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क्या हमारे सैनिकों की किस्मत में सिर्फ हथियारों का इंतजार लिखा है ?

हथियार और गोला-बारूद चाहे भारत में बन रहे हों या विदेशी मुल्कों में, लेकिन सैनिक फिलहाल इसका इंतजार ही कर रहे हैं.

Pallavi Rebbapragada Pallavi Rebbapragada Updated On: Mar 19, 2018 09:29 PM IST

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क्या हमारे सैनिकों की किस्मत में सिर्फ हथियारों का इंतजार लिखा है ?

भारतीय सेना के यश और बहादुरी की तारीफ वाली 'अति-राष्ट्रवादी 'भावनाओं के जरिए गौरव और वीरता का जितना भी माहौल बनाया जाए, लेकिन इससे इस सच पर पर्दा नहीं डाला जा सकता कि देश के सैन्य बलों के पास गोला-बारूद का भंडार बेहद सीमित है. सेना में गोला-बारूद प्रबंधन पर 8 मई 2015 को पेश सरकार से ही जुड़ी संस्था सीएजी की ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया था, '40(I) दिनों की मंजूर अधिकृत व्यवस्था की उपेक्षा करते हुए सेना मुख्यालय ने बॉटमलाइन या न्यूनतम स्वीकार्य जोखिम स्तर (एमएआरएल) जरूरतों के आधार पर गोला-बारूद खरीदा. यह स्टॉक औसत 20(I) दिनों का था. यह रिजर्व युद्ध नुकसान कोष का 50 फीसदी है. इस रिजर्व को बनाए रखने का मकसद युद्ध की अनुमानित अवधि की जरूरतों को पूरा करना है.'

अमरिंदर ने कहा, अभ्यास वाले गोला-बारूदों से चल रहा सेना का काम

महानियंत्रक और लेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट के सार्वजनिक होने के तकरीबन दो साल बाद पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने न्यूज़18 राइजिंग सम्मेलन में देश में गोला-बारूद के स्टॉक की खराब हालत के बारे में विस्तार से अपनी बात रखी. सिंह 1960 और 70 के दशक में भारतीय सेना को अपनी सेवाएं दे चुके हैं. उन्होंने बताया कि पाकिस्तान और चीन के साथ टकराव की सूरत में देश के वायु सेना को 42 स्क्वाड्रन की जरूरत है, लेकिन फिलहाल उसके पास 21 या 22 स्क्वाड्रन हैं. इतना ही नहीं, इनमें से 7 स्क्वाड्रन पुराने पड़ चुके हैं यानी वे अब कारगर नहीं हैं. सिंह का यह भी कहना था कि सेना के 66 रेजिमेंटों के पास गोला-बारूद नहीं है और वे अभ्यास वाले गोला-बारूद का इस्तेमाल कर अपना काम चला रहे हैं. ये गोला-बारूद काफी लंबे समय से सेना के पास पड़े हुए हैं.

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अमरिंदर ने खुलासा किया कि फिलहाल कश्मीर में तैनात उनकी रेजिमेंट के एक मेजर और तीन जवान हाल में शहीद हुए हैं. पंजाब के मुख्यमंत्री का यह भी कहना कि देश की सीमाओं पर तैनात जवान अपनी मर्जी के खिलाफ 5.56 एमएम असॉल्ट राइफल का इस्तेमाल कर रहे हैं नतीजतन, अपने हथियार को लेकर उनका आत्मविश्वास खत्म हो रहा है. दरअसल, भारतीय सेना के जवान आतंकवादियों से जब्त एके-47 राइफल का इस्तेमाल करने में खुद को ज्यादा सहज महसूस करते हैं.

जवानों के लिए एक-47 राइफल ज्यादा कारगर, लेकिन इसकी भी कमी अब तक भारतीय सुरक्षा बलों द्वारा आतंकवादियों से तकरीबन एक लाख एक-47 राइफल जब्त किए जा चुके हैं. अमरिंदर ने कहा, 'हम कश्मीर में रोजाना अपने सैनिकों की जान गंवा रहे हैं. मैं पंजाब से ताल्लुक रखने वाले हर शहीद सैनिक को 12 लाख रुपए का मुआवजा देता हूं.' उनका यह भी कहना था कि सेना के 68 फीसदी उपकरण पुराने पड़ चुके हैं और सेना में हथियारों के आधुनिकीकरण की प्रक्रिया को तब तक अंजाम नहीं दिया जा सकेगा, जब तक सैन्य इकाइयों को पर्याप्त फंड नहीं मुहैया कराए जाते.

सेना के अंदरूनी सूत्रों ने नाम जाहिर नहीं किए जाने की शर्त पर बताया कि 155 एमएम वाले हथियारों की भारी कमी है और सेना की टुकड़ियों को इस हथियार के बजाय 105 एमएम वाली बंदूक से लैस किया जा रहा है. सेना से जुड़े सूत्रों ने ज्यादा से ज्यादा टीएनटी विस्फोटकों की जरूरत बताई, जिसके जरिए दुश्मन के ठिकानों को नेस्तनाबूद किया जा सकता है. सेना के मुताबिक, पिनाका और स्मर्च जैसे रॉकटों के लिए भी और गोला-बारूद की जरूरत है. सूत्रों ने यह भी बताया कि सैन्य बलों को आधुनिक नेविगेशन सिस्टम, रात्रि में युद्ध से जुड़ी क्षमता और बुलेटप्रूफ जैकेट से लैस करने का अभियान पहले से तय समय से काफी पीछे चल रहा है.

रक्षा मंत्री की सफाई, दिक्कतों को दूर किया जा रहा है

न्यूज़18 राइजिंग इंडिया सम्मेलन के आखिरी दिन रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण से कैप्टन अमरिंदर सिंह की चिंताओं के बारे में सवाल किए गए. सीतारमण ने सैन्य बलों की तैयारी के बारे में बताया, 'हमने गोला-बारूद के कम रिजर्व के मुद्दे पर ध्यान दिया है और इससे निपटा जा रहा है. उपकरणों की जरूरत के बारे में फैसला लेने के लिए सैन्य इकाइयों के प्रमुखों को पर्याप्त अधिकार दिए गए हैं.'

सीतारमण ने रक्षा संबंधी बजट आवंटन के बारे में भी विस्तार से जानकारी दी. उन्होंने पहले पेंशन और आधुनिकीकरण के लिए आवंटन अलग कर दिया. रक्षा मंत्री का यह भी कहना था कि वह इस बात से खुश हैं कि रक्षा मंत्रालय को दोनों मिला. उन्होंने कहा, 'मेरे दोनों पूर्ववर्ती और मैंने खुद अटकी पड़ी परियोजनाओं की समीक्षा कर सक्रियता से कार्रवाई की.' सीतारमण पूर्ण प्रभार वाली देश की पहली रक्षा मंत्री हैं ( इससे पहले पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पास रक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार था).

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तकरीबन एक हफ्ते पहले सेना के उप-प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल सरथ चंद ने एक संसदीय समिति को बताया था कि रक्षा बजट से सेना की उम्मीदों को झटका लगा है. उन्होंने कहा था, 'आधुनिकीकरण के लिए 21,388 करोड़ रुपए का आवंटन अपर्याप्त है. यहां तक कि फिलहाल चल रही 125 योजनाओं से जुड़े 29,033 करोड़ के भुगतान, आपातकालीन हालात में खरीदारी और बाकी जरूरतों के लिए भी यह रकम कम पड़ जाएगी.

उप-प्रमुख ने यह भी कहा कि आवंटन कम होने का एक परिणाम यह हो सकता है कि पाइपलाइन में मौजूद मेक इन इंडिया से जुड़ी 25 रक्षा परियोजनाएं आधी-अधूरी हालत में बंद हो जाएं.

यह पूछे जाने पर क्या मेक इन इंडिया सफल रहा है, सीतारमण ने बताया कि सरकार को इस बात का पूरा भरोसा है कि रक्षा खरीद में सुगमता आएगी और प्रक्रियाएं आसान होंगी. उनका यह भी कहना था कि भारतीय निजी क्षेत्र को तकरीबन 21 रक्षा परियोजनाएं दी गई हैं. उन्होंने कहा, 'अगर कोई निवेश करना चाहता है, वे आ सकते हैं और हमें खुद से बता सकते हैं और हम इस पर विचार करेंगे.' सैन्य नियम, 2016 के मुताबिक, सरकार ने गोला-बारूद के निर्माण के लिए निजी क्षेत्र को अनुमति दी है.

हाल तक इसे बनाने का अधिकार सिर्फ आयुध फैक्ट्री बोर्ड (ओएफबी) और सार्वजनिक क्षेत्र की रक्षा इकाइयों के पास था. भारत में गोला-बारूद का सालाना बाजार एक अरब डॉलर से भी ज्यादा का है और निजी क्षेत्र में तकरीबन 25 करोड़ डॉलर की अतिरिक्त सालाना क्षमता की गुंजाइश है.

सैनिकों के पास फिलहाल इंतजार के सिवा और चारा नहीं

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

इस हफ्ते के शुरू में फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (फिक्की) ने सेंटर फॉर ज्वाइंट वारफेयर स्टडीज (सीईएनजेओडब्ल्यूएस) के साथ मिलकर 'एम्मो इंडिया 2018- सैन्य गोला-बारूद पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनः मेक इन इंडिया, मौके और चुनौतियां' विषय पर कार्यक्रम का आयोजन किया. सेंटर फॉर ज्वाइंट वारफेयर स्टडीज सैन्य नीति से जुड़ा थिंक टैंक है.

इस आयोजन के बारे में वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी में साफ किया गया है कि गोला-बारूद आदि के लिए घरेलू उत्पादन का सिस्टम विकसित करने और नियार्त पर निर्भरता घटाने के लिए कोशिशें की जा रही हैं. इसमें कहा गया है कि गोला-बारूद के उत्पादन की मौजूदा नीति और मात्रा संबंधी नियम निजी क्षेत्र के लिए इस सिलसिले में क्षमता विकसित करने और विदेशी ऑरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर्स (ओईएम) के साथ संयुक्त उपक्रम के जरिये जुड़ने का बेहतर मौका मुहैया कराते हैं.

भारत में गोला-बारूद उत्पादन से जुड़े कई तरह के कार्यक्रमों को अत्याधुनिक तकनीक मुहैया कराने के लिए रक्षा क्षेत्र की कई विदेशी कंपनियां पहले ही निजी भारतीय कंपनियों से बातचीत कर रही हैं.

न्यूज18 राइजिंग इंडिया सम्मेलन के मंच पर इन सब बातों की गूंज सुनाई पड़ी और सीतारमण ने कहा कि सरकार का फोकस भारत को मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने पर होना चाहिए. साथ ही, उसका लक्ष्य भारत की रक्षा तैयारियों को बेहतर बनाने के अलावा निर्यात पर निर्भरता घटाना भी होगा.

क्या भारत युद्ध के लिहाज से तैयार है? रक्षा मंत्री ने कहा, 'मुझे यह बताते हुए खुशी हो रही है कि हमने इस मुद्दे से निपट लिया है और भयंकर लड़ाई की स्थिति में हमारे पास 10 दिनों के लिए पर्याप्त गोला-बारूद है. सेना के शीर्ष अधिकारियों को पर्याप्त अधिकार दिए गए हैं और इसके लिए वित्तीय सीमाओं में बढ़ोतरी को भी मंजूरी दे दी गई है.' हथियार और गोला-बारूद चाहे भारत में बन रहे हों या विदेशी मुल्कों में, लेकिन सैनिक फिलहाल इसका इंतजार ही कर रहे हैं.

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