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किसानों के सत्याग्रह के आगे झुकना पड़ा सरकार और जयपुर प्रशासन को

गांधी जयंती से शुरू होकर पटेल जयंती तक चले सत्याग्रह में अंततः किसानों की लगभग सारी मांगे मान ली गई हैं

Mahendra Saini Updated On: Nov 02, 2017 08:48 AM IST

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किसानों के सत्याग्रह के आगे झुकना पड़ा सरकार और जयपुर प्रशासन को

आजादी से पहले बहरी सरकार को सुनाने के लिए भगत सिंह और हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक आर्मी ने संसद में प्रतीकात्मक धमाके किए थे. आजादी के 70 साल बाद जयपुर में बहरी सरकार को सुनाने के लिए किसानों को भी एक अलग प्रयोग करना पड़ा. गले तक खुद को जमींदोज कर किसानों ने भू समाधि सत्याग्रह किया.

गांधी जयंती पर शरू हुआ भू समाधि सत्याग्रह सरदार पटेल की जयंती पर सम्पन्न हुआ. इस अनोखे सत्याग्रह की गूंज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुनाई देने के बावजूद राजस्थान सरकार से अपना जायज हक पाने के लिए किसानों को पूरे 29 दिन गले तक जमीन में रहना पड़ा.

क्यों लेनी पड़ी भू-समाधि

भू-समाधि लेने वाले किसान जयपुर शहर से सटे नींदड़ गांव के हैं. जयपुर विकास प्राधिकरण यानी जेडीए इस गांव की 1350 बीघा जमीन पर एक रेजिडेंशियल टाउनशिप की योजना बना रहा है. इसके लिए भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू की गई थी.

इस जमीन पर वर्तमान में करीब 20 हजार लोग बसे हुए हैं. कुछ किसानों और जमीन मालिकों ने जेडीए को अपनी जमीन समर्पित भी कर दी. लेकिन ज्यादातर लोग या तो जमीन छोड़ने को तैयार नहीं थे या फिर बेहतर मुआवजा पैकेज की मांग कर रहे थे. जेडीए इसके लिए तैयार नहीं हुआ तो मजबूरन इन्हें आंदोलन का रास्ता अख्तियार करना पड़ा.

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18 सितंबर से ये आंदोलन शुरू हुआ था. प्रशासन के कानों पर जूं न रेंगी तो 2 अक्टूबर से गांव के दर्जनों पुरुषों, महिलाओं और बच्चों ने गले तक जमींदोज होकर विरोध दर्ज कराया. अपनी जमीन बचाने की जद्दोजहद में करवाचौथ से लेकर दीपावली तक जमीन में गड़े-गड़े ही मनाई गई. यहां तक कि एक किसान की बेटी ने अपनी शादी भी सत्याग्रह स्थल पर ही की.

दिवाली पर भी भू-सत्तयाग्रह करते किसान

दिवाली पर भी भू-सत्तयाग्रह करते किसान

किसानों के सामने ये जीने मरने का सवाल बन गया था. एक काश्तकार के लिए उस जमीन को सरकारी आदेश भर से छोड़ना इतना आसान भी नहीं होता जिसे उसके पुरखों ने खून पसीने से सींचा हो और जिस पर अब उसके बच्चे खेल-खा रहे हों. गांधीजी ने कहा था कि ईश्वर सत्य के साथ होता है और झूठ को आखिर में हारना ही पड़ता है. जेडीए को भी आखिरकार सत्याग्रह के सामने झुकना पड़ा.

सत्याग्रहियों की लगभग सभी मांगें मंजूर

सोमवार यानी 30 अक्टूबर को नगरीय विकास मंत्री श्रीचंद कृपलानी ने अपने स्तर पर जेडीए अधिकारियों और नींदड़ बचाओ संघर्ष समिति के बीच वार्ता करवाई. वार्ता में कृपलानी के साथ यूडीएच सचिव मुकेश शर्मा, जेडीए कमिश्नर वैभव गालरिया मौजूद थे. जबकि समिति के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व अध्यक्ष कैलाश बोहरा और संयोजक नगेंद्र सिंह शेखावत कर रहे थे.

हालांकि अपने हक के इस संघर्ष में किसानों और जमीन मालिकों के दो गुट बन गए थे. एक गुट वो है जो अपनी जमीन बचाने का संघर्ष कर रहा है. एक गुट वो है जो अपनी जमीन पहले ही समर्पित कर चुका है. अब जेडीए के साथ जो वार्ता हुई, इसमें भी दोनों गुटों को शामिल किया गया था.

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वार्ता में तय किया गया कि नींदड़ आवासीय योजना के तहत आने वाली पूरी जमीन का दोबारा सर्वे किया जाएगा. यानी योजना के दायरे में आने वाले सभी निर्माणों, मकानों, दूसरे स्ट्रक्चर, कुओं, मंदिर माफी और सरकारी जमीनों के दोबारा सर्वे की किसानों की मांग मान ली गई. ये सर्वे एक महीने के अंदर पूरा कर लिया जाएगा.

जेडीए इस बात के लिए भी राजी हो गया है कि सर्वे के आधार पर तय हुआ मुआवजा अदा किए जाने के बाद ही तोड़फोड़ की कार्रवाई की जाएगी. हालांकि जेडीए ने स्पष्ट किया है कि मंदिर माफी की जमीन पर सड़क निर्माण विकास कार्य पहले ही शुरू कर दिए जाएंगे.

दूसरी ओर, जमीन दे चुके लोगों के साथ समझौता किया गया है कि उनको विकसित जमीन एक किलोमीटर के दायरे में दी जाएगी. साथ ही जेडीए लीज मनी न लेने या टोकन के रूप में लेने का प्रस्ताव भी वित्त विभाग को भेजेगा. ये लीज मनी उस जमीन पर वसूली जानी है, जो इन्हें मुआवजे के तौर पर मिली है.

समझौते के बाद भी रहा असमंजस

समझौता तो हो गया लेकिन पिछले 2 दिन अजीब सा असमंजस भी बना रहा. सरकार इस कोशिश में लगी रही कि जनता के बीच उसकी हार होने का मैसेज न जाए. जबकि किसान और जमीन मालिक समझौते को अपनी जीत बताते रहे.

सोमवार को वार्ता के बाद नींदड़ बचाओ संघर्ष समिति के संयोजक नगेंद्र सिंह शेखावत ने दावा किया कि ये भूमि पुत्रों की जीत है. अब किसानों को तानाशाहीपूर्ण तरीके से जेडीए नहीं हटा पाएगा.

दूसरी ओर, नगरीय विकास मंत्री श्रीचंद कृपलानी इसे सरकार की हार कहना गलतबयानी करार देते रहे. कृपलानी ने कहा कि आंदोलन कर रहे लोगों पर दर्ज मुकदमे वापस लेने जैसा कोई समझौता नहीं किया गया है. न ही समझौते को लिखित रूप देने जैसी ही कोई बात है.

वार्ता के लिए बंद कमरे में बैठे प्रतिनिधियों के इन परस्पर विरोधाभासी बयानों ने नींदड़ गांव में अजीब से हालात बना दिए. यही कारण रहा कि सोमवार को समझौते के बावजूद किसान 24 घंटे और सत्याग्रह स्थल पर डटे रहे. काश्तकारों का कहना था कि वार्ता की लिखित सहमति या सर्वे आदेश जारी होने के बाद ही वे ऐसा करेंगे.

आखिरकार मंगलवार को जेडीए के लिखित आदेश जारी करने के बाद 44 दिन पुराना आंदोलन खत्म हुआ. इससे एक बार फिर साबित हो गया कि क्यों गांधीवाद कभी भी अप्रासंगिक नहीं हो सकता. सत्याग्रह ब्रिटिश तानाशाहों को परास्त कर सकता था तो आधुनिक लोकतांत्रिक सरकारों की जबरदस्ती भी इससे जीत नहीं सकती.

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