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अंतरराष्ट्रीय योग दिवस: एक संस्थान और लाखों के प्रचार के बीच छिपता योग

एक तरफ लाखों के विज्ञापन से योग को प्रमोट किया जा रहा है वहीं दूसरी तरफ योग शिक्षकों को जरूरत योग्य भी पैसे नहीं मिल रहे हैं

Puneet Saini Puneet Saini Updated On: Jun 21, 2017 02:23 PM IST

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अंतरराष्ट्रीय योग दिवस: एक संस्थान और लाखों के प्रचार के बीच छिपता योग

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस से पहले देश के अलग-अलग हिस्सों में होर्डिंग टांगे गए थे. लोगों को इश्तिहार के जरिए बताया गया था कि उठो देशवासियों समय आ गया योग करने का. लाखों-करोड़ों लोगों को योग का महत्व बताने के लिए खर्च किए गए. सवाल ये भी उठना गलत नहीं है कि एक ही दिन क्यों? अगर कैमरों के सामने योग करना ज्यादा अच्छा लगता है, तो रोज करिए. एक ही दिन क्यों?

योग दिवस के लिए नेताओं की फौज लोगों को योग सिखाने आई. अलग-अलग मंचों पर गाजे बाजों से स्वागत किया गया. लोगों को विश्वास दिलाया जाएगा तुम्हारे दुखों का निवारण अगर कोई कर सकता था तो वो सिर्फ योग था. सोचिए जिस देश में योग सिखाने के लिए जरूरत योग्य संस्थान भी ना हो. योग गुरू बहुत हों लेकिन योग शिक्षकों को अपनी घर का चूल्हा जलाना मुश्किल हो रहा हो. क्योंकि उन्हें योग की शिक्षा देने के बदले जरूरत योग्य पैसे भी नहीं मिल रहे हैं.

योग किसके लिए जरूरी है. सरकार के लिए या लोगों के लिए. फ़र्स्टपोस्ट हिंदी ने योग गुरू धीरज वशिष्ठ से बात की. जिसमें उन्होंने बताया कि किस प्रकार योग को गलत दिशा में ले जाया जा रहा है.

सवालयोग लोगों के रुटीन में क्यों नहीं उतर पाता?

जवाब: आधुनिक लाईफ स्टाइल है तो लोगों के जीवन में नई-नई चुनौतियां भी सामने आ रही हैं. लोग अभी भी रोजाना योग नहीं कर रहे हैं. क्योंकि योग है क्या इसे ठीक ढंग से समझाने की जरूरत है. योग खासतौर से युवा में नहीं है. महिलाएं योग के प्रति जागरूक हैं. महिलाओं के लिए योग शारीरिक रूप से बहुत फायदेमंद है. दिन प्रतिदिन योग को अपनी दिनचर्या में उतारना होगा. योग दिवस की फॉर्मेलिटी से कुछ नहीं होने वाला है. युवाओं को बताना होगा कि योग आपके करियर को भी चमकाता है.

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सवालयोग के साथ कैसे खिलवाड़ हो रहा है?  

जवाबयोग को अलग-अलग मंच पर उठाने की जरूरत है. लाखों के होर्डिंग लगाने से योग का भला होने वाला नहीं है. योग व्यायाम बनाता जा रहा है. अब बताइए अहमदाबाद में करोड़ों के होर्डिंग से बाबा रामदेव का स्वागत हो रहा है. वहीं एक ही सरकारी संस्थान है योग सिखाने का. इसकी जगह अगर योग सिखाने के संस्थान और खुलेंगे तो जाहिर सी बात है. उससे ज्यादा फायदा होगा. इस खिलवाड़ को अब बंद करना होगा.

सवालपहले के योग में और अब प्रचार के दौर में योग में क्या अंतर आया है?

जवाब: पतंजलि ने अभी एक विज्ञापन जारी किया था. जिसमें उनका दावा था कि कपालभाति से 99 प्रतिशत रोगों का निवारण होगा. अब बताइए सिर्फ कपालभाति से कैसे कमर का या जोड़ों का दर्द सही होगा. और भी तो आसन करने होंगे. तो इस तरीके से ये अपना प्रचार और योग का दुष्प्रचार हो जाता है. जो किया भी जा रहा है.

सवालसरकार के प्रचार से क्या फायदा होगा?

जवाब: प्रधानमंत्री के योग करने से लोग योग की तरफ बहुत बड़ी संख्या में आकर्षित हुए हैं. लेकिन राजनीतिक पार्टियों को योग के मंच से दूर रहना होगा. अब राजनीतिक पार्टियों में योग की होड़ सी लग गई है. इनमें से बहुत सारे नेता ऐसे होते हैं जो योग सिर्फ योग दिवस वाले दिन करते हैं. अमेरिका में कभी राष्ट्रपति को देखा है योग करते हुए. सरकारी संस्थान में योग टीचर को कम पैसे मिलते हैं. वहीं राजनीति चमकाने के लिए करोड़ों रुपए फूंक दिए जाते हैं.

सवालबाबा रामदेव ने योग को खेल बनाने के लिए कहा है आपका क्या कहना है?

जवाबअगर ऐसा होता है तो ये योग के लिए दुर्भाग्य होगा. योग मानवीय व्यक्तित्व को समझते हुए सांस्कृति एक्टिविटी है. हम लोग इसे खेल नहीं कह सकते. इसे खेल से अलग रखना चाहिए.

सवालफ़र्स्टपोस्ट हिंदी के रीडर्स के लिए क्या मैसेज देना चाहते हैं?

जवाबलोगों के लिए जहां एक तरफ शारीरिक गतिविधि घटती जा रही है. वहीं मानसिक गतिविधि बढ़ती जा रही है. योग से हमारा करियर भी चमकेगा. योग से आपको मानसिक और शारीरिक बल मिलता है. जो आपके लिए और आपके करियर के लिए बहुत फायदेमंद है. इसलिए योग से दूरी नहीं करीबी बढ़ाएं.

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