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‘मी टू’ ने सदियों से शोषण की शिकार महिलाओं को चुप्पी तोड़ने की हिम्मत दी : इंदिरा जयसिंह

पुरुषों के पास ऐसी स्थिति में बहुत सारे रास्ते हैं. अव्वल तो सोशल मीडिया के माध्यम से जवाब दे सकते हैं. अगर पुरुष को लगता है कि उसके खिलाफ लगाए गए आरोप सही नहीं हैं तो इसे चुनौती देने के लिए अदालत जाने का विकल्प खुला है

Updated On: Oct 14, 2018 03:52 PM IST

Bhasha

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‘मी टू’ ने सदियों से शोषण की शिकार महिलाओं को चुप्पी तोड़ने की हिम्मत दी : इंदिरा जयसिंह

तनुश्री दत्ता ने नाना पाटेकर के खिलाफ 2008 में फिल्म 'हॉर्न ओके प्लीज' के सेट पर उनके साथ दुर्व्यवहार करने का आरोप क्या लगाया. धीरे धीरे फिल्म इंडस्ट्री के कई बड़े नाम बेनकाब हो गए. इसके बाद तो #MeeToo कैम्पेन की सुनामी सी आ गई है. एक के बाद एक कई बड़े चेहरों के इस गंदे कार्य में लिप्त होने के खुलासे हो रहे हैं.

इस अभियान के कानूनी पहलुओं पर पेश है वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह से पांच सवाल :

प्रश्न: ‘मी-टू’ मुहिम महिला सशक्तिकरण के लिहाज से कितनी प्रासंगिक और उपयोगी है ?

उत्तर: यह बहुत महत्वपूर्ण आंदोलन है. इसे हमें गंभीर नजरिए से देखना चाहिए. इसका योगदान यह होगा कि इससे महिलाओं के लिए सुरक्षित वातावरण बनाने में मदद मिलेगी. कुछ पीड़ित महिलाओं के मुखर होने से पूरे समाज में जागरुकता आ सकेगी. इस तरह की बातें अब छुपी नहीं रह सकतीं.

प्रश्न: शोषण के कई साल पुराने आरोप के सोशल मीडिया पर किए जा रहे दावों की कानूनी वैधता कितनी पुख्ता मानी जा सकती है ?

उत्तर: कानून की शरण में जाना या न जाना प्रत्येक महिला का अपना फैसला है, ऐसी भी महिलाएं हैं जो सालों साल चलने वाली अदालती प्रक्रिया के चलते अदालत नहीं जाना चाहतीं. ऐसे में महिलाओं ने यह बात समझ ली है कि हमारे पास और कोई रास्ता नहीं है, इसलिए इस आंदोलन का यही मकसद है कि हमारी आवाज को सुनो और उस पर विश्वास करो.

प्रश्न: इस मुहिम के तहत लगाए गए आरोपों पर कार्रवाई को लेकर आप सरकार की क्या भूमिका देखती हैं?

उत्तर: सरकार स्थिति को समझने की कोशिश कर रही है, शायद इसी का नतीजा है कि इस मुहिम के बाद केन्द्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने एक समिति का गठन किया है. इसमें महिलाएं अपनी समस्या रख सकती हैं. सरकार कानून में बदलाव करने की जरूरत को भी समझने की कोशिश कर रही है. उद्योग क्षेत्र, न्यायपालिका और पुलिस महकमे सहित सभी क्षेत्रों में क्या परिवर्तन आना चाहिए, उस पर विचार करना पड़ेगा.

प्रश्न: पीड़ित पक्षकार के रूप में पुरुष के पास बचाव के क्या रास्ते हैं ?

उत्तर: पुरुषों के पास ऐसी स्थिति में बहुत सारे रास्ते हैं. अव्वल तो सोशल मीडिया के माध्यम से जवाब दे सकते हैं. अगर पुरुष को लगता है कि उसके खिलाफ लगाए गए आरोप सही नहीं हैं तो इसे चुनौती देने के लिए अदालत जाने का विकल्प खुला है. इसके अलावा पीड़िता के स्वयं अदालत जाने पर पुरुष अपना बचाव पक्ष पेश कर सकते हैं, इस बारे में सभी कानूनी विकल्प खुले हैं.

प्रश्न: क्या यह मुहिम घर परिवार से लेकर कार्यस्थल पर महिलाओं के शोषण की समस्या के निराकरण का कारगर विकल्प बन पायेगी ?

उत्तर: यह सच है कि ये आंदोलन इस समस्या का पूरी तरह से निराकरण तो नहीं कर पाएगा. समस्या के स्थाई समाधान के लिए सोच में बदलाव की क्रांति लानी पड़ेगी, यह आंदोलन बदलाव की क्रांति का सिर्फ वाहक बन कर उसे आगे बढ़ा सकता है.

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