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बजट 2017: साफ नजरिए और निश्चित लक्ष्य वाला सादा बजट

वित्तीय घाटे का लक्ष्य 3.2 फीसदी पर कायम रखकर सरकार ने इनवेस्टमेंट साइकिल को बढ़ाने की कोशिश की है

Bhuwan Bhaskar Bhuwan Bhaskar Updated On: Feb 01, 2017 06:09 PM IST

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बजट 2017: साफ नजरिए और निश्चित लक्ष्य वाला सादा बजट

अरुण जेटली का चौथा बजट भाषण भले ही चुनाव सुधारों के लिहाज से कुछ बड़ी घोषणाओं के लिए याद किया जाए, लेकिन अर्थव्यवस्था को बढ़ाने और विकास का एक नया दौर शुरू करने के लिए इसमें कोई बड़ी आतिशी घोषणा नहीं हुई.

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हालांकि छोटी-छोटी हुई कई घोषणाओं को अगर एक साथ श्रृंखलाबद्ध कर रखा जाए, तो एक बात बहुत साफ है कि नरेंद्र मोदी की सरकार ने एक साफ विजन के साथ निश्चित दिशा में बढ़ने और बढ़ाने वाला बजट पेश किया है.

बजट में वित्त मंत्री ने मैक्रोइकनॉमिक मोर्चे पर सबसे बड़ी घोषणा वित्तीय घाटे को 3 प्रतिशत तक सीमित करने का लक्ष्य चूकने की घोषणा की.

फिस्कल रिस्पॉन्सिबिलिटी एंड बजट मैनेजमेंट (एफआरबीएम) की सिफारिशों के मुताबिक सरकार को वित्त वर्ष 2017-18 में वित्तीय घाटा जीडीपी के 3 प्रतिशत तक सीमित रखना था, लेकिन बजट में की गई घोषणा के मुताबिक सरकार ने अगले वित्त वर्ष में इसका लक्ष्य 3.2 प्रतिशत रखा है.

साफ है कि सरकार ने चालू वर्ष के 3.5 प्रतिशत से इसे कम जरूर किया है यानी फिस्कल कंसोलिडेशन (वित्तीय अनुशासन) कायम रखते हुए 3 प्रतिशत के लक्ष्य को अगले साल तक के लिए टाल दिया है.

सरकारी खर्च बढ़ाने की जरूरत

इसके पीछे का मुख्य कारण सरकारी खर्च में बढ़ोतरी की जरूरत थी, जिसे निवेश चक्र (इनवेस्टमेंट साइकल) को पुनर्जीवित करने के लिए बहुत आवश्यक माना जाता रहा है.

बजट में जेटली ने बताया कि चालू साल में सरकार की आमदनी 17 प्रतिशत बढ़ने वाली है, जिसके बूते सरकार अगले वित्त वर्ष के दौरान कुल पूंजीगत व्यय में 24 प्रतिशत की बढ़ोतरी करने जा रही है.

स्वाभाविक है कि इंफ्रास्ट्रक्चर पर 3,96,135 करोड़ रुपये और कृषि व ग्रामीण क्षेत्रों पर 1,87,223 करोड़ रुपये का खर्च करने के लिए सरकार को अपने घाटे की लगाम कुछ तो खोलनी ही थी.

आमदनी को बढ़ाने के लिए सरकार ने विनिवेश के लक्ष्य को पिछले साल पर ही कायम रखा है. पीएसयू कंपनियों में हिस्सेदारी बेचकर राजस्व जुटाने की सरकार की योजना यूपीए के समय से ही लगातार बुरी तरह असफल होती रही है.

फंड जुटाने का लक्ष्य

मोदी सरकार के पहले साल में सरकार ने इस जरिए से 69500 करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा था, लेकिन वर्तमान वित्त वर्ष में इसे 19 प्रतिशत घटाकर 56000 करोड़ कर दिया गया.

हालांकि इस वर्ष भी अब तक सरकार इससे 31000 करोड़ रुपये ही जुटा सकी है. हालांकि वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बजट के तुरंत बाद लोकसभा टीवी को दिए अपने इंटरव्यू में कहा कि साल खत्म होने तक यह आंकड़ा 40000 करोड़ रुपये तक पहुंच जाएगा.

अब अगले वित्त वर्ष में इस माध्यम को ज्यादा प्रभावी बनाने के लिए सरकार ने दो-तीन नई घोषणाएं की हैं.

एक तो रेलवे की तीन पीएसयू कंपनियों, आईआरसीटीसी, इरकॉन और आईआरएफसी को शेयर बाजार में लिस्ट कराया जाएगा और दूसरा डायवर्सिफायड केंद्रीय पब्लिक सर्विसेज एंटरप्राइज (सीपीएसई) शेयरों और सरकारी होल्डिंस के साथ एक नया ईटीएफ लॉन्च किया जाएगा.

असफलताओं से सीख लेने का वक्त

जाहिर है सरकार अपनी पुरानी असफलताओं से सीख लेते हुए अब विनिवेश के लिए एक तय सिस्टम तैयार करना चाहती है.

यहां यह जानना भी रोचक है कि चालू साल में भी एक बड़ी रकम सीपीएसई ईटीएफ के जरिए ही हासिल की गई.

वित्तीय अनुशासन बरकार रखने और सरकारी खर्च बढ़ाने के बावजूद बुनियादी तौर पर अर्थव्यवस्था को दबाव से बचाने के लिए सरकार ने बाजार से चालू साल में लिए गए 4.25 लाख करोड़ रुपये के मुकाबले अगले वित्त वर्ष में 3.84 लाख करोड़ रुपये का लक्ष्य रखा है.

साफ है कि इससे महंगाई दर को काबू में रखने में रिजर्व बैंक को मदद मिलेगी और इसलिए आने वाले दिनों में सस्ते कर्ज का रास्ता भी साफ होगा.

बजट खत्म होते ही शेयर बाजार में जिस तरह की प्रतिक्रिया दिखी, उसे समझना जरूरी है. सरकार ने पिछले बजट में वादा किया था कि कॉरपोरेट टैक्स की दर 30 प्रतिशत से घटाकर 25 प्रतिशत कर दी जाएगी.

सिर्फ छोटी कंपनियों को राहत 

लेकिन यह राहत केवल उन्हीं छोटी कंपनियों को दी गई है जिनका सालाना कारोबार 50 करोड़ रुपये से कम है.

यह शेयर बाजार के लिए एक बड़ी निराशा थी. लेकिन इसके बावजूद बड़े परिदृश्य में ग्रोथ की प्रबल संभावना पेश किए जाने के कारण ही बजट खत्म होने के घंटे भर के भीतर सेंसेक्स में 400 अंकों तक की तेजी दिख गई.

हालांकि इसके पीछे एक बड़ा कारण शेयर बाजार से होने वाले मुनाफे पर कोई टैक्स न लगाया जाना भी है, जिसकी आशंका प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुंबई में दिए उस भाषण के बाद की जा रही थी, जिसमें उन्होंने शेयर बाजार के मुनाफे पर टैक्स लगाने की वकालत की थी.

शेयर बाजार के लिहाज से तीनों तेल मार्केटिंग कंपनियों को एक में विलय करने की बात बहुत अहम है, लेकिन इस पर स्थिति साफ होने में अभी वक्त लगेगा.

हालांकि बैंकों के पूंजीकरण के लिए आवंटित की गई 10000 करोड़ रुपये की रकम जरूर नाकाफी है और बैंकिंग सुधारों को लेकर लगाई जा रही उम्मीदों को इससे झटका लगा है.

एफडीआई बढ़ाने की कोशिश

देश में एफडीआई का प्रवाह बढ़ाने के लिए सरकार ने 5000 करोड़ रुपये तक के विदेशी निवेश को अनुमति देने वाले एफआईपीबी (विदेशी निवेश संवर्द्धन बोर्ड) को खत्म करने की घोषणा की है, जो एक महत्वपूर्ण कदम है.

लेकिन इसकी जगह क्या नया सिस्टम तैयार होता है, यह स्थिति साफ होने में अभी कुछ महीनों का वक्त लगेगा.

नए रोजगार के सृजन के मोर्चे पर पुरानी आलोचनाओं को दूर करने लिए और 2019 के आम चुनावों के पहले दिखने लायक प्रगति हासिल करने के लिए सरकार ने मैन्युफैक्चरिंग पर जोर देने की अपनी नीति को और आगे बढ़ाया है.

इसी दिशा में जेटली का बजट एफडीआई रिफॉर्म और मुद्रा योजना के तहत दिए जाने वाले कर्ज आवंटन को दोगुना कर 2.44 लाख करोड़ रुपए जैसी घोषणाएं करता दिखा है.

साथ ही स्किल डेवलपमेंट को एक प्राथिमक क्षेत्र मानते हुए उसके लिए 4000 करोड़ रुपये का संकल्प प्रोग्राम शुरू करने की घोषणा की गई है, जिसके तहत 3.5 करोड़ युवाओं को प्रशिक्षित किया जाएगा.

(लेखक आर्थिक और कृषि मामलों के विशेषज्ञ हैं)

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