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SC जजों की प्रेस कांफ्रेंस: खतरे की घंटी या न्यायिक सुधारों की शुरुआत?

आज की प्रेस कांफ्रेंस की गूंज से सरकार न्यायपालिका में सुधारों के लिए संसद के विशेष सत्र से सार्थक शुरुआत कर सकती है

Updated On: Jan 12, 2018 04:12 PM IST

Virag Gupta Virag Gupta

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SC जजों की प्रेस कांफ्रेंस: खतरे की घंटी या न्यायिक सुधारों की शुरुआत?
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कलकत्ता हाईकोर्ट के जज कर्णन ने जजों के भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रेस कांफ्रेंस किया था, जिसके बाद अवमानना के जुर्म में उन्हें जेल भेज दिया गया. कर्णन को जेल भेजने का फैसला देने वाले जजों में सुप्रीम कोर्ट के सभी चार जज जे चेलमेश्वर, रंजन गोगोई, मदन लोकुर और कुरियन जोसफ शामिल थे. इन्हीं चार जजों ने आज की प्रेस कांफ्रेंस और 2 महीने पुराने पत्र के माध्यम से चीफ जस्टिस के विरुद्ध गंभीर आरोप लगाए हैं.

सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों को महाभियोग की संवैधानिक प्रक्रिया से ही हटाया जा सकता है, जिसे लागू करना टेढ़ी खीर है. आज की प्रेस कांफ्रेंस को लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी बताया जा रहा है, पर इन्हें न्यायपालिका में सुधारों की शुरुआत के तौर पर देखना दिलचस्प होगा-

क्या अब जजों की नियुक्ति पारदर्शी तरीके से होगी?

प्रेस कांफ्रेंस करने वाले चारों जज चीफ जस्टिस के बाद वरिष्ठतम जज होने की वजह से कॉलेजियम के सदस्य हैं, जिसकी अनुशंसा से जजों की नियुक्ति होती है. एनजेएसी कानून रद्द होने के 3 साल बाद भी जजों की नियुक्ति हेतु एम्ओपी में बदलाव नहीं हुए. इस विवाद के बाद जजों की नियुक्ति प्रणाली में पारदर्शिता आने की संभावना बढ़ गई है.

मास्टर ऑफ रोस्टर द्वारा लिस्टिंग के नियम और परम्पराओं का पालन क्यों नहीं?

चीफ जस्टिस को मास्टर ऑफ रोस्टर मानने के कारण मुकदमों की लिस्टिंग का फैसला भी उनके द्वारा होता है. चार जजों ने 7 पेज के 2 महीने पुराने पत्र में चीफ जस्टिस को लिखा है कि महत्वपूर्ण मुकदमों की लिस्टिंग मनमाने तरीके से की जा रही है. सुप्रीम कोर्ट गौरवशाली परंपरा से संचालित होता रहा है, इसीलिए जजों को भगवान का दर्जा दिया जाता है. चीफ जस्टिस रोस्टर के मास्टर हैं, पर उन्हें नियमों के अनुसार ही अपने अधिकार का इस्तेमाल करना चाहिए. इस विवाद के बाद उम्मीद है कि अब सुप्रीम कोर्ट में मुकदमों के लिस्टिंग की पारदर्शी और वैज्ञानिक व्यवस्था लागू होगी.

न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के विरुद्ध प्रभावी तंत्र कैसे बने?

जब जजों को पंच परमेश्वर माना गया, उस समय किसी ने यह नहीं सोचा होगा कि दूसरों को दण्डित करने वाले भी भ्रष्टाचार में लिप्त हो जाएंगे. नियुक्ति के बाद संवैधानिक संरक्षण होने की वजह से जज लोग परम अमरता की स्थिति हासिल कर लेते हैं, क्योंकि उन्हें सिर्फ महाभियोग की असंभवपूर्ण प्रक्रिया के तहत ही हटाया जा सकता है. कर्णन जज के आरोप, कोलिखो पुल का सुसाइड नोट, मेडिकल कॉलेज स्कैम, जोया जज की मौत समेत अनेक मामलों में जजों के भ्रष्टाचार का खुलासा हुआ पर दंड किसी को भी नहीं मिला.

न्यायपालिका में दरार का सरकार लाभ लेने की कोशिश न करे

इस विवाद की तह में जोया जज की मौत के साथ अनेक ऐसे मामले हैं, जिनका सरकार से वास्ता है. आने वाले समय में आधार और राम मंदिर जैसे जरूरी मामलों पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ सकता है. चार जजों की प्रेस कांफ्रेंस के बाद चीफ जस्टिस ने अटॉर्नी जनरल से और प्रधानमंत्री ने कानून मंत्री से मुलाकात की. इस मामले में कई नए पहलू सामने आने पर सुप्रीम कोर्ट की विश्वसनीयता में कमी के साथ जजों की कमजोरी सामने आएंगी.

आज की प्रेस कांफ्रेंस की गूंज से सरकार न्यायपालिका में सुधारों के लिए संसद के विशेष सत्र से सार्थक शुरुआत कर सकती है. इसकी बजाय आपातकाल के पहले की घटनाओं की तर्ज पर न्यायपालिका में मतभेद का बेजा लाभ लेने की कोई भी सरकारी कोशिश लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी ही मानी जाएगी.

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