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इंदौर में रंगों की 'गेर' में मिट जाता है अपने और गैर का फर्क

इतिहास के जानकार बताते हैं कि शहर में गेर की परंपरा रियासत काल में शुरू हुई, जब होलकर राजवंश के लोग रंगपंचमी पर आम जनता के साथ होली खेलने के लिए सड़कों पर निकलते थे

Updated On: Mar 04, 2018 02:12 PM IST

Bhasha

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इंदौर में रंगों की 'गेर' में मिट जाता है अपने और गैर का फर्क

देश भर में होली का त्योहार दो मार्च को हर्षोल्लास के साथ मनाया गया. लेकिन मध्यप्रदेश के इस उत्सवधर्मी शहर में रंगों की असली खुमारी छह मार्च को रंगपंचमी पर चढ़ेगी, जब पारंपरिक 'गेर' में हजारों हुरियारे बगैर किसी औपचारिक बुलावे के उमड़कर फागुनी मस्ती में डूबेंगे.

गेर को 'फाग यात्रा' के रूप में भी जाना जाता है. रंगपंचमी पर सूरज के सिर पर आते ही ये रंगारंग जुलूस शहर के अलग-अलग हिस्सों से गुजरते हुए ऐतिहासिक राजबाड़ा (इंदौर के पूर्व होलकर शासकों का महल) के सामने पहुंचते हैं, जहां रंग-गुलाल की चौतरफा बौछारों के बीच हजारों हुरियारों का आनंद में डूबा समूह कमाल का मंजर पेश करता है.

बैंड-बाजों की धुन पर नाचते हुरियारों पर बड़े-बड़े टैंकरों से रंगीन पानी बरसाया जाता है. यह पानी टैंकरों में लगी ताकतवर मोटरों से बड़ी दूर तक फुहारों के रूप में बरसता है और लोगों के तन-मन को तर-बतर कर देता है.

एक-दूसरे को रंग नहीं लगाते हैं इस होली में

खास बात यह है कि गेर में कोई भी व्यक्ति एक-दूसरे को रंग नहीं लगाता. फिर भी हजारों हुरियारे एक रंग में रंग जाते हैं और अपने-पराये का भेद मिटता-सा लगता है.

संगम कॉर्नर क्षेत्र से निकलने वाली प्रमुख गेर इस रंगपंचमी पर अपने वजूद के 63 वें वर्ष में प्रवेश करने जा रही है. संगम कॉर्नर रंगपंचमी महोत्सव समिति के अध्यक्ष कमलेश खंडेलवाल ने 'पीटीआई-भाषा' को बताया, 'हमारी गेर में हिंदुओं के साथ मुस्लिम, सिख और ईसाई धर्म के लोग भी शामिल होंगे.'

उन्होंने बताया कि गेर में टैंकरों से रंगीन पानी की आसमान की ओर तेज बौछार करते हुए पर राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का दृश्य बनाया जाएगा.

इतिहास के जानकार बताते हैं कि शहर में गेर की परंपरा रियासत काल में शुरू हुई, जब होलकर राजवंश के लोग रंगपंचमी पर आम जनता के साथ होली खेलने के लिए सड़कों पर निकलते थे.

जानकारों के मुताबिक इस परंपरा का एक मकसद समाज के हर तबके के लोगों को रंगों के त्योहार की सामूहिक मस्ती में डूबने का मौका मुहैया कराना भी था. राजे-रजवाड़ों का शासन खत्म होने के बावजूद इंदौर के लोगों ने इस रंगीन रिवायत को अब तक अपने सीने से लगा रखा है. वक्त के तमाम बदलावों के बाद भी रंगपंचमी पर शहर में रंगारंग परेड रूपी ‘गेर’ का सिलसिला बदस्तूर जारी है.

गुजरे बरसों में कुछ सियासी नेताओं ने भी अपनी-अपनी गेर निकालने का सिलसिला शुरू कर दिया है.

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