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जयपुर के किसान क्यों कह रहे हैं, 'जान दे देंगे जमीन नहीं देंगे'

हैरानी की बात ये है कि पिछले कुछ साल में जेडीए की ही बसाई करोड़ों-करोड़ की कई योजनाएं आज भी बिजली-पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रही हैं.

Mahendra Saini Updated On: Oct 05, 2017 04:51 PM IST

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जयपुर के किसान क्यों कह रहे हैं, 'जान दे देंगे जमीन नहीं देंगे'

पिंकसिटी के नाम से मशहूर जयपुर के विकास के लिए जयपुर विकास प्राधिकरण (JDA) को मुख्य जिम्मेदार संस्थान माना जाता है. जेडीए की वेबसाइट पर लिखा है कि मेट्रोपोलिटन सिटी के तौर पर उभर रहे जयपुर का नियोजित, समग्र और समावेशी विकास उसका मिशन है.

जेडीए दावा करता है कि उसके अधिकार क्षेत्र में 725 गांव और 3 हजार वर्ग किलोमीटर का इलाका है. जेडीए ही बताता है कि शहर के विस्तार और बढ़ती जनसंख्या की जरूरतों को पूरा करने के लिए वह एक सशक्त संस्था है. अपनी तारीफ में वह और भी बहुत कुछ ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर लिखता है.

जयपुर से बाहरवाले ये जानकारी पढ़ कर सोचते होंगे कि जेडीए कितनी महान संस्था है. लेकिन हकीकत क्या है, ये बयां करते हैं जयपुर के नींदड गांव में गले तक जमीन के अंदर गड़े लोग.

जान दे देंगे पर जमीन नहीं देंगे

22 किसान पुरुषों और 32 महिलाओं ने देश के सबसे बड़े राज्य की राजधानी में सामूहिक भू समाधि लेने के लिए खुद को गले तक जमींदोज कर लिया. ये लोग इस तरह सत्याग्रह कर रहे हैं ताकि उनकी वो जमीन बच सके जो उनके पुरखों की है. वो जमीन, जिसके बलबूते आज उनके बच्चे खाना खा पाते हैं और स्कूल जा पाते हैं.

नींदड़ में जेडीए अपनी रेजिडेंशियल टाउनशिप बसाना चाहता है. इसके लिए जेडीए को 1350 बीघा जमीन की जरूरत है. इस जमीन पर अभी करीब 18-20 बस्तियां और इतनी ही ढाणियां बसी हैं. इनमें कुल मिलाकर 5 हजार परिवार बताए जाते हैं. यानी, यहां जेडीए की रिहायशी टाउनशिप करीब 20 हजार लोगों को उजाड़ कर ही बसाई जा सकती है.

क्या ये परस्पर विरोधाभासी नहीं लगता कि एक तरफ तो जेडीए समग्र और समावेशी विकास की बात करता है. वहीं, दूसरी ओर अपनी 'गेटेड टाउनशिप' के लिए वह इस जमीन पर पहले से बसे और कमा खा रहे 20 हजार लोगों को उजाड़ देने पर तुला है.

नींदड़ बचाओ संघर्ष समिति के संयोजक नगेंद्र सिंह का कहना है कि एक को उजाड़ कर दूसरे को बसाना न सिर्फ अन्याय है बल्कि अनैतिक भी है. सिंह का कहना है कि सरकार की तरफ से सकारात्मकता दिखाने तक काश्तकार अपना भू समाधि सत्याग्रह नहीं छोड़ेंगे.

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हालांकि, भू समाधि की खबर फैलते ही केंद्रीय इंटेलिजेंस ने गृह मंत्रालय को रिपोर्ट भेज दी. इसके बाद राज्य सरकार को भी हरकत में आना ही पड़ा. मंगलवार और बुधवार को लगातार दो दिन तक किसानों और सरकार के बीच वार्ता हुई. हालांकि, कोई रास्ता निकलता न देख नगरीय विकास मंत्री श्रीचंद कृपलानी ने जेडीए आयुक्त वैभव गालरिया को ठोस समाधान के निर्देश दिए.

इसके बाद जेडीए आयुक्त ने संघर्ष समिति के साथ ही शीर्ष अधिकारियों के साथ भी एक हाई लेवल मीटिंग की. लेकिन नींदड़ के लोगों ने अपनी मांगे पूरी होने तक समाधि सत्याग्रह छोड़ने से इनकार कर दिया है.

क्या है किसानों की मांगें?

- खेती की जमीन को अवाप्त मुक्त किया जाए.

- अगर अवाप्ति बेहद जरूरी हो तो पहले दोबारा सर्वे कराया जाए.

- सिंचित जमीन को जबरन बारानी न दिखाया जाए.

- मुआवजा नए भूमि अवाप्ति अधिनियम के तहत तय किया जाए.

नींदड़ बचाओ संघर्ष समिति के संयोजक नगेंद्र सिंह का कहना है कि जेडीए ने इस जमीन की अवाप्ति के लिए सर्वे ही गलत किया था. अगर दोबारा सही तरीके से सर्वे किया जाए तो सच सामने आ जाएगा. सिंह ने कहा कि बुधवार को जेडीसी से दोबारा सर्वे को लेकर भी चर्चा हुई है.

मामला बढ़ता देख सरकार और प्रशासन के सुर भी नरम पड़े हैं. बुधवार को वार्ता में जिन मुद्दों पर चर्चा हुई उनमें शामिल हैं-

- परिवारों की न्यूनतम जमीन की जरूरत की रिपोर्ट बनाना.

- मकानों के नुकसान का दोबारा सर्वे.

- अधिग्रहण के बाद लोगों की आर्थिक स्थिति पर होने वाले असर का आकलन.

जेडीसी वैभव गालरिया का कहना है कि संघर्ष समिति के मांगपत्र पर अधिकारी मंथन कर रहे हैं. जो भी न्यायसंगत और प्रभावितों के हित में होगा, वही करने की कोशिश की जाएगी.

जेडीए को सिर्फ अपनी जेब पसंद है!

अब सवाल ये है कि इतने कड़े विरोध के बावजूद जेडीए जमीन अधिग्रहण के लिए अड़ा क्यों हुआ है. दरअसल, जेडीए की योजना है कि इस टाउनशिप में 6520 रेजिडेंशियल प्लॉट और 883 कमर्शियल प्लॉट बनाए जाएं. इस तरह उसे 1,000 करोड़ रुपये से ज्यादा की आय की उम्मीद है.

लेकिन, हैरानी की बात ये है कि पिछले कुछ साल में जेडीए की ही बसाई करोड़ों-करोड़ की कई योजनाएं आज भी बिजली-पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रही हैं. इन योजनाओं में अपनी जिंदगी भर की कमाई लगा चुके लोग अब खून के आंसू रोने को मजबूर हैं.

नींदड़ से 5-6 किलोमीटर के दायरे में ही कम से कम ऐसी 3 बदहाल योजनाओं को प्रत्यक्ष देखा जा सकता है. इसके बावजूद जयपुर के समग्र और समावेशी विकास के लिए बना जेडीए एक बार फिर जनता की जेब काटने के लिए जबरदस्ती कर रहा है.

पिंक सिटी को स्मार्ट सिटी तो बनाओ!

हैरानी इस बात पर भी होती है कि जरा सी बारिश में जयपुर जल भराव के कारण जाम हो जाता है. शहर के कई कोने स्ट्रीट लाइट न होने से अंधेरे में डूबे रहते हैं. स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के 100 पहले शहरों में जयपुर सबसे निचले पायदानों पर है. लेकिन जेडीए है कि पुरानी योजनाओं की सुध लेने के बजाय नई-नई टाउनशिप के जरिए सिर्फ अपनी समग्र कमाई बढ़ाने में लगा है.

लगता नहीं कि जेडीए को जयपुर के नियोजित और समावेशी विकास की फिक्र भी है. कुछ साल पहले शायद इसीलिए पूर्व राजमाता गायत्री देवी ने उसे सही संज्ञा दी- जयपुर विकास प्राधिकरण नहीं, जयपुर के विनाश का प्राधिकरण है.

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