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क्या जल्लीकट्टू सांस्कृतिक अधिकार है? SC ने संवैधानिक बेंच को सौंपा मामला

तमिलनाडु और महाराष्ट्र ने केंद्र के पशुओं के प्रति क्रूरता की रोकथाम कानून, 1960 में संशोधन किया था, इसी के बाद जल्लीकट्टू और बैलगाड़ी की दौड़ की अनुमति दी थी

Bhasha Updated On: Dec 12, 2017 08:57 PM IST

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क्या जल्लीकट्टू सांस्कृतिक अधिकार है? SC ने संवैधानिक बेंच को सौंपा मामला

बैल पर काबू पाने वाले खेल जल्लीकट्टू और बैलगाड़ी दौड़ को अनुमति देने वाले महाराष्ट्र और तमिलनाडु सरकार के कानूनों को चुनौती देने वाली याचिकायों को सुप्रीम कोर्ट पांच सदस्यीय संविधान पीठ को सौंपेगा.

चीफ जस्टिस दीपक मिश्र और जस्टिस आरएफ नरिमन की पीठ ने इस मामले में अपना आदेश सुरक्षित रख लिया. चीफ जस्टिस मिश्र और जस्टिस नरिमन ने कहा कि बड़ी पीठ ही यह फैसला करेगी कि क्या राज्यों को जल्लीकट्टू और बैलगाड़ी की दौड़ जैसे मामलों में कानून बनाने की ‘विधायी पात्रता’ है जो संविधान के अनुच्छेद 29 (1) के अंतर्गत आने वाले सांस्कृतिक अधिकारों के दायर में आते हैं और क्या इन्हें सांविधानिक रूप से संरक्षण दिया जा सकता है.

तमिलनाडु और महाराष्ट्र ने केंद्र के पशुओं के प्रति क्रूरता की रोकथाम कानून, 1960 में संशोधन किया था. इसी के बाद जल्लीकट्टू और बैलगाड़ी की दौड़ की अनुमति दी थी. इन कानूनों की वैधानिकता को शीर्ष अदालत में चुनौती दी गई है.

शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि कंबाला की अनुमति देने संबंधी कर्नाटक के अध्यादेश को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अलग से सुनवाई की जाएगी. कोर्ट ने पेटा सहित विभिन्न याचिकाकर्ताओं की याचिकाओं पर नोटिस जारी किए. कोर्ट ने इन मामलों में 6 सप्ताह बाद सुनवाई करने का निश्चय किया.

पीठ ने कहा कि वह तमिलनाडु और महाराष्ट्र के रवैए को देखते हुए इस विवाद का अंत करना चाहती है. दोनों राज्यों का कहना है कि उन्होंने समाज के एक वर्ग के सांस्कृतिक अधिकारों की रक्षा के लिए कानून बनाए हैं.

वृहद पीठ यह फैसला करेगी कि क्या राज्य विधायिका इस विषय पर कानून बनाने में विधायी रूप से समक्ष है.

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