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समुद्री सीमा सुरक्षा को और सख्त करने के लिए राज्यों के अधिकार बढ़ा सकती है सरकार

सरकार की योजना है कि वो तटवर्ती इलाकों के नजदीक के गावों को कोस्टल पुलिस स्टेशनों के अधीन कर दे और उसके अधिकार क्षेत्र सीमा को बढ़ाकर 200 नॉटिकल माइल्स कर दे

Updated On: Aug 11, 2018 02:25 PM IST

Yatish Yadav

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समुद्री सीमा सुरक्षा को और सख्त करने के लिए राज्यों के अधिकार बढ़ा सकती है सरकार

भारत अपनी समुद्री सीमाओं की सुरक्षा को मजबूत करने की कोशिशों में जुटा हुआ है. इसके तहत सरकार की योजना है कि वो तटवर्ती इलाकों के नजदीक के गावों को कोस्टल पुलिस स्टेशनों के अधीन कर दे और उसके अधिकार क्षेत्र सीमा को बढ़ाकर 200 नॉटिकल माइल्स कर दे. सरकार का मानना है इस कदम से समुद्री सीमा की सुरक्षा और मजबूत होगी.

सरकार को ये विचार एमवी हेनरी जहाज से ड्रग्स की बरामदगी को लेकर दायर किए गए चार्जशीट के दौरान आया जिसमें भारतीय चालक दल, इरानी जहाज मालिकों और हैंडलर्स के बीच का मामला था. नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) ने हाल ही में समुद्री रास्तों में सुरक्षा के गंभीर खतरों को लेकर सभी साझेदारों, जिसमें समुद्री सीमाओं से लगे राज्य भी शामिल थे, उनसे बातचीत की.

इस बातचीत में एनसीबी ने खुलासा किया कि राष्ट्रविरोधी तत्व अब जमीन पर कई स्तरों पर मौजूद सुरक्षा व्यवस्था को मात देने के विकल्प के रूप में समुद्री रास्तों का इस्तेमाल कर रहे हैं. एनसीबी ने तटवर्ती राज्यों को सलाह देते हुए कहा है कि उनके लिए जरूरी है कि तस्करी और आतंकवाद से बचने के लिए वो अपनी सुरक्षा व्यवस्था को चाक-चौबंद करें. वर्तमान में भारतीय समुद्री सीमा की सुरक्षा मुख्य रुप से भारतीय नेवी के हाथ में है जबकि इंडियन कोस्ट गार्ड के ऊपर पूरे तटीय सुरक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी है. राज्यों का अधिकार क्षेत्र समुद्र में 12 नॉटिकल माइल्स तक बढ़ा दिया गया है. केवल पोर्ट ब्लेयर को इससे अलग है क्योंकि पोर्ट ब्लेयर में पहले से मौजूद 10 नॉटिकल माइल्स के अधिकार क्षेत्र को भारत के एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन यानि 200 नॉटिकल माइल्स तक बढ़ा दिया गया है.

2008 के मुंबई हमलों के बाद से तटीय इलाकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी मुख्य रूप से कोस्टल पुलिस के पास है. समुद्र रास्तों से होने वाली तस्करी पर लगाम लगाना, सूचनाओं को इकट्ठा करना, विधि व्यवस्था बनाए रखना, डिजास्टर मैनेजमेंट और इसके साथ-साथ उन इलाकों में एक अतिरिक्त सुरक्षा दीवार के रुप में काम करने की जिम्मेदारी कोस्टल पुलिस की है. 2008 के मुंबई हमलों के बाद से कोस्ट लाइन को लेकर कई बार चेतावनी जारी की जा चुकी है. दरअसल हमारी कोस्ट लाइन बहुत छिद्र युक्त है जिसकी वजह से आतंकवादियों, घुसपैठियों, राष्ट्र विरोधी तत्वों और ड्रग्स की तस्करी करने वालों को देश में घुसने और देश विरोधी काम करने में सहायता मिल जाती है.

फ़र्स्टपोस्ट को मिली जानकारी के मुताबिक कोस्टल पुलिस को मजबूत करने के लिए गृह मंत्रालय संबद्ध राज्यों से विचार विमर्श कर रहा है. गृह मंत्रालय इसके लिए राज्यों को अलग से बजट आवंटित करने की भी छूट देने के बारे में विचार कर रहा है जिससे कि उन रुपयों को सही जगह पर खर्च किया जा सके. तमिलनाडु ने सूचना दी है कि इस मामले में तीन सबसे संवेदनशीन जिलों में तेजी से कार्रवाई की जा रही है. ये तीन जिले हैं तूतीकोरिन, रामनाथपुरम और नागपट्टिनम. पिछले साल श्रीलंका भेजा जाने वाला तीन कंसाइनमेंट कोस्ट गार्ड ने जब्त किया था. जब इस संबंध में कोस्ट गार्ड ने जांच पड़ताल की तो पता चला कि तूतीकोरिन जिले से श्रीलंका और मालदीव को ड्रग सप्लाई करने का काम धड़ल्ले से चल रहा है.

भारत की कोस्टलाइन 7,516 किलोमीटर की है जिसमें 5.422 किलोमीटर की कोस्टलाइन मुख्य भूमि से जुड़ी है और शेष 2,094 किलोमीटर आइलैंड्स से. भारत की तटीय सीमा 9 राज्यों और 4 केंद्र शासित प्रदेशों से जुड़ी है. भारतीय व्यापार का 90 फीसदी तटों के द्वारा ही होता है. तटीय सीमा के आसपास 3331 गांव बसे हुए हैं,1382 आईलैंड्स हैं और लगभग 120 लाख लोग मछली से जुड़े कारोबार में लगे हुए हैं. भारत के तटों पर 4 से 5 लाख नावें चलती हैं लेकिन उनमें से केवल 2 लाख नावें ही रजिस्टर्ड हैं. भारत के कोस्ट लाइन पर 12 बड़े और महत्वपूर्ण बंदरगाह हैं जबकि 200 छोटे पोर्ट्स और 95 लैंडिंग सेंटर्स हैं. लेकिन इन सबों पर हमारे पड़ोसियों की राष्ट्रविरोधी हरकतों से लगातार खतरा बना रहता है. ऐसे में जरूरी है कि हमारी तटीय सुरक्षा को लेकर समग्र रूप से एक ऐसी रणनीति तैयार की जाए जिससे हमारी नौसेना न केवल आधुनिक और मजबूत हो सके बल्कि हमारे तटीय सुरक्षा में जो कमजोरियां हैं उसका भी निवारण किया जा सके.

फोटो-रॉयटर्स.

फोटो-रॉयटर्स.

सरकार के द्वारा ये भी सलाह दी गई है कि सभी तटीय राज्य एक क्षेत्रीय ट्रेनिंग इंस्टीच्यूट की स्थापना जरूर करें जहां पर तटीय सुरक्षा से जुड़े पुलिस जवानों को सुरक्षा दी जा सके. तटीय सुरक्षा के खतरों में स्थानीय कनेक्शन एक प्रभावी भूमिका निभाता है ऐसे में कोस्टल पुलिस को ऐसे प्रशिक्षित किया जाए जिससे वो ऐसे खतरों से आसानी से निपट सके.

तटीय सुरक्षा में इंफ्रास्ट्रक्चर की कमियां

मुंबई हमलों से कुछ साल पहले 2005 में गृह मंत्रालय ने एक कोस्टल सिक्योरिटी स्कीम की शुरुआत की थी. इसे बॉर्डर मैनेजमेंट डिविजन के द्वारा दो चरणों में पूरा किया जाना था. पहले चरण में 2005-2011 में 646 करोड़ खर्च किया गया. 2011 से शुरू होने वाले दूसरे चरण को 2020 तक बढ़ा दिया गया है और उस पर अब तक सरकार के 1580 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं. इस योजना के तहत 194 कोस्टल पुलिस थानों की स्थापना हो चुकी है और पेट्रोलिंग के लिए 204 जलयान खरीदे जा चुके हैं इसके बावजूद कई बार इन जलयानों से पेट्रोलिंग और आपरेशन में इसलिए बाधा आती है क्योंकि इसके रिपेयर और मेंटेनेंस के लिए पैसे ही नहीं होते हैं. राज्यों के सामने भी ऑपरेशनल समस्याएं होती हैं और अतिरिक्त सुविधाओं के निर्माण में काफी वक्त जाया होता है. एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, ये समस्या कर्मचारियों और प्रशिक्षित पुलिसकर्मियों के न होने से और बढ़ जाती है. इन इलाकों में पुलिसकर्मियों को तटीय सुरक्षा के लिए प्रशिक्षित करने के लिए सुविधाओं की कमी है.

उस अधिकारी की कहना है कि 'पहले नावों के मेंटेनेंस का जिम्मा केंद्र के पास था लेकिन हाल ही में इसे तटीय राज्यों को सौंप दिया गया है जिससे भारी परेशानी हो रही है. गुजरात, जिसके पास देश की सबसे लंबी 1600 किलोमीटर लंबी कोस्ट लाइन है और 30 मेरीन पुलिस स्टेशन है, उसको कोस्टल पेट्रोलिंग बोट्स की रिपेयरिंग में काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है.'

गुजरात सरकार ने हाल ही में केंद्र सरकार को जानकारी दी है कि उसके पास उपलब्ध 31 पेट्रोलिंग जलयानों में 7-8 हमेशा खराब पड़े रहते हैं और ऐसा कई महीनों से चल रहा है. समुद्र में निगरानी का तरीका जमीन पर की जाने वाली निगरानी से अलग होता है ऐसे में इसके लिए अलग तरीके के स्किल की आवश्यकता होती है. तमिलनाडु ने इसके लिए मछुआरों को होमगार्ड्स के रूप में नियुक्त करना शुरू किया है. वहां से हाल ही में केंद्र सरकार को ये जानकारी दी गयी है कि 6 और 12 टन वाले जहाज अक्सर टूट जा रहे हैं जिससे कि काम-काज और पेट्रोलिंग में बाधा आ रही है. इसके अलावा देश के इतने बड़े कोस्टलाइन पर महज 60 जेट्टियों के होने से भी समस्या लगातार बढ़ रही है. हालांकि स्वीकृत हो चुके इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण में समय लगेगा लेकिन प्रशिक्षित कर्मियों की कमी भी तटीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बनी हुई है.

केरल में जहां पर कोस्ट लाइन से जुड़े हुए 72 पुलिस स्टेशन हैं वहां भी राज्य प्रशासन मरीन पुलिसिंग में अपने आपको अक्षम पाता है. वहां के राज्य सरकार ने इस संबंध में एक प्रस्ताव गृह मंत्रालय को भेजा है. इस प्रस्ताव के मुताबिक केरल ने सरकार से छिछले पानी में 1-2 किलोमीटर तक समुद्र में पेट्रोलिंग करने के लिए किफायती वाटर बोट की मांग की है.

सामंजस्य और सहयोग की समस्या

मुंबई हमलों के बाद तटीय सीमा की सुरक्षा में लगी लगभग सभी एजेंसियों ने तटीय सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए थे. इस हमले और उसके बाद की गयी शिकायत को दस साल हो गए हैं लेकिन आज भी सहयोग और सामंजस्य के अभाव की वजह से सुरक्षा के काम काज में बाधा आ रही है. हमारी 15 एजेंसिया कोस्टलाइन के पास ऑपरेट कर रही हैं. भारतीय नौसेना, भारतीय कोस्ट गार्ड, राज्य पुलिस, सेंट्रल इंडस्ट्रियल सिक्योरिटी फोर्स, कस्टम्स, इमीग्रेशन, स्टेट मेरीटाइम बोर्ड, बोर्डर सिक्योरिटी फोर्स, इंटेलीजेंस ब्यूरो, पोर्ट्स ऑथोरिटी ऑफ इंडिया, एनसीबी, रॉ सागर प्रहरी बल, एनटीआरओ और लाइटहाउस अथॉरिटी ऑफ इंडिया, ये सभी भारतीय समुद्री और तटीय सीमा के लिए काम कर रहे हैं.

फोटो-रॉयटर्स.

फोटो-रॉयटर्स.

इन सबके ऊपर निगरानी रखने के लिए भी बहुस्तरीय व्यवस्था है. सबसे ऊपर नेशनल कमिटी फॉर स्ट्रेंथनिंग मेरीटाइम एंड कोस्टल सिक्योरिटी है जिसका नेतृत्व कैबिनेट सेक्रेटरी के द्वारा किया जाता है. इसका काम मेरीटाइम और कोस्टल सिक्योरिटी से जुड़े सभी मामलों को कॉआर्डिनेट करना है. गृह मंत्रालय में मौजूद स्टियरिंग कमिटी का काम है कि वो कोस्टल सिक्योरिटी की समय समय पर समीक्षा करे. इसके नीचे स्टेट लेवल कॉआर्डिनेशन कमिटियां होती हैं जिसका नेतृत्व राज्य के मुख्य सचिव करते हैं. इसके बाद जिलास्तरीय कमिटी होती है जिसके मुखिया जिलाधिकारी होते हैं इनका काम तटीय सुरक्षा के उपायों का सही तरीके से कार्यन्वयन हो रहा है कि नहीं, ये देखना होता है.

26/11 के मुंबई हमलों के बाद रक्षा मंत्रालय ने मई 2009 में इंडियन नेवी को पूरे समुद्री सुरक्षा की बागडोर सौंप दी जिसमें तटीय और अपतटीय दोनों की सुरक्षा शामिल है. भारतीय कोस्टगार्ड की जिम्मेदारी राज्य और केंद्रीय एजेंसियों के बीच समन्वय स्थापित करना है इसके अलावा कोस्ट गार्ड तटों पर काम कर रही सभी एजेंसियों के बीच समन्वय और सूचनाओं के आदान प्रदान की मुख्य एजेंसी के रूप में भी काम करती है.

केंद्र सरकार ने हाल ही में कहा है कि कई एजेंसियों के एक ही क्षेत्र में काम करने से उनके अधिकार क्षेत्र आपस में उलझ जा रहे हैं जिससे कि कोऑर्डिनेशन में समस्या आ रही है. फ़र्स्टपोस्ट को ये भी पता चला है कि कोस्टल सुरक्षा से जुड़े विषयों के लिए एक विशिष्ट इंटेलीजेंस सेटअप बनाने का प्रस्ताव लाया गया था जिसे कि स्वीकार नहीं किया गया. इसके पक्ष ये दलील दी गई थी कि नेवी और कोस्ट गार्ड जैसी केंद्रीय एजेंसियों का स्थानीय लोगों से ज्यादा संपर्क नहीं होता है इसके अलावा इन ऐजेंसियों और राज्य की पुलिस के बीच भी जरूरत और मुश्किल के समय समन्वय कम होता है. जबकि किसी एक फोर्स के पास पूरी तरह से जल और उससे सटे थल की निगरानी की पूरी जिम्मेदारी नहीं है. लेकिन सुरक्षा मामलों से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना था कि पहले से मौजूद 15 एजेंसियों में एक और जोड़ देने का कोई औचित्य नहीं है क्योंकि इससे कोऑर्डिनेशन की और विकट समस्या उत्पन्न हो जाएगी.

अधिकारी का मानना है कि 'जरूरत है कि सभी संबद्ध राज्यों में एक समान कोस्टल पुलिस व्यवस्था की स्थापना की जाए और उसे अतिरिक्त प्रशिक्षत कर्मियों और उपयुक्त आधुनिक उपकरण से सुसज्जित किया जाए. इसके अलावा राज्य के फिशरीज डिपार्टेमेंट के पास मौजूद सभी मछुआरों का डेटा कोस्ट गार्ड और कोस्टल पुलिस के साथ ऑनलाइन साझा किया जाए. अगर ऐसा सही तरीके से किया गया तो समुद्री रास्तों से घुसपैठ पर रोक लगाई जा सकती है.'

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