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गोरखपुर त्रासदी: इन डॉक्टरों को सबसे पहले 'इंसान' बनाए जाने की जरूरत है

स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में भारत की क्या स्थिति है. यह जानने के लिए हमारे और आपके अनुभव ही काफी हैं

Rakesh Kayasth Updated On: Aug 14, 2017 09:55 AM IST

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गोरखपुर त्रासदी: इन डॉक्टरों को सबसे पहले 'इंसान' बनाए जाने की जरूरत है

बात शुरू करने से पहले एक विश्वप्रसिद्ध लघुकथा-

एक लोक कल्याणकारी देश था. देश का एक गरीब आदमी अपना इलाज कराने वहां के सबसे बड़े अस्पताल पहुंचा. अंदर दाखिल होते ही उसे दो ऐरो नजर आए. एक पर लिखा था- इलाज आम आदमी के लिए. दूसरे पर लिखा था- इलाज खास आदमी के लिए.

गरीब आदमी स्वभाविक रूप से आम आदमी वाले दरवाजे की ओर बढ़ा. वह चलता चला गया. काफी देर बाद उसे फिर दो बोर्ड नजर आए- इलाज गरीबों के लिए और इलाज बहुत ज्यादा गरीबों के लिए. वह आदमी बहुत ज्यादा गरीबों वाले दरवाजे में दाखिल हुआ और बहुत देर चलने के बाद उसे महसूस हुआ कि अब वह अस्पताल से बाहर आ चुका है और दोबरा अंदर जाने का कोई रास्ता नहीं है.

यह यूरोपीय कहानी बहुत पुरानी है. लेकिन भारत पर पूरी तरह लागू होती है. स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में भारत की क्या स्थिति है. यह जानने के लिए कोई ग्लोबल इंडेक्स देखने की जरूरत नहीं है. हमारे और आपके अनुभव ही काफी हैं. सरकारी अस्पतालों के धक्के और लंबी कतारों से मुक्ति हमेशा से इंडियन मिडिल क्लास की ख्वाहिश रही है. उदारीकरण ने बहुत हद तक मुक्ति दिला थी. आज फाइव स्टार होटल जैसे दिखने वाले चमचमाते अस्पताल हर शहर में हैं, लेकिन इलाज?

प्राइवेट अस्पतालों की लूट

घटिया इलाज, लापरवाही और व्यवस्थित लूट के अनगिनत अनुभवों से हम रोजमर्रा की जिंदगी में लगातार रूबरू होते हैं. ये अनुभव आपको याद दिलाते हैं कि जब मिडिल क्लास आदमी की ये दुर्दशा है तो फिर गरीबों का हाल कैसा होगा? प्राइवेट अस्पतालों के अपने कई अनुभवों से एक अनुभव मैं आपके साथ बांट रहा हूं.

बात करीब पांच साल पुरानी है. कमर और पैरो में बेइंतेहा दर्द की वजह से मेरी मां ने बिस्तर पकड़ लिया था. डॉक्टरों को शक था कि रीढ़ की हड्ढी से जुड़ी कोई समस्या है. मैने उन्हे दिल्ली के एक बड़े प्राइवेट अस्पताल में दाखिल कराया. जांच शुरू हुई. अस्थि रोग विशेषज्ञ ने कहा- रीढ़ की हड्डी में हल्की चोट है. लेकिन मुख्य समस्या चोट नहीं ऑस्टियोपोरोसिस है. तीन महीने तक बिस्तर पर रहना होगा. कुछ दवाइयां चलेंगी, उसके बाद पूरी तरह ठीक हो जाएंगी.

उसके अगले दिन मेरे पास अस्पताल से फोन आया- न्यूरो सर्जरी डिपार्टमेंट के फलां डॉक्टर ने आपको बुलाया है, फौरन आकर मिलिए. मैं वहां पहुंचा तो डॉक्टर साहब बहुत चिंतित मुद्रा में बैठे. मुझे देखते ही उन्होंने कहा, फौरन तीन लाख रुपए जमा करा दीजिए. कल आपकी माताजी का ऑपरेशन होगा. मैंने हैरान होकर पूछा- अचानक क्या हो गया? उन्होने कहा, बहुत बुरी स्पाइनल इंजरी है, बिना सर्जरी के ठीक नहीं होगी. मैने कहा, लेकिन इतनी जल्दी मैं किस तरह निर्णय ले सकता हूं. उन्होंने रुखाई से कहा, मर्जी है आपकी, अपने पेशेंट को पूरी तरह चंगा देखना चाहते हैं या बिस्तर पर पड़े-पड़े मारना चाहते हैं.

Gorakhpur : An inside view of a ward of BRD Hospital in Gorakhpur on Friday where at least 30 children died since the past two days, allegedly due to oxygen supply cut on Friday. PTI Photo (PTI8_11_2017_000220B)

ऑपरेशन और एडमिशन के टारगेट

बिल्कुल हैरान-परेशान हालत में मैं बाहर आया तो मुझे वही अस्थि रोग विशेषज्ञ मिल गए, जिनकी देखरेख में मां का इलाज चल रहा था. उन्होंने लगभग फुसफुसाते हुए कहा, एक घंटे बाद आप मुझसे मेरे कमरे में आकर मिलिएगा.

जब मैं उनके चैंबर में पहुंचा तो वे थोड़े परेशान नजर आ रहे थे. मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था. उन्होने खुद बात शुरू की, देखिए मेरा नाम मत लीजिएगा. लेकिन मेरे हिसाब से ऑपरेशन की कोई जरूरत नहीं है. मैने पूछा, लेकिन आपके न्यूरो सर्जन तो कह रहे हैं कि ऑपरेशन के बिना ठीक नहीं होंगी.

डॉक्टर साहब ने फीकी हंसी हंसते हुए कहा, ये प्राइवेट अस्पताल है. यहां एडमिशन से लेकर ऑपरेशन तक हर चीज के टारगेट फिक्स्ड होते हैं. मैंने पूछा तो फिर मैं क्या करूं?

उन्होंने रास्ता सुझाया- बाहर किसी बड़े एक्सपर्ट को रिपोर्ट दिखाकर राय ले लीजिए और उसके बाद माताजी को डिस्चार्ज करके घर ले जाइए. रिपोर्ट लेकर एम्स के एक पूर्व निदेशक के पास गया जो इस देश के चुनिंदा हड्डी रोग विशेषज्ञों में एक हैं. उन्होंने रिपोर्ट देखते हुए कहा, जिस डॉक्टर ने ऑपरेशन की सलाह दी है, वह या तो क्रिमिनल है या फिर पागल.

सलाह लेकर मैं वापस अस्पताल लौटा और डिस्चार्ज की प्रकिया शुरू की. इसके बाद अस्पताल ने मुझे डराना शुरू किया कि मेरी लापरवाही से माताजी की जान जा सकती है. बदले में मुझे भी उन्हें धमकी देनी पड़ी कि उनका कच्चा-चिट्ठा मेरे पास है और जरूरत पड़ने पर मैं कानूनी कार्रवाई करूंगा. बड़ी मुश्किल से जान छूटी और हड्डी रोग विशेषज्ञ ने जैसा कहा था, तीन महीने में मेरी मां पूरी तरह ठीक हो गईं.

अब मैं मुंबई में रहता हूं. पब्लिक हेल्थ के मामले में यह शहर मुझे दिल्ली से थोड़ा बेहतर लगता है. लेकिन प्राइवेट अस्पतालों के संस्थागत लूट की कहानियां यहां भी हैं. जिन टेस्ट की जरूरत नहीं है, मरीज से वही टेस्ट करवाना, कुछ खास पैथोलॉजिकल लैब में जांच के लिए भेजना, दवा कंपनियों से कमीशनखोरी, इंश्योरेंस वाले मरीजों को जानबूझकर ज्यादा वक्त तक अस्पताल में भर्ती रखना, ऐसी कई बातें रोज देखने को मिलती हैं. लेकिन अब मैं जो बताने जा रहा हूं, वह वाकई हैरान करने वाला है.

photo source: ANI

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मुर्दा अस्पताल में भर्ती, बिलिंग जारी

मेरे एक मित्र ने हार्ट अटैक के शिकार अपने भाई को शहर के एक बड़े प्राइवेट अस्पताल में भर्ती कराया. मरीज कार्डियक केयर यूनिट में था. कई दिन बीत गए. डॉक्टर उसकी हालत गंभीर, लेकिन स्थिर बता रहे थे. एक दिन मेरे दोस्त ने इस बात पर गौर किया उसके भाई का चेहरा अब भी पूरी तरह क्लीन शेव्ड है. कोई नए बाल आए ही नहीं. उसने यह बात रिश्तेदारों को बताई.

सबने मिलकर हंगामा किया तो भेद खुला की मरीज पहले ही मर चुका था. लेकिन उसे सीसीयू में रखकर बिल बनाया जा रहा था. हंगामे के बाद अस्पताल के बड़े अधिकारियों ने मामला रफा-दफा कराने के लिए बिल में भारी डिस्काउंट देने की पेशकश की. पीड़ित पक्ष को भी लगा कि जो होना था, वो तो हो ही गया, अब बात बढ़ाने का क्या फायदा?

इस देश में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जिसके अस्पतालों को लेकर दो-चार कड़वे अनुभव ना रहे हों. रियायती दर पर मिली सरकारी जमीन पर प्राइवेट अस्पताल खड़े होते हैं. टैक्स में छूट से लेकर तमाम तरह की कई और सुविधाएं मिलती हैं. लेकिन क्या प्राइवेट हेल्क केयर सिस्टम बदले में समाज को वो कुछ दे रहा है, जिसकी उम्मीद की जाती है?

सरकारी अस्पतालों की अनदेखी कहां तक जायज?

हम सब लोगों के दिमाग सरकारी अस्पतालों की एक भयावह छवि बनी हुई है. यह छवि बहुत हद तक जायज भी है. लेकिन यह भी सच है कि चिकित्सा के क्षेत्र में सबसे अच्छा काम अब भी एम्स, राम मनोहर लोहिया और पीजीआई चंडीगढ़ जैसे सरकारी संस्थान कर रहे हैं. इन संस्थानों को और ज्यादा सुविधा संपन्न, स्वायत्त और जिम्मेदार बनाए जाने की जरूरत है. लेकिन पब्लिक हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर समाज में वैसी जागरूकता नहीं है, जैसी होनी चाहिए.

गोरखपुर प्रकरण को लेकर समाज में गुस्सा बहुत है. लेकिन इस गुस्से से आखिर हासिल क्या होगा? इस घटना ने देश को एक मौका दिया है कि वह पब्लिक हेल्थ सिस्टम से जुड़े सवालों को लोक-विमर्श के केंद्र में लाए. अब वक्त आ गया है कि जनता अपनी सरकारों से पूछे कि गाढ़ी खून-पसीने कमाई के बाद वह जो टैक्स चुकाती है, वह उसे सेहतमंद रखने में किस तरह काम आ रही है?

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