live
S M L

भारत-जापान परमाणु करार: फायदे के सौदे की सच्चाई

जापान ने अब तक केवल इस बात को सैद्धांतिक सहमति दी है कि वह भारत के साथ एक नागरिक परमाणु संधि संपन्‍न कर सकता है

Updated On: Nov 18, 2016 11:52 AM IST

Jaideep Prabhu

0
भारत-जापान परमाणु करार: फायदे के सौदे की सच्चाई

भारत और जापान के बीच नागरिक परमाणु सहयोग संबंधी खबरों का भारतीय मीडिया में काफी गर्मजोशी के साथ स्‍वागत किया गया था. नौवें भारत-जापान वार्षिक शिखर सम्‍मेलन में हिस्‍सा लेने के लिए तीन दिनों के लिए भारत आए जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे की यात्रा की दूसरी सुबह इस संबंध में घोषणा की गई थी.

भारत में इसे लेकर उत्‍सवी माहौल के बावजूद दो देशों के बीच जिस बात पर सहमति बनी थी, अपने मूल संदर्भ और विवरणों में वह समझौता वास्‍तव में पर्याप्‍त संतोषजनक नहीं था और व्‍यवहार में यह बेहद मामूली साबित होगा.

पिछले पांच वर्षों से भारत और जापान के बीच परमाणु समझौता एक संवेदनशील मसला रहा है.

ध्‍यान रहे कि 2005 में अमेरिका ने सबसे पहले भारत के साथ अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर परमाणु व्‍यापार को दोबारा शुरू करने की पहल की थी और इस संदर्भ में अंतरराष्‍ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आइएईए) व परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) से उसने आग्रह किया था कि भारत के परमाणु अप्रसार व सुरक्षा के विश्‍वसनीय रिकॉर्ड के मद्देनजर उसे इस मामले में अपवाद की तरह बरता जाए, बावजूद इसके कि‍ भारत अब तक परमाणु अप्रसार संधि पर दस्‍तखत करने से इनकार करता रहा है.

इस दिशा में एक अंतरराष्‍ट्रीय कानूनी ढांचा 2008 आते-आते तैयार कर लिया गया और तब से भारत ने कई परमाणु सहयोग संधियां संपन्‍न की हैं जिससे वह अंतरराष्‍ट्रीय बाजार से परमाणु उपकरण और ईंधन खरीदने में समर्थ हो गया है.

जापान के साथ भारत के गर्मजोशी भरे रिश्‍तों के चलते भारत यह मान बैठा था कि एक बार अमेरिका और अन्‍य महाशक्तियों के साथ संधि हो जाए, तो जापान अपने आप ही ऐसा समझौता कर लेगा. इस मामले में भारत गलत लीक पर था, यह साबित हो चुका है.

modi japan

अंतरराष्‍ट्रीय परमाणु व्‍यापार में जापान की जगह अहम है. पिछले कुछ वर्षों के दौरान इस देश ने उच्‍च गुणवत्‍ता वाले कई परमाणु रिएक्‍टर घटकों के विनिर्माण में अपनी महारत विकसित की है तथा कम से कम तीन बड़े परमाणु विक्रेताओं- फ्रेंच फर्म अरेवा व अमेरिकी कंपनियों जनरल इलेक्ट्रिक व वेस्टिंगहाउस- की आपूर्ति श्रृंखला में इसने खुद को एक अहम कड़ी के रूप में स्‍थापित कर लिया है.

बड़ी कंपनियों के बीच देखें तो केवल रूस की रोजाटॉम और चीन की दो अहम सरकारी परमाणु कंपनियों चाइना जनरल न्‍सूक्लियर पावर ग्रुप (सीजीएन) और चाइना नेशनल न्‍यूक्लियर कॉरपोरेशन (सीएनएनसी) का काम ही जापानी घटकों के बगैर स्‍वतंत्र रूप से चल पाता है.

जापान के कठोर निर्यात नियंत्रण नियमों के तहत अंतिम प्रयोक्‍ता के प्रमाणन समेत कई अन्‍य शर्तें लागू हैं, जिसके चलते अमेरिकी और फ्रेंच परमाणु कंपनियों को भारत के साथ व्‍यापार करने के लिए पहले अपने जापानी आपूर्तिकर्ताओं की अनुमति प्राप्‍त करनी जरूरी है.

इस लिहाज से भारत के साथ जापान का परमाणु सहयोग न केवल टोक्‍यो की सहमति का मोहताज हो जाता है, बल्कि उसकी प्रतीकात्‍मक अहमियत भी बढ़ जाती है जैसा कि भारत के रवैये से स्‍पष्‍ट है.

भारत-जापान शिखर सम्‍मेलन में की गई घोषणा इस संदर्भ में एक संपूर्ण परमाणु संधि से कुछ पीछे रह जाती है. दोनों पक्षों ने महज एक संधिपत्र (एमओयू) पर दस्‍तखत किए हैं जिससे आगे की राह में मौजूद कानूनी व तकनीकी अवरोधों में थोड़ा कमी आई है.

सार रूप में देखें तो इसका आशय यह बनता है कि जापान ने अब तक केवल इस बात को सैद्धांतिक सहमति दी है कि वह भारत के साथ एक नागरिक परमाणु संधि संपन्‍न कर सकता है यानी एनपीटी (परमाणु अप्रसार संधि) पर दस्‍तखत नहीं करने वाले किसी देश के साथ परमाणु व्‍यापार न करने के अपने नियम में वह भारत को रियायत देने को तैयार हुआ है.

बेशक, इसे प्रगति का नाम दिया जा सकता है, लेकिन तकनीकी जरूरतों के मामले में दी गई इस रियायत के बदले भारत से जापान क्‍या मोल वसूलेगा या एक परमाणु संधि को जमीन पर उतरने में कितना वक्‍त लग जाएगा, यह अभी केवल अनुमान का मसला है.

दोनों देशों द्वारा जारी संयुक्‍त बयान से अगर कोई संकेत निकलता हो, तो कह सकते हैं कि जापान इसके बदले भारत से समग्र परीक्षण प्रतिबंध संधि (सीटीबीटी) और आणविक सामग्री कट-ऑफ संधि (एफएमसीटी) पर रियायत चाहेगा. भारत का पक्ष यह है कि ये दोनों संधियां परमाणु शक्ति के मामले में उस पक्षपातपूर्ण तंत्र को ही आगे बढ़ाती हैं जिसकी नींव एनपीटी ने डाली है.

भारत ने भले ही अपनी मर्जी से भविष्‍य के परमाणु परीक्षणों पर रोक लगाई हुई है, लेकिन इस संबंध में कानूनी रूप से बाध्‍यकारी किसी समझौते का हिस्‍सा बनना उसके लिए दूर की कौड़ी है.

modi

इतना ही नहीं, भारत के किए समझौतों (एमओयू) की नियति को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्‍य में भी देखा जाना होगा, जिसे ईरान स्थित चाबहार बंदरगाह के विकास में भारत की भूमिका या मध्‍यम बहुउद्देश्‍यीय युद्धक विमानों (एमएमआरसीए) के अनुबंध से समझा जा सकता है.

भारत और जापान एक समग्र नागरिक परमाणु सहयोग संधि संपन्‍न कर पाने में यदि कामयाब हो भी गए, तो भारत के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र पर उसका पर्याप्‍त प्रभाव पड़ने की गुंजाइश मामूली है.

अमेरिका के साथ अपने समझौते के क्रम में भारत ने एक परमाणु जवाबदेही कानून लागू करने पर सहमति दी थी, हालांकि 1984 की भोपाल गैस त्रासदी के आलोक में तैयार जवाबदेही की भारतीय व्‍याख्‍या अंतरराष्‍ट्रीय मानकों के अनुरूप नहीं ठहरी क्‍योंकि भारत किसी परमाणु हादसे की सूरत में होने वाले नुकसान की जिम्‍मेदारी को केंद्रित करते हुए आर्थिक मुआवजे की जवाबदेही को अकेले ऑपरेटर के कंधे पर डालने की बात मानता है.

नतीजा यह हुआ कि आज कोई भी विक्रेता भारत के परमाणु बाजार में प्रवेश करने को तैयार नहीं है. अरेवा के चेयरमैन जेफ इमेल्‍ट ने स्‍पष्‍ट शब्‍दों में कहा था कि वे नहीं चाहते कि उनकी कंपनी को भारतीय जवाबदेही कानून के अंतर्गत परमाणु आपूर्तिकर्ताओं के सामने रखी गई शर्तों का जोखिम झेलना पड़े.

अप्रैल 2015 में जैतापुर परमाणु संयंत्र के लिए लार्सन एंड टुब्रो के साथ एक प्री-इंजीनियरिंग अनुबंध पर दस्‍तखत करने के बावजूद अरेवा ने जवाबदेही पर और ज्‍यादा स्‍पष्‍टीकरण के इंतजार में वहां अपने काम की रफ्तार कम कर दी है.

इसी तरह वेस्टिंगहाउस जनवरी 2015 से ही भारत में अपने परिचालन के संबंध में आश्‍चर्यजनक रूप से चुप्‍पी साधे बैठा है, जबकि अमेरिकी राष्‍ट्रपति बराक ओबामा और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने परमाणु विक्रेताओं के लिए एक बीमा पूल का गठन कर के आपूर्तिकर्ता की जवाबदेही के संबंध में एक महंगी व जटिल व्‍यवस्‍था को उस वक्‍त जन्‍म दे दिया था.

जापान के साथ परमाणु सहयोग पर किसी समझौते से भारत को रिएक्‍टर के घटकों के लिए प्रौद्योगिकी हस्‍तांतरण का संभवत: इकलौता लाभ मिल सकता है, खासकर जापान स्‍टील वर्क्‍स के बनाए विशाल सिंगल प्‍लेट रिएक्‍टर प्रेशर वेसेल का. यह भी संभव है कि भारत अपने आपूर्तिकर्ताओं के विस्‍तार का लाभ उठाकर अपने यहां एक देसी परमाणु ऊर्जा उद्योग स्‍थापित कर सके.

ये दोनों ही बातें स्‍वागतयोग्‍य हैं, लेकिन इससे भारत में परमाणु ऊर्जा के उस तीव्र विस्‍तार में मदद नहीं मिलेगी जिसकी परिकल्‍पना 2008 में भारत-अमेरिका परमाणु संधि के आलोक में की गई थी. एक और संभावित लाभ भारत के फास्‍ट ब्रीडर रिएक्‍टरों (एफबीआर) के लिए प्‍लूटोनियम और इस्‍तेमाल हो चुके परमाणु ईंधन की खरीद के संबंध में मिल सकता है, बशर्ते मोदी इतना साहस दिखा पाएं.

यह प्रक्रिया भारत में थोरियम के रिएक्‍टरों के प्रचलन की शुरुआत कर सकती है जो परंपरागत रिएक्‍टरों के मुकाबले कहीं ज्‍यादा स्‍वच्‍छ, सस्‍ते, सुरक्षित और प्रसार-रोधी होते हैं.

इस बात पर अलग-अलग राय है कि जापान ने भारत के साथ परमाणु सहयोग के संबंध में अपने पक्ष को हलका क्‍यों किया है. जापान का अग्रणी दैनिक योमियुरी शिम्‍बुम लिखता है कि एक अहम परमाणु विक्रेता के रूप में चीन के उभार से जापान चिंतित है.

चीन ने तमाम साधनों से आधुनिक पश्चिमी डिजाइन को खरीद कर अपने देसी डिजाइनों में शामिल किया है जिसे अब वह दुनिया भर में बेच रहा है. चीन में विदेशी मुद्रा का विशाल भंडार उसे इस बात की छूट देता है कि वह अपने उन ग्राहकों को उधारी पर ये रिएक्‍टर बेच सके, जो वैसे भी अपने अंतरराष्‍ट्रीय साझीदारों के ऐसे विस्‍तार से खुश ही होगे.

इसके अलावा, अंतरराष्‍ट्रीय परमाणु बाजार से अपने कदम पीछे खींच कर और प्रमुख उपभोक्‍ताओं को आपूर्ति से इनकार कर के जापान प्रौद्योगिकीय लाभ के मामले में उसी स्थिति में पहुंच जाएगा, जो हाल आज ब्रिटेन का है.

यह व्‍याख्‍या दुरुस्‍त हो सकती है, लेकिन जापान की असली चिंता को जाहिर करने से कहीं ज्‍यादा यह अखबार के रूढ़िवादी वैचारिक झुकाव के साथ विरोधाभास में खड़ी है.

इस दिशा में किसी भी दलील को इस बात का संज्ञान भी लेना होगा कि एनपीटी पर दस्‍तखत नहीं करने वाले भारत जैसे किसी देश के साथ परमाणु रिश्‍ते बनाने के खिलाफ और जापान में परमाणु ऊर्जा विस्‍तार की विरोधी एक मजबूत लॉबी अब भी दुनिया में सक्रिय है.

देश में निष्क्रिय पड़े 43 रिएक्‍टरों को दोबारा चालू करना आबे सरकार के लिए वैसे भी एक चुनौती भरा काम रहा है.

भारत के नजरिये से देखें तो इस मामले में कुछ रणनीतिक और आर्थिक सरोकार भी काम कर रहे हैं. आबे इन बातों से अनजान नहीं हैं, लेकिन उनके लिए जरूरी है कि वे इस संधि पर जापान की जनता को राजी कर सकें और डाइट से भी इसे मंजूरी दिलवा सकें.

हो सकता है कि उनके दिमाग में यह बात हो कि ऐसा कोई समझौता एमओयू जैसे छोटे-छोटे कदमों के रूप में ही आगे बढ़ सकता है.

जहां तक मोदी का सवाल है, तो यह समझौता जब कभी होगा वे इसका अधिकतम लाभ लेने की कोशिश कर सकते हैं. इसके लिए उन्‍हें परमाणु ऊर्जा कानून में सुधार लाना होगा ताकि निजी क्षेत्र की सक्रिय भागीदारी को छूट दी जा सके. एक स्‍वतंत्र नियामक इकाई का गठन करना होगा, परमाणु क्षेत्र में पारदर्शिता को सुधारना होगा और अंतरराष्‍ट्रीय मानकों के अनुरूप भारत के परमाणु जवाबदेही तंत्र में संशोधन लाना होगा.

जापान के साथ एक नागरिक परमाणु सहयोग समझौते के चाहे जो भी संभावित लाभ हों, भारत ने आज की स्थिति में तो फिलहाल कुछ भी हासिल नहीं किया है.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
KUMBH: IT's MORE THAN A MELA

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi