे गये.

तमिल भावनाओं की अनदेखी

1967 में कांग्रेस को सूबे की जनता ने सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाया. इसके बाद से दिल्ली में कायम किसी भी पार्टी को तमिलनाडु का राज-सिंहासन हासिल नहीं हुआ है. दिल्ली की पार्टियों की तमिलनाडु स्थित शाखा तमिल भावनाओं की नुमाइंदगी में बुरी तरफ नाकाम रही हैं क्योंकि ऐसी पार्टियों की प्राथमिकताएं और विचारधारा कहीं और से तय होती है, उसमें तमिल हितों पर जोर नहीं होता.

1967 से तमिलनाडु की जनता ने तमिल हितों की नुमाइंदगी में दिल्ली से भेजे गये एजेंटों को नहीं बल्कि अपने खुद के प्रतिनिधि चुने हैं. हिन्दी थोपने के विरोध में तमिलनाडु के उठ खड़े होने के कारण ही गैर हिन्दी भाषी राज्य अपनी भाषायी और सांस्कृतिक जमीन को सपाट होने से बचा सके वर्ना दिल्ली ने तो इन राज्यों की भाषा और संस्कृति को मटियामेट करने का बीड़ा ही उठा लिया था.

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यह सब उस एक खास भाषा-समुदाय के फायदे के लिए हो रहा था जो दिल्ली की सत्ता पर हमेशा अपना दबदबा बनाये रखता है.

लोग-बाग अपने घरों से लेकर रात-रात भर सड़कों पर डेरा डाले हैं

लोग-बाग अपने घरों से लेकर रात-रात भर सड़कों पर डेरा डाले हैं

पहले की तरह आज भी जल्लीकट्टू को लेकर हो रहे विरोध-प्रदर्शन के जरिए तमिलनाडु ने हमें मौका दिया है कि हम मनुष्य और पशु के बारे में दिल्ली की सनक के खिलाफ अपने अपने सांस्कृतिक अधिकारों की दावेदारी करें.

दिल्ली की सत्ता तो अपनी सनक में यह तक मान लेती है कि पूरा देश एनसीआर(राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र) ही का विस्तार है. तमिल प्रदर्शनकारियों के केंद्र सरकार के विरोध के तरीके से जाहिर होता है कि वे इस सियासी गुणा-भाग को खूब अच्छी तरह समझते हैं.

महिलाएं भी सड़क पर

जल्लीकट्टू मर्दों का खेल है लेकिन इसके समर्थन में महिलाएं भी भारी तादाद में जुटी हैं. इससे जाहिर होता है मसला सिर्फ जल्लीकट्टू की इस या उस बात की तरफदारी भर का नहीं रह गया है. इसका दायरा कहीं ज्यादा बड़ा है. विरोध-प्रदर्शन में विदेश (अमेरिका, आयरलैंड, मैक्सिको, रुस, मलेशिया आदि) बसे तमिलों की आवाज शामिल है और तमिल सोशल मीडिया पर भी बात खूब फैली है.

तमिल सोशल मीडिया में जानवर को लेकर गढ़े जा रहे व्हाट्सएप्प के संदेश लोगों को आपस में जोड़ने का काम कर रहे हैं, नोएडा की तरह यहां व्हाट्सएप्प के इन संदेशों से लोगों को आपस में बांटने का काम नहीं किया जा रहा.

जल्लीकट्टू को लेकर हो रहे विरोध-प्रदर्शन से जाहिर हुआ है कि बेशक ‘मौज-मस्ती करते महानगरीय युवा’ की छवि को पूरे देश के युवाओं की छवि बताकर पेश किया जा रहा हो लेकिन यह चौखटा देश के सभी युवाओं पर सही नहीं बैठता.

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इस चौखटे से बाहर लाखों की तादाद में ऐसे नौजवान हैं जिनके लिए अपनी संस्कृति की जड़ें मायने रखती हैं और ये युवा दिल्ली-मुंबई में पसर रहे ‘भारतीयता’ के विचार की टोपी पहनने के चक्कर में अपनी तमिल पहचान नहीं गंवाना चाहते.

ये वो लोग हैं जो खूब अंग्रेजी जानते हैं लेकिन जब दिल्ली की मीडिया अंग्रेजी में सवाल पूछती है तो उसका जवाब जान-बूझकर तमिल में होता है. अगर यह बात बेतुकी जान पड़े तो याद कीजिए कि दिल्ली में काबिज अंग्रेजी मीडिया अपने सवाल बिना अनुवाद किए कितनी दफे हिन्दी में पूछती है. समझने की कोशिश कीजिए कि देश की बहुसंख्यक जनता जो हिन्दी नहीं समझती उसके लिए यह बात कितनी बेतुकी है.

तमिल संस्कृति

विरोध-प्रदर्शनों में यह बात बार-बार कही जा रही है कि देश में तमिल हितों को हाशिए पर कर दिया गया है. तमिल संस्कृति भारतीय संघ से कहीं ज्यादा पुरानी है और इसकी संस्थाएं और आत्म-सम्मान इस संस्कृति का अहम हिस्सा है.

जलीकट्टू के खेल में बैल खुले में लोगों के बीच छोड़ा जाता है और उसे काबू किया जाता है

जल्लीकट्टू के खेल में बैल खुले में लोगों के बीच छोड़ा जाता है

महज दो सौ साल पहले तक तमिलनाडु का अपने समुद्री व्यापार, विदेश मामले और तमिल-जीवन के ज्यादातर पहलुओं पर नियंत्रण हुआ करता था. तमिल जनता की सियासी याददाश्त और इतिहास की समझ बहुत गहरी है और इस समझ का असर यहां की सियासत की हर बात पर दिखता है. इसलिए, केंद्र सरकार जब भी तमिलनाडु के राज्य के हकों में कटौती करती है, तमिलनाडु की जनता विरोध का मोर्चा खोल देती है.

इस तरह की राजनीति का फिलहाल विस्तार हुआ है. मिसाल के लिए ममता बनर्जी ने भी हाल-फिलहाल भारत के संघीय ढांचे को तहस-नहस करने की बात पर लगातार अपनी चिन्ता का इजहार किया है.

तमिल जनता ने भारतीय संघ में शामिल होने की बात मानकर अपनी जमीन, संसाधन और लोगों पर चला आ रहा खुदमुख्तारी का हक छोड़ा. कोई अपना हक छोड़े तो उसकी भरपाई की जाती है उसे कुछ फायदे दिए जाते हैं. लेकिन तमिल मानते हैं कि उनके साथ ऐसा सलूक नहीं हुआ.

राजकोष के लिए तमिलनाडु खूब धन जुटाता है लेकिन देश के संविधान से हासिल ताकत के इस्तेमाल से इस धन का ज्यादातर हिस्सा केंद्र सरकार अपने नाम कर लेती है. दिल्ली में बैठकर सूबों से भेदभाव करने के ऐसे समीकरण रचे जाते हैं कि तमिलनाडु अपने संसाधनों से जितना धन कमाकर दिल्ली को देता है उससे कहीं कम धन उसे दिल्ली से हासिल होता है.

सेंट्रल फंड का मामला

यह सब तथाकथित केंद्रीय कोष (सेंट्रल फंड) का कमाल है. यह धन राज्यों के संसाधनों से आता है लेकिन हक उस पर केंद्र सरकार का होता है. संक्षेप में कहें तो तमिलनाडु के धन का इस्तेमाल केंद्र सरकार तमिलनाडु से बाहर की योजनाओं को अनुदान देने में करती है.

जलीकट्टू का विरोध करने पर कई नेता लोगों के गुस्से के शिकार हुए

जल्लीकट्टू का विरोध करने पर कई नेता लोगों के गुस्से के शिकार हुए

तमिलनाडु में ये भावना प्रबल है कि केंद्र सरकार तमिलनाडु से धन तो खूब उगाहती है लेकिन अपने पशु कल्याण बोर्ड (एनीमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ इंडिया) जैसी संस्थाओं का इस्तेमाल तमिलों के रीति-रिवाज पर चोट पहुंचाने में करती है.

केंद्र के स्तर से चलने वाले प्रशासन की यही विडंबना है कि जिस राज्य में सबसे ज्यादा कन्या भ्रूण-हत्या होती है, वहां का नौकरशाह दिल्ली में बैठकर यह तय करता है कि तमिलनाडु जैसे सामाजिक रूप से प्रगतिशील राज्य में महिलाओं को ताकतवर बनाने वाली नीतियां कैसी हों. जल्लीकट्टू सही है या गलत, यह जारी रहे या इसे खत्म किया जाये या जल्लीकट्टू कुछ सुधारों के साथ जारी रहे, यह सब तमिल जनता का मामला है.

जानवरों से बुरा बर्ताव

एनिमेल वेलफेयर बोर्ड ऑफ इंडिया तमिल जनता की राय का नुमाइंदा नहीं. अगर जल्लीकट्टू के बारे में इन सवालों के जवाब यह बोर्ड तय करता है तो उसका यही मतलब निकलता है कि तमिल लोग निहायत ही बच्चे हैं. वे तो अपने मामले भी नहीं सुलझा पा रहे हैं, अपने रीति-रिवाजों जैसे मिसाल के तौर पर जानवरों से किए जाने वाले बरताव तक के बारे में कोई फैसला नहीं ले पा रहे हैं.

जानवरों से बरताव के मामले में एनिमल बोर्ड की दखल के पीछे संविधान की उन दो लंबी सूचियों का हाथ है, जिन्हें केंद्र सूची और समवर्ती सूची कहा जाता है. इन दो सूचियों के ही कारण सूबे के लोगों और उनके मामलों में केंद्र सरकार की एजेंसियों को दखल देने के भारी अधिकार मिले हैं.

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एक झूठा संघवाद जो सूबों के हक की कोई इज्जत नहीं करता बहुत सारी समस्याओं की जड़ में है. इस समस्या का हल देश के संविधान के दायरे में रहते हुए निकाला जा सकता है. इसके लिए केंद्र सूची और समवर्ती सूची में दर्ज ढेर सारे विषयों को निकालकर उन्हें राज्य-सूची में डालना होगा. ऐसा करना 1946 के कैबिनेट मिशन की योजना की मूल भावना से मेल खाता है.

कैबिनेट मिशन की इस भावना से उस वक्त के तमाम जन-प्रतिनिधि सहमत थे लेकिन 1947 के बाद इसकी तरफ से मुंह मोड़ लिया गया. बेशक, सुधार जरूरी हैं लेकिन उन्हें बहुत सारे रुपों में सोचा जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट के विचार के दायरे में केंद्र सूची और समवर्ती सूची के विषयों को रखा जाय और राज्य सूची में दर्ज विषयों पर विवाद की हालत में फैसला लेने का पूरा अधिकार राज्यों के हाईकोर्ट को रहे.

ज्यादातर विषयों को राज्य सूची में रखने और इन विषयों पर विवाद की हालत में फैसला करने का अंतिम अधिकार राज्यों के हाईकोर्ट को दिए बगैर देश के संघीय ढांचे की लोकतांत्रिक संभावनाओं को साकार नहीं किया जा सकता. अगर ऐसा नहीं होता तो दिल में गहरे जमी शिकायतें अलगाव की भावना जगायेंगी.

एक ना एक रूप में इन भावनाओं का इजहार होता रहेगा और जरूरी नहीं कि अलगाव की भावना के इजहार के हर रूप से निपटना आसान साबित हो.

जल्लीकट्टू का रीति-रिवाज और संस्कृति के नाम पर समर्थन किया जा रहा है तो कुछ लोग कह रहे हैं कि यह सती-प्रथा को समर्थन देने जैसा है. हर बात में सती-प्रथा की दुहाई देने का यह चलन जाहिर करता है कि गोरे अंग्रेज हाकिम की पढ़ायी किताबों का हम सांवली प्रजा के दिमागों पर गहरा असर है.

मेरे दोस्त रीतिन्कर दास कहते हैं कि, 'हमें सती-प्रथा से तुलना करने की आदत छोड़ देनी चाहिए. यहां तो पहले से ही एक जमात मौजूद है जो औरत को जानवर के बराबर मानती आयी है. ऐसा करने के लिए हमें औरों की क्या जरूरत?'

अफजल गुरु मामले में आरोपी को संदेह का लाभ देने की गुंजाइश थी लेकिन मामले में फांसी का फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि, 'अफजल गुरु की फांसी से ही जन-मानस के विवेक को संतुष्ट किया जा सकता है.' अगर फांसी के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने खुद ही 'जन-मानस के विवेक' की दलील को निर्णायक मान लिया है तो फिर जल्लीकट्टू को लेकर तमिलनाडु में हर तरफ लहर मारती तमिल-भावनाओं को सुनने से आखिर कौन-सी बात हमें रोक रही है?

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