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इरोम शर्मीला चानू: दुनिया में फैलीं लेकिन जड़ों से कट गई

इरोम ना हिंसा कर सकती हैं ना राजनीति. तो इरोम का क्या होगा ये तो इरोम और वक्त बताएंगे.

Mukesh Bhushan Updated On: Mar 25, 2017 03:24 PM IST

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इरोम शर्मीला चानू: दुनिया में फैलीं लेकिन जड़ों से कट गई

इरोम शर्मिला चानू को तो आप जानते ही होंगे. वही जिसने दुनिया का सबसे लंबा अनशन किया और इस वजह के सबसे ज्यादा बार जेल गईं. वो जिसने अचानक अनशन तोड़ा और हाल के मणिपुर विधानसभा चुनाव में खड़ी हो गईं.

कुछ अनजान लोग तो इसलिए जानने लगे क्योंकि उन्हें मुख्यमंत्री इबोबी सिंह के खिलाफ महज 90 वोट मिले और देश का मीडिया रोने लगा.

नेशनल मीडिया ने शर्मिला को अबतक जितना कवरेज दिया है,उतना शायद ही कभी एक राज्य के रूप में मणिपुर को मिला हो. इसी तर्ज पर शर्मिला की हार के बाद शेष भारत ने जितने आंसू बहाए हैं, उसके मुकाबले नाम मात्र का अफसोस भी मणिपुर की आवाम ने महसूस नहीं किया.

हम जितना शर्मिला को समझ गए हैं, क्या उसका एक हिस्सा भी मणिपुर को समझ पाए हैं?

देश के साथ मणिपुर का यह कैसा रिश्ता?

इस छोटे से राज्य में 28 साल की एक लड़की के लिए इस रिश्ते को समझना तो और भी कठिन रहा होगा. साल 2000 में सुरक्षा बलों की फायरिंग में 10 लोगों के मारे जाने के बाद इरोम ने अचानक आमरण अनशन पर बैठने का फैसला किया.

उस वक़्त इरोम को उम्मीद रही होगी कि जिस तरह गांधी के अनशन से घबराकर अंग्रेज उनसे बातचीत को विवश हो जाते थे,आजाद देश की लोकतांत्रिक सरकार भी ऐसा ही करेगी.

लेकिन इस सरकार ने इरोम शर्मिला को आत्म-हत्या के प्रयास के जुर्म में गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया. चूंकि इस जुर्म में एक साल से ज्यादा गिरफ्तार नहीं रखा जा सकता, उन्हें बार-बार रिहा और गिरफ्तार किया जाता रहा, जो एक विश्व रिकार्ड बन गया.

मणिपुर में लागू जिस विशेष कानून (अफ्सपा) के खिलाफ शर्मिला ने इतना लंबा संघर्ष किया, उसपर विचार करना भी हमारे भारत देश ने आजतक जरूरी नहीं समझा. हालांकि, इसी भारत में शर्मिला की प्रसिद्धि लगातार बढ़ती चली गई फिर वह ‘इंटरनेशनल सेलिब्रिटी’ हो गईं.

जैसे-जैसे यह प्रसिद्धि बढ़ती गई, शर्मिला मणिपुर के लिए ‘दूर’ होती गईं.

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प्रसिद्ध समाजशास्त्री प्रो एमएन कर्ण कहते हैं कि इरोम शर्मिला की हार को आप मुख्यधारा की राजनीति से नहीं समझ सकते. कर्ण के हिसाब से जो बात मेनलैंड की राजनीति के लिए खास है, वही बात मणिपुर या उत्तर-पूर्व के लिए महत्वपूर्ण नहीं हो सकती.

शर्मिला ने जो किया वह पूरे देश के लिए असामान्य था, लेकिन उसे मणिपुर में किसी ने गंभीरता से नहीं लिया. हालांकि वो मणिपुर में लोकप्रिय हैं पर चुनाव लड़ने के फैसले पर तो लोग उनकी हंसी उड़ाते थे.

पिता व अमिताभ बच्चन में आप किसे चुनेंगे?

इंफाल घाटी में शर्मिला के एक पारिवारिक सदस्य (नाम न छापने की शर्त) ने इस हार को समझाते हुए कहा, मान लीजिए चुनाव में आपके पिताजी और अमिताभ बच्चन दोनों खड़े हों तो आप किसे वोट देंगे? जाहिर है अपने पिता को. इसका मतलब यह नहीं है कि अमिताभ को आप पसंद नहीं करते. शर्मिला यहां के लिए अमिताभ बच्चन हैं.

थउबल विधानसभा क्षेत्र के लोगों के लिए इबोबी सिंह पिता की तरह हैं. तीन टर्म वे सीएम थे.

मैतेयी समुदाय की मनोरमा देवी का कहना है, ‘क्या सोचकर वह इबोबी सिंह के खिलाफ खड़ी हुई, यह तो वही बता सकती है. उसे 90 लोगों ने क्या सोचकर वोट दिया, यह भी समझना मुश्किल है’.

इरोम के चुनाव लड़ने के फैसले से राज्य के जानेमाने कलाकार ईश्वर लेयिसामथेंक का तो जैसे दिल ही टूट गया. वो कहते हैं, ‘हम लोगों ने, चित्र बनाए, स्कल्पचर बनाए. उसके लिए उस समय खड़े हुए जब कोई मदद के लिए सामने नहीं आ रहा था. लेकिन आयरन लेडी ने अचानक अनशन तोड़ दिया और चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी,उसके बाद हमने उससे बात नहीं की’.

शर्मिला अपने घर से महज एक किमी दूर अस्पताल में थीं, जिसे जेल बना दिया गया था. उपवास के 16 सालों के दौरान इरोम अपने मन में जिस भीड़ के साथ खड़ी रही होंगी, हकीकत में वह न जाने कब की छंट चुकी थी.

दशकों पहले देवानंद की फिल्म ‘गाइड’ को याद करें, जब सूखाग्रस्त इलाके के लोग एक साधारण आदमी को किस तरह दैवीय शक्ति से संपन्न अपना ताड़नहार मान लेते हैं. फिर कल्पना करें, क्या होता अगर बारिश नहीं होती?

अब कभी चुनाव न लड़ने की भावुक घोषणा करते हुए वह राज्य से वाकई बहुत दूर केरल में कहीं एकांतवास पर चली गई हैं. मणिपुर का मोबाइल नंबर अस्थायी तौर पर बंद है और किसी नए नंबर की जानकारी लेना निकट संबधियों ने भी जरूरी नहीं समझा है.

क्या ट्रेलर दिखाकर खत्म हो गई फिल्म?

अब कभी चुनाव न लड़ने के फैसले पर शर्मिला के पड़ोसी इरोम केके कहते हैं, यही तो उसकी कमजोरी है. इसी कारण लोग उसपर भरोसा नहीं कर पाते. जबकि, उसका जो सपना है वह बहुत बड़ा है. जो भी राजनीति में आया है, सबने राज्य के लोगों को धोखा दिया है. सपने दिखाए और भूल गए.

राज्य के लिए कुछ भी अच्छा नहीं हो रहा. चाहे इनर लाइन परमिट का मामला हो या मैतेयी को फिर से ट्राइबल स्टेटस दिलाने का? इतने दिनों तक अनशन करने के बाद क्या अफ्सपा खत्म हुआ?कैसे कोई किसी पर भरोसा करेगा?

शर्मिला के चुनाव न लड़ने का फैसला ऐसा ही है जैसे कोई फिल्म शुरू हुई और ट्रेलर दिखाकर समाप्त हो गई.

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शर्मिला के पास पैसा नहीं है, संगठन नहीं है, आगे राजनीति कैसे करेंगी? इरोम के इस पड़ोसी से जवाब मिला ‘मुख्य बात है- भरोसा. यह नहीं कि कभी अनशन पर बैठ गया. सोलह साल तक बैठा ही रहा. अब हर कोई अपना काम धंधा छोड़कर इतने लंबे समय तक उसके साथ कैसे खड़ा हो सकता है? अचानक अनशन तोड़ दिया. फिर चुनाव लड़ने आ गया, वह भी सीएम के खिलाफ. फिर छोड़कर चला गया.’

क्या है शर्मिला का राजनीतिक भविष्य?

राष्ट्रपति पुरस्कारप्राप्त फिल्मकार मेघनाथ नहीं मानते कि अच्छे लोगों का राजनीति में कोई भविष्य है.

मेघनाद कहते हैं ‘सरकार नक्सलियों से कहता है कि हथियार डाल दो तो तुम्हारे साथ बातचीत करेंगे. क्या कभी शर्मिला बात हुई? क्या स्टेट ने मेधा पाटेकर के साथ बात किया? क्या ये लोग हथियार उठाकर घूम रहे थे?

काश! मेनलैंड इंडिया की होती शर्मिला

हालांकि, वह मानते हैं कि यदि शर्मिला मणिपुर के बाहर मेनलैंड इंडिया की होतीं तो उनके संघर्ष का परिणाम अलग हो सकता था. उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश में जेल जाना राजनीतिक पूंजी हो सकती है. मणिपुर में ऐसा नहीं है.

इसे समझने के लिए वहां के राजनीतिक इतिहास को देखना होगा. अंग्रेजों के जमाने में यह ‘एक्सक्लूटेड एरिया’ माना जाता था. आजादी के विशेष अधिकार दे कर उसे भारत में जोड़ा गया. लेकिन, देश की मुख्यधारा की राजनीति के लिए वह कभी महत्वपूर्ण नहीं रहा क्योंकि वहां से लोकसभा और राज्यसभा की चंद सीटें ही आती हैं.

उत्तर पूर्व के असंतोष को तब ही सुना जाता है जब वो हिंसक हो जाए और पूरे इलाके को अस्थिर करने लगे.

पर इरोम ना हिंसा कर सकती हैं ना राजनीति. तो इरोम का क्या होगा ये तो इरोम और वक्त बताएंगे. लेकिन इरोम और उनकी राजनीति को नजरंदाज करना पूरे देश की आत्मा के लिए बुरा है.

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