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महिला दिवस: मिलिए उन महिलाओं से जिन्होंने बदल दिए सालों पुराने कायदे-कानून

इन महिलाओं ने भारत के कानून की किताबों पर ही नहीं बल्कि लोगों के छोटे दिमाग पर भी अपनी अमिट छवि छोड़ी है

Runa Ashish Updated On: Mar 08, 2017 03:44 PM IST

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महिला दिवस: मिलिए उन महिलाओं से जिन्होंने बदल दिए सालों पुराने कायदे-कानून

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के दिन आइये हम आपको रूबरू करवाते हैं कुछ ऐसी महिलाओं से जिन्होंने भारत के कानून की किताबों पर ही नहीं बल्कि लोगों के छोटे दिमाग पर भी अपनी अमिट छवि छोड़ी है. कुछ ने कानून की पुनर्स्थापना की तो किसी ने कानून लाने पर बात की.. मिलते हैं ऐसी ही कुछ मिसालों से :

तृप्ति देसाई

महिलाओं को समानता दिलाने की राह पर मेरे सामने वो दिन भी आया जब इंटरनेट पर मेरी अश्लील तस्वीरें पसरने लगीं. लेकिन फिर भी मैंने हार नहीं मानी.शनि शिंगणापुर और त्र्यंबकेश्वर और महालक्ष्मी जैसे नामी मंदिरों के गर्भ-गृह में जाकर मैंने भगवान के दर्शन किये हैं.

देश में पिछले एक साल में भूमाता ब्रिगेड के जरिए लोगों की नज़रों में चढ़ने से ले कर नजरों में खटकने तक का सफर तय करने वाली तृप्ति देसाई को पहली बार शनि शिंगणापुर के बारे में और वहां महिलाओं के अस्पृश्य होने की बात टीवी पर पता चली.

तृप्ति का कहना है कि, 'मैं अपने घर में डिनर करते समय वो खबर देख रही थी जिसमें 29 नवंबर 2013 को एक महिला ने जब शनि मंदिर में एक चबूतरे को छू लिया था तो मंदिर को जलाअभिषेक करके धोया गया था.

तब मुझे लगा कि हम किस दुनिया में जीते है जहां जिस नारी के उदर से भगवान का जन्म होता है ऐसे मे उसी भगवान को अगर औरत छू लेती है तो भगवान अपवित्र हो जाते हैं. वैसे भी भगवान ने तो बुरा नहीं माना. शनि की साढ़े-साती तो पुरुष और महिला पर दोनों पर एक समान चलती है

तो फिर ये भेदभाव क्यों. बस उसी पल ठान लिया कि क्या करके दिखाना है. मुझे लगा कि 1950 मे भारतीय कानून का समानता का अधिकार मुझसे कहीं छीन लिया गया है.

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तृप्ति देसाई (तस्वीर-फ़र्स्टपोस्ट)

तृप्ति आगे बताती हैं कि, 'हमारे खिलाफ लोग खड़े हो गए थे, प्रदर्शन कर रहे थे लेकिन हमने और मेरे समूह ने अपना मन मजबूत करके रखा था. वैसे भी हमारे खिलाफ हमले करने की बात भी हुई, लेकिन हम रुकने वालों में से नहीं थे. फिर आपने भी देखा होगा कि ये जो बेकार की मान्यताएं और रूढ़ियां थीं वो हमारे सामने हार गईं और महिलाओं की जीत हुई.'

हमने उनसे पूछा कि वे महिला दिवस के मौके पर महिलाओं के लिए कौन सी नई मुहिम करने वाली हैं?

इसके जवाब में तृप्ति ने कहा- 'हम महाराष्ट्र के कई गांवों और तालुकाओं में घूमे हैं और हमें कई महिलाओं ने कहा और बताया कि जो महिलाओं के खिलाफ अपराध हो रहे हैं और आए दिन रेप जैसी बातें पढ़ने और सुनने मिलती हैं तो उसमें शराब भी एक बड़ा कारण बन कर सामने आया है अब मेरा सपना है कि अपने राज्य को शराबमुक्त राज्य बनाऊं.'

 नूरजहां

मैं बचपन में जिस दरगाह को देखते-देखते बड़ी हुई वहां पर ही आज मुझे अंदर जाने से मना कर दिया गया. बस उसी दिन से मैंने अपनी लड़ाई शुरु कर दी ये बात साल 2012 की थी.

उस समय तो मुझे बहुत गुस्सा आया था. वैसे भी उस दरगाह में अलग-अलग समुदाय के लोग भी आते हैं, फिर कोई कैसे महिलाओं का प्रवेश बंद कर सकता है. साल 2011 तक तो वहां भी अंदर जाने की अनुमति थी और अचानक एक साल बाद नया नियम कैसे ला सकते हैं. मैंने सीधे दरगाह ट्रस्ट से बात करने की ठानी.

नूरजहां हाजी अली की दरगाह में इतनी बार गई हैं कि उन्हें खुद भी याद नहीं होगा, लेकिन उस साल की रोकटोक ने उन्हें दुखी कर दिया और उन्होंने अपने कुछ दोस्तों के साथ मिलकर इस बारे मे छानबीन करने की कोशिश की.

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नूरजहां ने ट्रस्टीज़ से मुलाकात की. वो बताती हैं कि, 'जब हम उन लोगों के सामने बैठे थे तो वो हम पर ही सवाल दागने लगे कि कैसे कोई औरत उन लोगों से इस तरह की बात कर सकती है. उन्हें घर की चारदिवारी से निकलना ही नहीं चाहिए.

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राइट टू पी के कार्यकर्ता (तस्वीर-फ़र्स्टपोस्ट)

इतना ही नहीं कमिटी वाले ये भी कहने लगे कि जब महिलाएं सजदे में झुकती हैं तो उनके दामन के सरक जाने की संभावना बढ़ जाती है तो हम ये सब दरगाह में नहीं चाहते हैं. इसके अलावा दरगाह मे महिलाओं का आना-जाना लगा रहेगा तो उनकी सुरक्षा को नुकसान हो सकता है. फिर क्या पता कई लड़के और लड़कियां भी दरगाह पर आएं और ये हमारी संस्कृति के खिलाफ है. बस, इसलिए महिलाओं को दरगाह में प्रवेश नहीं मिलेगा.

नूर आगे कहती हैं कि, 'जब कमिटी वालों से बात नहीं बनी तो हम नेताओं के पास भी गए. लेकिन निराशा ही हाथ आई. हमारे इस केस को लेने के लिए कोई वकील भी तैयार नहीं था. फिर हमने हाईकोर्ट के दरवाजे खटखटाए और अगस्त 2016 में इसका फैसला हमारे पक्ष में आया.'

लेकिन इसके बाद इस फैसले पर सुप्रीम कोर्ट का स्टे-ऑर्डर लग गया था लेकिन अंत में जीत अक्टूबर 2016 में तो हमारी ही हुई. लगभग 4 साल बाद हम दो सौ महिलाएं दरगाह में अंदर जा पाईं. आने वाले दिनों में नूर को आप तलाक जैसे विषयों पर हक की बातें करते देखेंगे.

चारू खुराना

मैं जब सुप्रीम कोर्ट में खड़ी थी और अपने हक की लड़ाई लड़ रही थी कि महिला होने के नाते किया मैं बॉलीवुड में मेकअप आर्टिस्ट क्यों नहीं बन सकती हूं. क्यों मुझे सिने कॉस्ट्यूम एंड मेकअप आर्टिस्ट एसोसिएशन वाले काम करने के लिए कार्ड नहीं दे रहे हैं.

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चारु खुराना ((तस्वीर-फ़र्स्टपोस्ट)

उस समय वहां मौजूद सभी गणमान्य लोगों को ये जान कर हैरानी और दुख हुआ कि हमारे संविधान को बने 65 साल हो गए हैं तो फिर ये नियम या कानून कैसे बन गया कि कोई महिला फिल्म इंडस्ट्री में हेयर ड्रेसर तो बन सकती है लेकिन वो मेकअप नहीं कर सकती है. ये भेदभाव को किस तरह से और किसने अनुमति दी है.

मेकअप आर्टिस्ट चारू खुराना साल 2013 से 2015 तक, तीन सालों से देश के सभी लोगों को समझाने की कोशिश कर रही थीं कि मेकअप जैसे नितांत महिलाओं को लुभाने वाले प्रोफेशन में महिलाओं को हीं काम करने की अनुमति नहीं दी जा रही है.

दिल्ली की चारू बताती हैं कि, 'उन्होंने साल 2005 में मुंबई में बॉलीवुड में मेकअप आर्टिस्ट बनने के लिए कदम बढ़ाए. लेकिन धीरे-धीरे फिल्म फेडेरेशन वालों ने कार्ड बनाने पर जोर दिया और कई बार वे लोग मेरे सेट पर आ जाते थे.'

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चारू आगे बताती हैं, 'इस वजह से फिल्मों की शूट भी रुक जाती थी. जाहिर है कोई भी निर्माता बार-बार इस तरह की चीजें अपने सेट पर नहीं होने देगा. उनका बहुत नुकसान हो जाया करता था जब फिल्म की शूटिंग इस वजह से रुक जाती या इसमें ब्रेक लग जाता.'

वे आगे कहती हैं, 'मैंने कई बार फेडेरेशन के चक्कर भी लगाए लेकिन बात वहीं पर रुक जाती है कि मैं महिला होने की वजह से मेकअप क्यों नहीं कर सकती हूं लेकिन मर्द कर सकते हैं.'

जब मैंने ये केस जीता तो लगा कि एक कलाकार जीत गया है. मेकअप तो एक आर्ट ही है ना. कला में कभी किसी का जेंडर बायस कैसे बीच में आ सकता है. वो तो कलाकार हैं फिर चाहे मर्द हो या औरत.

फिर आप देख सकते हैं कि साल 2015 से जब से महिलाओं को मेकअप करने के लिए बने प्रतिबंध को रद्द कर दिया गया है तब से फिल्म इंडस्ट्री में महिलाओं की स्थिति भी तो मजबूत हुई है ना.

 सेफ-बर्थ

हम मॉर्डनाइजेशन के नाम पर अपनी ही संस्कृति को पहले घर से बाहर का दरवाजा दिखाते हैं फिर जब उसे पश्चिम के लोग अपना लेते हैं तो हम फिर से मॉर्डनाइजेशन के नाम पर अपना भी लेते हैं.

आज जब देश में एक-एक करके कई महिलाएं सिजेरियन ऑपरेशन के जरिए बच्चा पैदा करने लगी हैं तो क्या वो खुद जानती भी हैं कि उन्हें वजाइनल डिलीवरी और सी-सेक्शन के बारे में पूरी मालूमात होनी चाहिए.

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सुबर्ना (तस्वीर-फ़र्स्टपोस्ट)

पैसों के नाम पर कई जगहों पर सी-सेक्शन यानी ऑपरेशन के जरिए प्रसव कराए जाते हैं क्योंकि इसमें एक तो डॉक्टरों का समय कम लगता है और पैसे अच्छे खासे कमाए जा सकते हैं.

मेरा कहना सिर्फ इतना है कि देश भर के जितने भी मैटरनिटी हॉस्पिटल हैं या बड़े-सरकारी और निजी अस्पताल हैं वो अपने यहां सी-सेक्शन और नॉर्मल दोनों तरह की डिलीवरी के आंकड़ें सार्वजनिक करें.

महिलाओँ के प्रजनन अधिकार यानी रीप्रोडक्टिव अधिकारों पर खास काम करने वाली सुबर्ना ने हाल ही में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय मे मेनका गांधी को अपनी ये पिटीशन दी है और साथ देने आए लोगों के बारे में भी बताया है.

सुबर्ना कहती हैं कि,  'मैं कोलकाता में रहती थी और पत्रकार के तौर पर भी महिलाओँ के लिए लिखना पसंद करती थी. इस पिटीशन में कभी-कभी इतनी खो जाती हूं कि भूल जाती हूं कि मैं ये अपने पैशन को सार्थक करने के लिए कर रही हूं. आजीविका के लिए मुझे कुछ और भी करना चाहिए.'

सुबर्ना आगे बताती हैं, 'मैं महिलाओं के प्रसव और उनकी संतान उत्पन्न करने के अनुभवों पर पीएचडी भी कर रही हूं. मैं तो इस पिटीशन पर काम कर रही थी लेकिन इसकी प्रसिद्धी मेनका गांधी के ऑफिस तक भी पहुंची और वहां से कहा गया कि इस बारे में बहुत बातें हो रही हैं तो क्यों ना इस बारे में बात करके समझ लिया जाए.'

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के लिए सुबर्ना कहतीं हैं कि, 'मेनका गांधी से मिलना मेरा ध्येय नहीं है. मेरा ध्येय दो बातें हैं एक तो सी-सेक्शन की बढ़ती दर को कम करने के लिए लोगों और सरकार को चेताना और दूसरा देश में विलुप्त होती जा रही परंपरा यानी दाई मां की परंपरा को नया जीवन देना.' वे कहती हैं, 'हो सकता है कि नए जमाने की दाईयां विरासत ही नहीं सचमुच में ट्रेंड दाईयां बन कर उभरें. रोजगार केअवसर तो अपने आप बढ़ ही गए हैं ना.'

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आज के समय में देश की औद्योगिक नगरी मुंबई में जहां नौकरी करने के लिए महिलाएं घर से सबह 5 या 6 बजे निकल कर 25 से 80 किलोमीटर तक का सफर कर लेती हैं तो ऐसे में कुछ महिलाएं ऐसी भी हैं जो घर से सिर्फ दो- तीन घंटे के लिए ही निकलना पसंद करती हैं.

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राइट टू पी के कार्यकर्ता (तस्वीर-फ़र्स्टपोस्ट)

दोनों तरह की महिलाओं की समस्या एक ही है और वो ये कि उन्हें कहीं भी साफ और स्वच्छ शौचालय नहीं मिलते हैं. अगर कभी कोई मिल भी गया तो उसका इस्तेमाल करने के बदले में पैसे भी देने पड़ते हैं.

ऐसे में मुंबई मे लगभग 10 ऑर्गेनाइजेशंस हैं जो 'राइट-टू-पी' जैसे मुद्दे पर काम कर रहे हैं. ये वो महिलाएं हैं जो ग्रासरूट लेवल पर जा कर इस समस्या का निवारण करने में लगी हैं.

ऐसी ही एक महिला मुमताज़ शेख़ भी हैं जो कहती हैं कि मुंबई जैसे शहरों में भी टॉयलेट बनाना समस्या नहीं है. समस्या ये है कि एक शौचालय बनाने के लिए बीएमसी में ही कम से कम 21 तरह के एनओसी लाने पड़ते हैं.

शौचालय बनाने के लिए बीएमसी, एमएमआरडीए, पानी विभाग, फिर बिजली विभाग..इन सबसे एनओसी लेने जाना पड़ता है और ये सब करते-करते इसमें एक साल जितना समय भी लग जाता है.

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मुमताज़ कहती हैं, 'काश कि ये सारे कागजी काम एक ही जगह पर निपट जाएं. हम पिछले 5 सालों से इस मुद्दे पर जमीनी काम कर रहे हैं और अब जाकर लगता है कि जल्द ही बदलाव आएगा.'

मुमताज़ बताती हैं कि, 'सिर्फ इतना ही नहीं कई बार हमें पॉलिटिकल प्रेशर का भी सामना करना पड़ता है कि फलां जगह लोग रहते हैं या रिहायशी बिल्डिंग है या अगले दो महीने में मॉल शुरु हो जाएगा तो यहां शौचालय ना बनाएं. कई बार कहा जाता है कि किसी गली के आखिर में शौचालय बना लो.'

वे आगे कहती हैं कि अब लोगों को अपनी सोच भी बदलनी चाहिए. सभी लोग मोदीजी के स्वच्छता अभियान से जुड़ना तो चाहते हैं और फोटो भी खिंचवा लेना चाहते हैं, लेकिन देश की आधी आबादी वाली महिलाओं के लिए निशुल्क और बुनियादी सुविधा देने के लिए कोई भी पूरे मन से तैयार नहीं होता है.

जसलीन रॉयल – महिला संगीत निर्देशिका

मैं गूगल करके देखती थी कि फिल्म इंडस्ट्री में कौन-कौन सी फीमेल म्यूजिक डायरेक्टर हैं तो सिर्फ स्नेहा खानविलकर और ऊषा खन्ना का नाम पढ़ने को मिलता था.

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मैं तो सिर्फ़ संगीत निर्देशक बनना चाहती थी सिर्फ अपने संगीत से प्यार है मुझे. लेकिन कभी भी सोचा नहीं कि मैं लड़की हूं तो बतौर म्यूजिक कंपोजर मुझे इंडस्ट्री के लोग अच्छे से नहीं ले रहे हैं या ज्यादा संजीदगी से ले रहे हैं.

मुझे फिल्मों में हमेशा इस बात पर परखा गया कि मैं उनके लिए क्या गाना ले कर आई हूं. मुझे कोई भी अच्छा संगीत देने से रोक न पाएगा. अगर मैं संगीत निर्देशक नहीं बनती तो पता नहीं क्या बनती.

फिलौरी की संगीत निर्देशक जसलीन रॉयल बताती हैं कि, 'जब मैं फिल्लौरी में व्हाट्सऐप गाना बना रही थी तो मेरे लिए निर्दशक ने इतना ही कहा था कि गाना ऐसा बनाना कि वो सूरज-मेहरीन और अनुष्का और दलजीत पर फिट हो जाने वाला गाना हो.'

जसलीन आगे कहती हैं, 'वैसे भी ये आज का गाना है लेकिन कहीं-कहीं कुछ ऐसे भाग हैं जो आपको पुराने जमाने में लेकर जाते हैं. आने वाले दिनों में मैं फुरके-2 और वीरे-दी-वेडिंग में भी काम कर रही हूं.'

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