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हवाई सर्वेक्षण से अच्छा होता कि रक्षा मंत्री सीमा पर सैनिकों से मिलतीं!

रक्षा मंत्री के अभी शुरुआती दिन हैं और उनकी इस यात्रा को पाठ सीखने की एक कवायद माना जा सकता है

Bikram Vohra Updated On: Oct 09, 2017 10:10 AM IST

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हवाई सर्वेक्षण से अच्छा होता कि रक्षा मंत्री सीमा पर सैनिकों से मिलतीं!

बाढ़ या इस जैसी कोई प्राकृतिक आपदा हो तो वीआईपी राजनेता एरियल सर्वे (हवाई सर्वेक्षण) करते हैं. मिसाल के लिए याद कीजिए साल 2015 में चेन्नई में आई बाढ़ का वक्त, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चेन्नई के आसमान में उड़ान भरी थी. उन लोगों ने हेलिकॉप्टर से झांकते मोदी की एक तस्वीर को अधिक असरदार दिखाने के लिए उसे मार्फड (एडिटेड) कर डाला था.

इस तरह के हवाई सर्वेक्षणों का घाटा यह है कि इनसे कुछ खास हासिल नहीं होता. सिवाय उस फोटो के जो मीडिया के सामने यह कहकर रखा जाता है कि ‘ये रहा सबूत कि हमें मामले की कितनी चिंता है और नेता मामले पर हर संभव नजर रखे हुए हैं.’

वीआईपी राजनेता को जमीन पर पांव नहीं रखने होते

लेकिन ऐसे हवाई सर्वेक्षणों का एक फायदा भी है. वीआईपी राजनेता को अपने पांव जमीन पर नहीं रखने होते. अगर राजनेता के पैर जमीन पर होंगे तो अमले का सारा ध्यान उन पर ही लगा रहेगा, राहत-कार्य बीच में ही ठप हो जाएगा. नौकरशाही अपने सारे अदब-कायदे निभाते हुए पीड़ितों को भूल जाएगी और सामने खड़े खास राजनेता की वंदना में आजू-बाजू जुट जाएगी.

लेकिन एक ऐसे इलाके के ऊपर से उड़ान भरना जो चंद रोज पहले तक भारी तनाव का कारण था- बिल्कुल ही अलग बात है. रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने भारत-चीन सीमा के पास डोकलाम-नाथू ला इलाके के ऊपर से उड़ान भरी और हालात का जायजा लिया. हाल-फिलहाल सवाल उठाए गए हैं कि चीनी सेना सीमांत के इस संवेदनशील इलाके में फिर से जमावड़ा कर रही है.

A signboard is seen from the Indian side of the Indo-China border at Bumla, in the northeastern Indian state of Arunachal Pradesh, November 11, 2009. With ties between the two Asian giants strained by a flare-up over their disputed boundary, India is fortifying parts of its northeast, building new roads and bridges, deploying tens of thousands more soldiers and boosting air defences. Picture taken November 11, 2009. REUTERS/Adnan Abidi (INDIA POLITICS MILITARY) - RTXQO7W

डोकलाम को लेकर पैदा हुए विवाद में भारत और चीनी सैनिक तनावपूर्ण स्थिति में कई महीने तक आमने-सामने रहे थे

अपने आप में ऐसा करने (हवाई सर्वेक्षण) में कुछ भी गलत नहीं है. हालांकि यह खतरा हमेशा बना रहता है कि विमान कहीं चीनी सीमा-क्षेत्र में न चला जाए और कोई परेशानी न खड़ी हो जाए. लिहाजा साफ है कि रक्षा मंत्री का विमान हमारे सीमा-क्षेत्र के भीतर ही उड़ा. लेकिन यहां मुख्य सवाल यह है कि ऐसा करने से निर्मला सीतारमण की सैन्य शिक्षा पर क्या असर पड़ा और इलाके की उनकी समझ में क्या इजाफा हुआ है?

जाहिर है, इस हवाई सर्वेक्षण से खोज के रुप में कोई बहुत अहम बात सामने नहीं आई. हां, खर्चा जरूर खूब बैठा. इससे ज्यादा बेहतर होता कि निर्मला सीतारमण सीमावर्ती इलाके में कहीं नीचे उतरतीं और वहां हफ्ते के सातों दिन 24 घंटे ड्यूटी निभाने वाले सैनिकों और अधिकारियों स मिलती-जुलतीं. इससे सेना का मनोबल ऊंचा उठाने में मदद मिलती.

निर्मला सीतारमण ने हवाई सर्वेक्षण करने की मेहरबानी की

अब यह बात चाहे जितनी बेतुकी जान पड़े लेकिन यह मानकर कि आप महिला हैं हर वक्त आपकी वैसी हिफाजत तो नहीं ही की जा सकती जैसे कि किसी दुधमुंहे बच्चे की की जाती है. चूंकि आपने रक्षा मंत्री का पदभार संभाला है सो इस मामले में लैंगिक पक्ष अब खास मायने नहीं रखता. अब यह कल्पना तो शायद ही कोई कर पाएगा कि दुश्मन के सामने डटकर खड़े तकरीबन 3000 की तादाद में सैनिकों ने देखा कि एक विमान शोर करता ऊपर से गुजर रहा है. उन्हें बताया गया कि इसमे रक्षा मंत्री हैं तो वे एकबारगी पूरे उत्साह में आ गए, बोल पड़े कि बहुत शुक्रिया रक्षा मंत्री जी, जो आपने हवाई सर्वेक्षण करने की मेहरबानी की.

Nirmala Sitharaman

पूर्वोत्तर के दौरे पर गई रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण जवानों से बातचीत करती हुई (फोटो: पीटीआई)

ये सैनिक बीते तीन महीने से बड़ी मशक्कत की जिंदगी जी रहे हैं. रक्षा मंत्री को उनका मनोबल बढ़ाने के लिए कुछ ना कुछ करना ही चाहिए था. अगर निर्मला सीतारमण सैनिकों से मिलती-जुलतीं तो उनकी हवाई यात्रा भी जायज जान पड़ती. चूंकि उन्हें रक्षा मंत्री के रुप में अपनी काबिलियत का लोहा मनवाना अभी बाकी है (यह कहना कोई बड़बोलापन नहीं कि ताकतवर छवि बनाने का यह एक अचूक मौका था, साथ ही यह भी जताया जा सकता था कि सशस्त्र सैन्य-बल की हमें बहुत परवाह है) सो वे बागडोगरा से चॉपर ले सकती थीं जो पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल में 124 किलोमीटर की दूरी पर है. या फिर वो भूटान के पारो एयरपोर्ट से विमान में सवार हो सकती थीं.

एक और आसान विकल्प था कि रक्षा मंत्री अपनी यात्रा के बीच में पक्योंग एयरपोर्ट (गंगटोक से 35 कि.मी दूर) पहुंचती. यह एयरपोर्ट अभी पूरी तरह से बना नहीं है लेकिन इसके अगले इलाके में कई सारे हैलीपैड हैं और यहां विमान उतारा जा सकता है.

शायद भविष्य में वो अपने कदम जमीन पर रखें, उस नए-नवेले बुलेट प्रूफ हेलमेट को अपने सर पर पहनें जो अभी हाल ही में पहुंचा है. उन सैनिकों के साथ चाय-बिस्किट पर कुछ बातें करें जिन्हें तकनीकी तौर पर वो ‘कमांड’ करती हैं. हो सकता है वो इलाके का एक चक्कर भी लगाएं और नजदीक से देखें कि सैनिकों को कैसे हालात मे जीना होता है. यह भी संभव है कि वो सीमा के उस पार खड़े चीनियों को स्वागत भाव से हाथ हिलाकर बाय-बाय कहें.

भारत-चीन सीमा का हवाई दौरा पाठ सीखने की एक कवायद

जाहिर है, मेरे इन शब्दों से तल्खी झांक रही है. रक्षा मंत्री के अभी शुरुआती दिन हैं और उनकी इस यात्रा को पाठ सीखने की एक कवायद माना जा सकता है. कांग्रेस हल्ला मचा रही थी कि चीनी सैनिक फिर से आ डटे हैं. निर्मला सीतारमण की यह यात्रा इस हल्ले के जवाब में थी लेकिन यह भी दिख रहा है कि राहुल गांधी का नहीं बल्कि हमारे रक्षा मंत्रियों का रूख हाल के वर्षों में उपेक्षा भरा (मनोहर पर्रिकर) और ढुलमुल (अरुण जेटली) रहा है.

Indian army soldiers are seen after snowfall at India-China trade route at Nathu-La

भारतीय सेना के जवान मुश्किल परिस्थितियों में भारत-चीन बॉर्डर से लगे इलाके की निगरानी करते हैं

ऐसे में जाहिर है, नए रक्षा मंत्री का जिम्मा बनता है कि वो इस छवि को बदलें. भले ही हमारे सैन्य-प्रमुख यह संदेश देने में लगे हैं कि गोला-बारुद कम है तो क्या, हम पड़ोसी मुल्कों से निपट लेंगे जो कि निश्चित ही वीरता की बात है. लेकिन साथ ही साथ यह खतरनाक तरीके से गैर-जिम्मेदाराना भी है.

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