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सुहैब इलियासी की दबंगई से कभी पुलिस भी डरती थी!

सुहैब इलियासी को अपनी पत्नी की हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा हुई है

Sanjeev Kumar Singh Chauhan Sanjeev Kumar Singh Chauhan Updated On: Dec 20, 2017 04:44 PM IST

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सुहैब इलियासी की दबंगई से कभी पुलिस भी डरती थी!

तारीख और दिन तो याद नहीं है...साल 1999 था...जगह-आईटीओ स्थित दिल्ली पुलिस मुख्यालय..जिसे क्राइम रिपोर्टरों की भाषा में PHQ कहकर बुलाया जाता है. समय यही कोई शाम चार बजे का रहा होगा. एक दुबला-पतला लंबे कद का गोरा-चिट्टा लड़का सामने से तेज कदमों से धड़धड़ाते हुए गुजरा और एक आला-पुलिस अधिकारी के कमरे में बे-रोकटोक घुस गया. उसके पीछे चलने वाले चार पांच मुस्टंडे दरवाजे के बाहर मौजूद संकरी गली में ही रुक गए. वो इंसान तो कमरे के भीतर चला गया, मगर बाहर दो चीजें छोड़ गया.

पहली चीज थी उसके बदन से निकलने वाली नाक-फाड़ू तेज परफ्यूम की खुशबू. दूसरा मेरे जेहन में यह सवाल कि आखिर वो मेहरबां था कौन? जिसे आला पुलिस अफसर के किसी भी सिपहसलार ने दरवाजे पर रोकने की जुर्रत नहीं की. खुद पर कोफ्त हुई कि हम एक दशक से पुलिस मुख्यालय के रोज चक्कर काट रहे हैं और आज तक ऐसी छूट हमें नहीं मिली.

पूछने पर पता चला कि अंदर जाने वाला शख्स सुहैब इलियासी है. वहीं सुहैब इलियासी जिसने ब्रिटिश टेलीवीजन शो 'क्राइमस्टॉपर्स' की नकल उतार कर भारतीय टेलीवीजन की दुनिया में नया अवतार लेकर तहलका मचा दिया था. यह नया नाम था....'इंडियाज मोस्ट वॉन्टेड'....सुहैब  इलियासी ने यह कार्यक्रम मार्च 1998 में जीटीवी पर शुरू किया. भारत की क्राइम रिपोर्टिंग पर आधारित चूंकि यह कोई अपने आप में पहला कार्यक्रम था. लिहाजा, सुहैब को भारतीय पुलिस ने जहां सिर-माथे लगा लिया, वहीं वो अपराधियों के निशाने पर आ गया था.

आला पुलिस अफसरों में घुसपैठ और अपराधियों से दुश्मनी...जिसका परिणाम हुआ कि कुछ ही समय में सुहैब साहब के आगे पीछे चार-चार-पांच-पांच पुलिस के सिक्योरिटी गार्ड रहने लगे. हमें दिल्ली पुलिस मुख्यालय में क्राइम रिपोर्टिंग करते हुए दशक से ज्यादा हो चुका था. जबकि मैंने इंडियाज मोस्ट वॉन्टेड से पहले सुहैब मियां का नाम कभी कहीं किसी अखबर-किताब में बहैसियत क्राइम रिपोर्टर छपते या छपे हुए नहीं पढ़ा था.

दिल्ली पुलिस हेडक्वॉर्टर में जब रुतबा देखा तो दिमाग चकरा गया. खुद पर कोफ्त हुई कि मैं हफ्ते दो हफ्ते में खोजी खबरें करके क्या बस यूं ही वक्त जाया कर रहा था. मुझे तो दिल्ली पुलिस मुख्यालय में इतनी इज्जत कभी नहीं बख्शी गई. खैर कोई बात नहीं. मन को तसल्ली दी यह सोचकर कि मुझमें वो सब कर पाने की काबिलियत नहीं है जो सुहैब इलियासी में है. बात आई गई हो गई.

भारत के तमाम आला पुलिस अफसरों को सुहैब इलियासी के सामने घिघियाते हुए देखता, तो कोफ्त खुद पर ही होती कि कमी हममें और हमारी पत्रकारिता कर पाने की क्षमताओं में ही रही होगी, वरना पुलिस वाले हमें भी सुहैब इलियासी की तरह ही खड़े होकर इज्जत बख्शते.

क्या हुआ था उस रात?

10 जनवरी 2000 की उस रात मेरी अखबार में नाइट ड्यूटी थी. अखबार का दफ्तर था कनॉट प्लेस के केजी मार्ग के अंबादीप बिल्डिंग में. रात करीब 12 बजे दफ्तर से घर के लिए निकलने से पहले सोचा कि लाओ एक बार क्राइम चैक कर लूं कहीं कोई बड़ी घटना तो नहीं है. पूर्वी दिल्ली पुलिस कंट्रोल रूम में बात हुई तो पता चला कि एक महिला को चाकूओं से गोंद दिया गया है और उसे एक निजी नर्सिंग होम में दाखिल कराया गया है. ज्यादा ब्लीडिंग के कारण उसे नर्सिंग होम से एम्स ले जाया गया था. जहां डॉक्टरों ने देर रात उसे मृत घोषित कर दिया. वो औरत कोई और नहीं अंजू इलियासी थी. इंडियाज मोस्ट वॉन्टेड फेम सुहैब इलियासी की पत्नी. कई दिनों की माथा-पच्ची के बाद दिल्ली पुलिस ने अंजू इलियासी की मौत के मामले में आत्म-हत्या का केस दर्ज कर दिया.

अंजू की संदिग्ध मौत के कुछ समय बाद विदेश से उसकी बहन रश्मि सिंह भारत पहुंची. रश्मि ने बताया कि यह आत्महत्या नहीं बल्कि हत्या है. सुहैब इलियासी अक्सर उसकी बहन को दहेज के लिए प्रताड़ित करता था. और भी तमाम मुद्दों पर अंजू और सुहैब के बीच मतभेद की बातें जांच एजेंसी को रश्मि सिंह से पता चलीं.

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यहां यह भी उल्लेखनीय है कि अंजू इलियासी की दो पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट्स से भी यह तय नहीं हो सका कि अंजू इलियासी की हत्या की गई है. एकमात्र अंजू की बहन रश्मि ऐसी महिला थी जो हत्या की बात कह रही थीं. आलम यह था कि सुहैब इलियासी को अंजू की मां रुक्मा सिंह, पिता रिटायर्ड प्रोफेसर केपी सिंह और भाई प्रशांत सिंह एक अच्छा इंसान (दामाद) बताते हुए क्लीन चिट दे दी थी. और इसके बाद सुहैब इलियासी अंजू की मां (रुक्मा सिंह) के साथ ही जाकर उनके मकान में रहने लगा था.

यहां यह भी जिक्र करना जरूरी है कि इस कांड से ठीक पहले उस दिन अंजू की बातचीच अपनी बड़ी बहन रश्मि सिंह से हुई थी. रश्मि उस वक्त कनाडा के ओटावा में रहती थीं. रश्मि से बातचीत में अंजू ने पति सुहैब इलियासी पर आरोप लगाया था कि वो उसे टॉर्चर करता है. कनाडा में एक मॉन्टेसरी स्कूल चलाने वाली रश्मि सिंह जब भारत आईं तो उन्होंने दावा किया था कि सुहैब इलियासी उनकी बहन अंजू को दहेज के लिए प्रताड़ित करता है. इसके उनके पास पर्याप्त सबूत हैं. अंजू की मौत आत्महत्या नहीं बल्कि हत्या है. एक तरफ पत्नी की संदिग्ध मौत के बाद पति सुहैब इलियासी का अपनी ससुराल (अंजू के माता-पिता के घर) में जाकर रहने लगना, वहीं दूसरी ओर अंजू की बहन का यह चैलेंज की उसकी बहन ने आत्महत्या नहीं की बल्कि दहेज के लिए सुहैब इलियासी ने उसकी हत्या की है...पूरे मामले में सही-गलत का फैसला ही नहीं करने दे रही थीं. बहरहाल दहेज प्रताड़ना के आरोप में दिल्ली पुलिस ने 30 मार्च 2000 को सुहैब इलियासी को गिरफ्तार कर लिया. बाद में पता चला कि अंजू की बड़ी बहन रश्मि सिंह का अपने परिजनों से सुहैब को गिरफ्तार कराने पर इस कदर विवाद बढ़ा कि रश्मि को अपने माता-पिता का घर छोड़कर परिचित के यहां शरण लेनी पड़ी. ताकि वो भारत में रहकर कानूनन आरोपी सुहैब को सजा दिलवा सके.

केस फाइल और अंजू की बड़ी बहन रश्मि सिंह के मुताबिक, कई बार तो सुहैब इलियासी ने उसकी बहन अंजू को उसकी मौजूदगी में भी मारा-पीटा था. इसके पीछे प्रमुख वजह वो फ्लैट भी था, जो अंजू ने अपने पैसों से खरीदा था. सुहैब उस फ्लैट को हड़पना चाहता था.

अदालतों में मौजूद इस हत्याकांड की फाइलों पर नजर डाली जाए तो पता चलता है कि अंजू सिंह (शादी के बाद अंजू इलियासी) और सुहैब दोनों के ही परिवार वाले इस शादी को मंजूरी नहीं दे रहे थे. कोई रास्ता निकलता न देखकर दोनो ने स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत लंदन में लव मैरिज कर ली. यह बात है 1993 की. शादी मुस्लिम रीति-रिवाज से हुई. निकाह के बाद अंजू इलियासी ने अपना नाम बदलकर अफशां रख लिया. अंजू और इलियासी की पहली मुलाकात दिल्ली स्थित जामिया मिल्लिया यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान हुई.

1989 में अंजू और इलियासी इसी यूनिवर्सिटी में मास कम्युनिकेशन रिसर्च सेंटर के स्टूडेंट थे. जबकि अंजू के पिता प्रोफेसर केपी सिंह मेटालॉर्जी डिपार्टमेंट के प्रमुख थे. लंदन में शादी के बाद अक्टूबर 1994 तक रहने के बाद दोनों भारत लौट आए. भारत लौटते ही अंजू ने सुहैब के घर में उसके साथ रहने से साफ इनकार कर दिया. बात ज्यादा बढ़ी तो छह महीने बाद ही वो वापस लंदन लौट गई और वहीं रहने लगी.

लंदन प्रवास के दौरान अंजू और इलियासी के दिमाग में ब्रिटेन के फेमस क्राइम शो क्राइमस्टॉपर्स जैसा कोई कार्यक्रम बनाने का आइडिया आया. कहा जा रहा है कि इस प्रोग्राम की पूरी स्क्रिप्ट अंजू ने लिखी. पायलट भी अंजू ने ही बनाया. पायलट प्रोजेक्ट में एंकरिंग भी अंजू ने ही की थी. भारत में लौटने के बाद इंडियाज मोस्ट वॉन्टेंड के नाम से जीटीवी पर जब शो शुरू हुआ तो उसमें अंजू को सुहैब इलियासी ने पूरी तरह साफ कर दिया और एंकरिंग खुद ही करने लगा. यह बात भी अंजू को कचोट रही थी. अंजू को लगने लगा था कि उसके पैसे के फ्लैट पर और उसके आइडियाज पर सुहैब इलियासी फल-फूल रहा है. दोनों के बीच मतभेदों की खाई इससे भी चौड़ी होती गई. इंडियाज मोस्ट वांटेड से पूरी तरह पत्ता साफ होने से खफा अंजू सुहैब को छोड़कर फिर विदेश वापस चली गई. सन् 1999 में अंजू ने दिल्ली लौटकर पूर्वी दिल्ली में अपना फ्लैट खरीदा और उसमें रहने लगी. अंजू का मन था कि मयूर विहार वाले इसी नये फ्लैट में 16 जनवरी को वो अपना 30वां जन्मदिन मनाएगी. उससे पहले ही 10-11 जनवरी 2000 की रात संदिग्ध हालातों में उसकी मौत हो गई.

शोहरत से तबाही तक

भले ही सुहैब इलियासी ने कभी कोई बड़ी खबर क्राइम रिपोर्टिंग की दुनिया में न की हो, मगर जुगाड़ के आइडिया से शुरू किए गए इंडियाज मोस्ट वॉन्टेड को जिस तरह भारत में उसने टीवी चैनलों के जरिए भुनाया वो वाकई विचार करने योग्य है. इसी प्रोग्राम की शोहरत ने सुहैब इलियासी को फर्श से अर्श पर पहुंचा दिया.

शोहरत के बाद मिली बदनामी तक अगर नजर डाली जाए तो सब कुछ बड़ी उथल-पुथल वाला ही रहा है. मेरे निजी अनुभव से तो इंडियाज मोस्ट वॉन्टेड के शोहरत ने सुहैब मियां को यह भुला ही दिया था कि वो नामी-गिरामी प्रोग्राम के प्रोड्यूसर होने से पहले एक इंसान भी हैं. फेमस होने के बाद तो मानो उनकी अपनी चालढाल, बात करने का तौर-तरीका ही बदल गया था. अगर मैं यह कहूं कि इस सबने भारत के कुछ उन नामचीन और मठाधीश पुलिस अफसरों का भी गाहे-ब-गाहे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से हाथ रहा होगा जो किसी जमाने में सुहैब इलियासी की आवभगत करते नहीं थकते थे.

जब सुहैब इलियासी इन अफसरों के साथ मीटिंग कर रहे होते थे, तो उस वक्त तमाम जरूरतमंद इंसान पुलिस अफसरों के दरवाजों पर घंटों बैठकर खाली हाथ वापस लौट जाते थे. ऐसे पुलिस अफसरों की यूं तो लंबी फेहरिस्त मौजूद है. इनमें से तमाम रिटायर हो चुके हैं. कुछ अभी भी नौकरी में मौजूद हैं. ऐसा ही एक आला भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) का अफसर इन दिनों एशिया की सबसे मशहूर तिहाड़ जेल (दिल्ली) में तैनात है. किसी जमाने में आलम यह था कि जब यह अफसर और सुहैब इलियासी कहीं बात किया करते थे तो किसी पत्रकार और या अधीनस्थ पुलिस अफसर की इतनी जुर्रत नहीं होती थी कि बीच में या सामने आकर लम्हे भर को ठहर भी जाए.

इसे भी बदले समय का ही उदाहरण कहा जाएगा कि जिस भतीजी आलिया (अंजू-सुहेब इलियासी की बेटी) को रश्मि सिंह ने कभी अपनी गोद में खिलाया था, उसकी कस्टडी और आलिया को कनाडा ले जाने की अनुमति भी हाईकोर्ट ने रश्मि को नहीं दी थी.

जिस सुहैब इलियासी की सुरक्षा में आगे-पीछे पुलिस गार्ड घूमते थे, उसी सुहैब इलियासी को दिल्ली हाईकोर्ट ने 2 लाख के निजी मुचलके पर जून 2000 में जमानत पर रिहा तो कर दिया, मगर पासपोर्ट जब्त कर लिया. ताकि वो देश छोड़कर न भाग जाए. साथ ही हाईकोर्ट ने उसे हिदायत दी कि वो बिना कोर्ट की परमिशन के दिल्ली से भी बाहर नहीं जाएगा.

2005 में अंजू की मां रुक्मा सिंह ने सेशन कोर्ट से अंजू की मौत की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के हवाले करने की गुजारिश की. अदालत ने उनकी इस मांग/ याचिका को यह कहकर खारिज कर दिया कि पांच साल बाद उनकी यह मांग जायज नहीं है.

सुहेब इलियासी...कैमरामैन से काल कोठरी तक

साल 1991 में लंदन में टीवी एशिया में कैमरामैन की नौकरी करने गए सुहैब इलियासी की जिंदगी ने तमाम उतार-चढ़ाव देखे हैं. 1995 में पत्नी अंजू इलियासी के साथ ब्रिटेन के क्राइम शो क्राइमस्टॉपर्स से आइडिया लेकर इंडियाज मोस्ट वॉन्टेड का गुणा-गणित सेट किया.

यह प्रोग्राम और आइडिया भारत में हिट साबित हुआ. यह अलग बात है कि इस प्रोग्राम का सर्वेसर्वा खुद को साबित करने की ललक ने ही सुहैब इलियासी की बर्बादी की पहली इबारत भी लिख दी थी. पूरे प्रोग्राम से अपना नाम साफ किए जाने से ही अंजू का गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुंचा. परिणाम यह हुआ कि अंजू और सुहैब के रिश्तों में खटास दिन-ब-दिन बढ़ती गई. जो अंजू की मौत के बाद सुहैब इलियासी के जेल में जाने तक पाटी नहीं जा सकी.

पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुख्यात गैंगस्टर श्रीप्रकाश शुक्ला से लेकर तकरीबन 30 खतरनाक अपराधियों का खात्मा इंडियाज मोस्ट वॉन्टेड से कराकर बुलंदियों पर पहुंचने वाला सुहैब इलियासी अपने ही घर (पत्नी, परिवार) को महफूज नहीं रख सका. तमाम कुख्यात अपराधियों को इंडियाज मोस्ट वॉन्टेड में दिखाए जाने के बाद ढेर किए जाने पर सुहैब सफलता का श्रेय खुद लेने लगा था.

पुलिस को यह बात अखरने लगी थी. श्रीप्रकाश शुक्ला को जब पुलिस ने मुठभेड़ में ढेर किया तो उसका सेहरा भी सुहैब इलियासी ने अपने ही सिर बांधना शुरू कर दिया. मगर उस वक्त पुलिस खुलकर उसके विरोध में उतर आई. उत्तर प्रदेश में सुहैब को दो टूक कह दिया कि वो श्रीप्रकाश शुक्ला मुठभेड़ का श्रेय खुद को या फिर इंडियाज मोस्ट वॉन्टेड को न दे. पुलिस महीनों से श्री प्रकाश के पीछे लगी हुई थी. जैसे ही सटीक टाइम आया यूपी-दिल्ली बॉर्डर पर इंदिरापुरम इलाके में उसे घेरकर ढेर कर दिया गया.

यह भी उस समय की बात थी कि जब सुहैब इलियासी के लिए तमाम आला पुलिस अधिकारी तारीफ के पुल बांधते नहीं थकते थे, वक्त पलटा तो वे ही पुलिस अधिकारी अंजू इलियासी की संदिग्ध मौत के बाद उससे कन्नी काटने लगे. जिस सुहैब इलियासी ने तमाम कुख्यात अपराधियों पर इंडियाज मोस्ट वॉन्टेड के कई एपिसोड बना डाले, वे ही अपराधी उसे धमकाने लगे थे.

यह बात खुद सुहैब इलियासी ने पुलिस अफसरों को बताई. बाद में कथित दिलेर सुहैब इलियासी को बदमाशों से सुरक्षा के लिए पुलिस कमांडो तक लेने पड़ गए. इंडिया मोस्ट वॉन्टेड में जिन अपराधियों को जेल से बाहर निकलते ही ढेर कर दिए जाने की सुहेब इलियासी शानदार स्क्रिप्ट करके जमाने भर को चौंका रहा था, अब स्वंय वही सुहेब जेल की सलाखों में के पीछे रहेगा. जुगाड़ के आइडिया पर इंडियाज मोस्ट वॉन्टेड के आइडिया को शीशे में तराश देने वाले सुहैब इलियासी को सलाखों में कब तक रहना होगा यह सजा सुनाते वक्त अदालत के रहम-ओ-करम पर निर्भर करेगा.

(ये लेख 17 दिसंबर को प्रकाशित हुआ था, हम इसे आपको दुबारा पढ़वा रहे हैं.)

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