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स्वरा-तापसी ने पूछा 'कितना क्लीवेज दिखाना ठीक', कृति बोलीं-हैप्पी वाटएवर!

अभिनेत्री स्वरा भास्कर और तापसी पन्नू ने पहनावे को लेकर अपने नजरिए रखे हैं

FP Staff Updated On: Mar 09, 2017 10:55 AM IST

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स्वरा-तापसी ने पूछा 'कितना क्लीवेज दिखाना ठीक', कृति बोलीं-हैप्पी वाटएवर!

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस को सेलिब्रेट करने से लेकर महिलाओं के प्रति नजरिए को लेकर कई तरह के राय हमेशा से रहे हैं. ऐसे ही विचारों वाले बॉलीवुड की दो हिरोइनों ने अपने वीडियो इस मौके पर शेयर किए हैं. पहले वीडियो में अभिनेत्री स्वरा भास्कर और तापसी पन्नू हैं.

'हाउ मच क्लीवेज इज गुड क्लीवेज' के शीर्षक से बने इस वीडियो में दोनों ही कलाकर बड़े ही व्यंग्यात्मक लहजे और उपहास उड़ाते हाव-भाव से ये बताने की कोशिश करती हैं कि, महिलाओं और लड़कियों के कपड़े पहनने के तौर-तरीकों पर किस तरह समाज हावी है.

वीडियो में पहले दोनों ही लड़कियां इन तौर तरीकों का मजाक करती हैं, फिर सभी महिलाओं और लड़कियों से कहती हैं कि वे अपने शरीर को लेकर शर्मिंदा न हो. भगवान ने हमें जैसे बनाया है, हमें उसपर गर्व करना चाहिए और अपने मन-मुताबिक कपड़े पहनना चाहिए.

दूसरे वीडियो में अभिनेत्री कृति सैनन एक प्लेकार्ड के जरिए संदेश देने की कोशिश कर रहीं हैं.

कृति प्लेकार्ड के जरिए कहती हैं कि, आज 8 मार्च है जो किसी भी दिन से अलग नहीं हैं. हम आज कई तरह की बातें सुनेंगे- जिसमें महिलाओं को समानता, गर्ल पॉवर और जेंडर इक्ववलिटी की बातें और इससे मिलता-जुलता बकवास होगा.

वे आगे कहती हैं, इसके बावजूद- हमारी सड़कें लड़कियों के लिए असुरक्षित रहेंगी, हम पर बंदिशें बदस्तुर जारी रहेंगी और दूसरे लोग हमारे कपड़ों के बारे में निर्णय लेंगे.

अंत में वे कहती हैं कि लोग सिर्फ बातें करते हैं, जिसकी मुझे जरा भी परवाह नहीं है.

हैप्पी वाटएवर! यानि....भाड़ में जाइए.

जो लोग नहीं जानते उनको इस दिन के इतिहास के बारे में बताना जरूरी है. 8 मार्च के ही दिन साल 1914 में छह साल के लंबे संघर्ष के बाद यूरोप सहित दुनिया के बाकी देशों में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने का फैसला किया गया था.

इस आंदोलन की शुरुआत न्यूयॉर्क शहर में करीब 15 हजार महिलाओं ने वोट डालने, एक समान सैलरी और काम के कम घंटों की मांग करते हुए एक विरोध मार्च निकाला गया था.

इस आंदोलन की अगुवाई जर्मनी की कार्यकर्ता क्लारा जेटकिंस कर रहीं थीं. क्लारा ने प्रस्ताव रखा कि दुनिया के हरेक देश में किसी एक तारीख सुनिश्चित की जाए, जब महिलाएं अपने अधिकारों के लिए समाज और सरकार पर दबाव बना सकें.

शुरुआत में 19 मार्च की तारीख तय की गई जो बाद में 8 मार्च हो गई सिर्फ इसलिए कि आठ मार्च छुट्टी का दिन था.

यानि महिलाओं को अपनी आवाज उठाने के लिए जिस दिन को मुकर्रर किया गया था वो छुट्टी वाला दिन था और ऐसा करने के पीछे ये ध्यान रखा गया था कि किसी भी तरह के काम का नुकसान न हो.

हालांकि, दूसरी सोच के मुताबिक छुट्टी का दिन चुनने के पीछे की वजह ये थी कि सभी महिलाएं बड़ी संख्या में एकजुट होकर अपनी मांगे रख सके.

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