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भारतीय रेलवे: मुसाफिरों के लिए ‘नर्क’ यात्रा है ‘प्रभु’ की रेल यात्रा

रेलवे ने ट्रेनों के किराए में भारी बढ़ोतरी के बावजूद सुविधाओं में बेहतरी कहीं नजर नहीं आती है

Ravishankar Singh Ravishankar Singh Updated On: Jul 21, 2017 06:05 PM IST

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भारतीय रेलवे: मुसाफिरों के लिए ‘नर्क’ यात्रा है ‘प्रभु’ की रेल यात्रा

भारतीय रेल में ज्यादा किराया भरने के बावजूद भी मुसाफिरों की मुश्किलें कम होती नजर नहीं आ रही हैं. बेहतर सुविधा के लिए रेल किराए की अधिकतम शुल्क भरने वाले यात्रियों को रेल की बद से बदतर हालत से हर रोज दो चार होना पड़ रहा है.

इस बात की तस्दीक नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट ने भी कर दी है. संसद में पेश नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय रेल में परोसा जाने वाला खाना इंसानों के खाने के लायक नहीं रहा.

सीएजी ने भारतीय रेल में यात्रियों के खान-पान को लेकर बड़ा सवाल उठाया है. रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ है कि दूषित खाद्य पदार्थों, रिसाइकिल किया हुआ खाद्य पदार्थ और डब्बा बंद व बोतलबंद वस्तुओं का उपयोग उस पर लिखी इस्तेमाल की अंतिम तारीख के बाद भी किया जा रहा है.

साफ-सफाई का नामोनिशान नहीं

ऑडिट में पाया गया है कि रेलवे की फूड पॉलिसी में लगातार बदलाव होने से यात्रियों को बहुत ज्यादा परेशानियां हो रही हैं. इसलिए रेलवे की फूड पॉलिसी यात्रियों के लिए हमेशा एक सवाल बनी रहती है

A policeman keeps order as people board a passenger train at a railway station in New Delhi

सीएजी के निरीक्षण से पता चला है कि स्वच्छता को बनाए रखने के लिए स्‍वास्‍थ्‍यवर्धक और साफ-सुथरी चीजों का इस्तेमाल नहीं किया जाता है.

खान-पान की तैयारी के दौरान साफ-सफाई का उचित ख्याल नहीं रखा जाता है. इससे रेलवे की खुद तय की गई साफ-सफाई संबंधी नीतियों का उल्लंघन होता है. खाना या अन्य सामान लेने के बाद कस्टमर को बिल भी नहीं दिया जाता है.

गंदे पानी से बनता है खाना

रेलवे और सीएजी की ज्वाइंट टीम ने चुने हुए 74 स्टेशनों और 80 ट्रेनों में निरीक्षण किया है. इस दौरान ऑडिटर ने पाया कि खाना बनाने और सर्वे करने के लिए स्वच्छता का बिल्कुल ध्यान नहीं रखा जाता.

खाना बनाने के लिए अशुद्ध पानी का इस्तेमाल किया जा रहा है. वहीं डस्टबिन ढका हुआ नहीं पाया गया और पूरी तरह से साफ भी नही होता है. खाने को मक्खी, कीड़े-मकौड़े, चूहे और कॉकरोच से बचाने के लिए कोई पुख्‍ता उपाय नहीं किया जाता है.

सीएजी के मुआयने के दौरान किसी भी ट्रेन में वेटरों और कैटरिंग मैनेजरों के पास बेची जाने वाली चीजों से जुड़ा मेन्यू और रेट कार्ड नहीं मिला. रिपोर्ट में लिखा है, 'खाने की चीजें तयशुदा से कम मात्रा में बेची जा रही थी. अनाधिकृत कंपनियों के डिब्बाबंद पानी की बोतलें बेची जा रही थी.'

भाड़े तो बढ़ाए पर सुविधाएं कहां हैं?

हम आपको बता दें कि रेलवे फ्लेक्सी किराया वसूलने के बावजूद यात्रियों को घटिया खाना परोसी जा रही है. हालांकि, रेलवे ने पिछले दिनों फ्लेक्सी फेयर बढ़ाने के फैसले को वापस ले लिया है.

रेलवे ने विमानों के तर्ज पर ही ट्रेन में फ्लेक्सी फेयर सिस्टम की शुरुआत की थी. लेकिन पूरी योजना पूरी तरह से नाकाम रही लिहाजा चारों तरफ हो रहे किरकिरी के बाद रेल मंत्रालय ने इस फैसले को वापस लिया है. अब यात्रियों को 31 जुलाई से फ्लेक्सी फेयर नहीं लगेगा.

भारतीय रेलवे की हालत हमेशा की तरह ही बदतर बनी हुई है.

रेल मंत्री सुरेश प्रभु के मंत्री बनने के बाद रेलवे में कई प्रयोग किए गए. कहा ये गया कि यात्रियों की सुविधा और सुरक्षा का विशेष ख्याल रखा जाएगा. पर हुआ बिल्कुल उलट.

रेलवे के कायाकल्प के लिए शिवसेना से लाए गए थे प्रभु

प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी सहयोगी पार्टी शिवसेना के ना चाहते हुए भी सुरेश प्रभु को मंत्री बनाया. सुरेश प्रभु अपने शपथ ग्रहण के दिन ही बीजेपी में शामिल हुए थे. बीजेपी में आने से पहले सुरेश प्रभु शिवसेना में थे.

जानकारों की माने तो पिछले कुछ दिनों से रेल मंत्री सुरेश प्रभु के कामकाज पर उंगलियां उठने लगी हैं. देश में लगातार हो रही रेल दुर्घटनाओं से लेकर यात्रियों के सुविधा तक रेल मंत्री सवालों के घेरे में हैं. अब तो सीएजी की रिपोर्ट ने भी सुरेश प्रभु के लिए मुश्किल खड़ी कर दी है.

दो साल पहले रेल मंत्रालय का कामकाज सुरेश प्रभु ने बिल्कुल एक सीए के अंदाज में ही संभाली थी. अटल जी की सरकार में ऊर्जा मंत्रालय में किए अपने शानदार काम का अवार्ड मोदी ने रेल मंत्री बनाकर दिया था.

पिछले कुछ सालों से रेलवे की फूड क्वालिटी में 75 प्रतिशत की गिरावट आई है. जबकि, सरकार ने फ्लेक्सी फेयर के जरिए यह कोशिश कि राजधानी या शताब्दी ट्रेनों से ज्यादा राजस्व अर्जित करें.

लेकिन, फ्लेक्सी फेयर लागू होने के बाद 30 प्रतिशत यात्रियों की संख्या में गिरावट आ गई. ज्यादा से ज्यादा सीट खाली जाने लगी. ट्रेन की तुलना में लोगों ने हवाई किराया को ज्यादा अहमियत देने लगे.

दूसरी तरफ ये हुआ कि क्वालिटी भी घटने लगी. टॉयलेट बदबूदार रहने लगे. कंबलों और चादरों को लेकर भी बहुत शिकायत आने लगी. रेल मंत्री ने यह बात स्वीकार किया था कि कंबलों की धुलाई 6 महीने में एक बार किया जाता है. इसके साथ ही रेलवे में कुछ ऐसी चीजें लगातार घटित हो रही थी जिससे यात्रियों का झुकाव रेलवे की तरफ ना जाकर दूसरी सुविधाओं के तरफ गया.

सुरक्षा को लेकर रेलवे पर गंभीर सवाल

ट्रेनों की लगातार हो रही दुर्घटनाओं पर आतंकी संगठनों के नाम आने पर लोग डरने लगे. मीडिया रिपोर्ट्स में यह बात निकल सामने आने लगी कि आतंकी संगठन अब राजधानी और शताब्दी जैसे ट्रेनों को मुख्य निशाना बना रहे हैं. हाल के कानपुर रेल एक्सीडेंट के तार आतंकी संगठनों से भी जुड़े होने के संकेत मिले.

सुरेश प्रभु अपने इंटरव्यू के दौरान बड़ी बातें कहते नजर आते हैं. मई महीने में मोदी सरकार के तीन साल पूरे होने पर उन्होंने कई चैनलों को इंटरव्यू दिए. इनमें वो दो बातें प्रमुखता से उठाते नजर आए.

A Railway Police personnel peeps out from the door of a special passenger train at a railway station in Chandigarh

पहली, कि ढाई सालों के अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने लगभग 16 हजार किलोमीटर के ट्रैक की डबलिंग या ट्रिपलिंग सैंक्शन किए.

दूसरा, करीब 40 हजार रेलवे के डिब्बों का मॉडर्नाइजेशन किया जाएगा. फिर वो इन दोनों के पूरा होने के लिए लगभग पांच साल का वक्त मांग रहे हैं.

एक और बात जिसके लिए सुरेश प्रभु अपनी पीठ थपथपाते हैं वो है टिकट के किरायों में 10 प्रतिशत का डिस्काउंट. इसमें भी एक पेच रखा गया. वो ये कि आपको टिकट पर जो दस प्रतिशत का डिस्काउंट मिलेगा वो आखिरी टिकट के दाम के आधार पर मिलेगा.

टिकट की कीमत पर 10 परसेंट डिस्काउंट छलावा

अब सामान्य तौर पर ट्रेनों में टिकट का एक ही निर्धारित किराया होता है. अंतर बस तब आता है जब आप तत्काल टिकट ले रहे होते हैं. यानी सामान्य टिकट और तत्काल टिकट के दाम का अंतर. सिर्फ फ्लेक्सी फेयर में टिकट के दाम सीटों की उपलब्धता के आधार पर बढ़ते जाते हैं. तो इस हिसाब से फ्लेक्सी फेयर के आधार पर जो अंतिम टिकट बिका होगा उस पर 10 प्रतिशत का डिस्काउंट. तो रेल मंत्री जी एक बात बताएं जब सामान्य किराए से दो-तीन गुना ज्यादा दाम वसूल ही लिया जा रहा है तो 10 प्रतिशत का डिस्काउंट किस बात का?

पिछले दिनों फ्लेक्सी फेयर को लेकर जब एक वेबसाइट के फेसबुक लाइव कार्यक्रम में एक यूजर ने सुरेश प्रभु से पूछा कि सर राजधानी जैसी ट्रेन, जिसमें पहले से भी दूसरी ट्रेनों के मुकाबले ज्यादा किराया होता है, में फ्लेक्सी फेयर कितना जायज है?

Trains

रेलमंत्री ने उस यूजर को टका सा जवाब दिया कि यात्री भाड़े की तरफ से कमी होने की वजह से रेलवे पर 35 से 40 हजार करोड़ रुपए बकाया हैं. आप कैसे कह सकते हैं कि हम किराया ज्यादा ले रहे हैं?

यात्री किराया ज्यादा, फ्रेट किराए पर दे रहे हैं छूट

यानी रेलवे की जो दुर्गति पिछले कई दशकों में हुई है उसे यात्रियों से जबरिया अधिक किराया वसूल कर पूरा किया जाएगा? जबकि सुरेश प्रभु फ्रेट में कई तरह की छूट देकर रेलवे का मुनाफा बढ़ाने के लिए अपनी पीठ थपथपाते हैं.

मतलब जो रेलवे भारत की लाइफ लाइन कही जाती है उसमें व्यापार और धंधा करने की छूट तो मिलेगी लेकिन यात्रियों से अधिक किराया वसूले जाने के बावजूद घटिया खाना और सुविधा के नाम कुछ नहीं. ये कैसा सिस्टम है?

ऐसा माना जाता है कि रेलवे के द्वारा राजधानी और शताब्दी ट्रेनों के रखरखाव में भी भेदभाव किया जाता है. मुंबई राजधानी या अहमदाबाद राजधानी में जितनी सुविधा यात्रियों के लिए होती है उतनी सुविधा बिलासपुर राजधानी या डिब्रूगढ़ राजधानी जैसी ट्रेनों में नहीं होती हैं. क्योंकि, मुंबई और अहमदाबाद राजधानी में चलने वाले लोग बिजनेस क्लास या अपर क्लास के लोग होते हैं. जबकि, इन रुटों पर चलने वाले लोग उतने धनी नहीं होते हैं.

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