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पानी की दिलचस्प कहानीः चोरी रोकने के लिए ड्रमों में लग रहे ताले, आधी रात तक जग रहे लोग

राजस्थान के भीलवाड़ा में पानी की किल्लत से जूझ रहे लोग रात भर जग कर जगकर इसकी सुरक्षा कर रहे हैं, हालत ये हो गई है कि पानी के ड्रम में ताला मारना पड़ रहा है

Updated On: Jul 04, 2018 07:25 AM IST

Rangoli Agrawal

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पानी की दिलचस्प कहानीः चोरी रोकने के लिए ड्रमों में लग रहे ताले, आधी रात तक जग रहे लोग

राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के पारसरामपुरा गांव के निवासी जमुनालाल सिंह को आजकल आधी रात तक जगे रहना पड़ता है. वह परिवार या खेतों की सुरक्षा के लिए ऐसा नहीं करते, बल्कि रोजाना इस्तेमाल के लिए जमा किए पानी पर नजर रखने के लिए उन्हें यह मशक्कत करनी पड़ती है.

गुलाबपुरा शहर के इस हिस्से में पानी की ज्यादा किल्लत है, जिसके कारण लोगों को इस तरह के उपाय करने पर मजबूर होना पड़ रहा है. गांव में कई लोग अब अपने मकान के पिछवाड़े में पानी के गैलन में ताला भी लगा रहे हैं ताकि पानी की चोरी के खतरे को टाला जा सके.

32 साल के जमुनालाल कहते हैं, 'अगर पानी चोरी हो जाता है, तो हम क्या पीएंगे.' उन्होंने बताया कि गांव के 400 परिवारों को 8 दिनों में सिर्फ एक बार 10,000 लीटर के दो टैंकरों की सप्लाई मिलती है, लिहाजा ये उपाय जरूरी हैं. टैंकरों की यह सप्लाई हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड द्वारा की जाती है. कंपनी भीलवाड़ा जिले में खनन का काम करती रही है और वह कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सबिलिटी (सीएसआर) के तहत गांव में पानी की सप्लाई करती है.

भीलवाड़ा में पानी की किल्लत का मु्द्दा इस साल जून में मीडिया में प्रमुखता से उभरने के बाद गांव में टैंकरों की सप्लाई की स्थिति में सुधार हुआ है और अब 5 दिनों में एक बार पानी का टैंकर यहां पहुंचने लगा है.

इस इलाके के एक और निवासी मूलचंद (40 साल) कहते हैं, 'यहां तक कि जानवरों और पक्षियों के लिए रखे गए बरतन भी ज्यादातर दिन खाली ही रह जाते हैं. पानी की अक्सर चोरी हो जाती है, नतीजतन, हमें प्लास्टिक के गैलनों में ताला लगाना पड़ता है.' उन्होंने बताया, 'हम पानी जैसी जरूरी चीज में ताला नहीं लगाना चाहते, लेकिन पानी की चोरी हो जाने पर पड़ोसियों में झगड़े होने लगते हैं और इस वजह से इस इलाके में रहना मुश्किल हो जाता है. लिहाजा, हम लोगों के बीच ताला लगाने पर सहमति बनी.' उनका यह भी कहना था कि अगर हर दो या तीन दिन पर पानी की सप्लाई सुनिश्चित की जाती है, तो यह समस्या दूर हो सकती है.

भूजल का हो रहा बेशुमार दोहन

यहां के एक और निवासी महावीर धोबी ने बताया कि इस इलाके के हैंडपंप पूरी तरह से सूख चुके हैं. दरअसल, इन हैंडपंपों की पहुंच से भूजल का स्तर काफी दूर चला गया है. भीलवाड़ा में भूजल की स्थिति को लेकर जल संसाधन मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, इस जिले के तकरीबन सभी ब्लॉक में भूजल स्तर को लेकर दिक्कत काफी ज्यादा है. इस जिले में फिर से भरने योग्य भूजल संसाधन 428.18 एमसीएम (मिलियन क्यूबिट मीटर) आंका गया है और नेट सालाना भूजल उपलब्धता 386.59 एमसीएम रहने का अनुमान रहा है.

Water-crisis

इसके अलावा, तमाम इस्तेमाल के लिए नेट सालाना भूजल निकासी का अनुमान 524 एमसीएम है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जिले में भूजल डेवलपमेंट का स्तर 135.55 फीसदी है, जो इस बात की तरफ इशारा करता है कि भूजल डेवलपमेंट की गुंजाइश पहले ही खत्म हो चुकी है और सभी ब्लॉक में जल स्तर का बेशुमार दोहन किया जा चुका है.

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भीलवाड़ा और गुलाबपुरा में मौजूद 352 टेक्सटाइल इंडस्ट्रीज के कारण समस्या और विकराल हो जाती है. इन उद्योगों में बड़ी मात्रा में पानी का इस्तेमाल होता है, जिसके परिणाम स्वरूप पीने के पानी का संकट पैदा हो गया है. साथ ही, इन उद्योगों से निकलने वाला वाला कचरा (बिना ट्रीटमेंट वाला) भूजल को प्रदूषित कर देता है. अपेक्षाकृत बेहतर भूजल स्तर वाले कुछ इलाकों में कुंओं में थोड़ा बहुत पानी है.

पाइपलाइन नहीं, लोग बारिश के पानी पर निर्भर

हकीकत यह है कि इस तरह के सख्त उपाय करने के लिए मजबूर होने के मामले में पारसरामपुरा अकेला नहीं है. साथ ही, यह मामला इस चुनावी राज्य में गंभीर समस्या को उजागर करता है. बाड़मेर जिले के कम से कम 12 गांव अपने पानी को 'बचाने' के लिए इसी तरह के उपायों का सहारा ले रहे हैं. चोहटन तहसील के रमजान की गफान पंचायत के हर गांव में 50 घर हैं, जबकि इन तमाम घरों के लिए पानी मुहैया कराने की खातिर महज एक कुंआ है.

ऐसे ही एक गांव के रहने वाले अमीर खान ने बताया, 'सुबह 10 बजे तक आप 50 से 60 बाल्टी पानी निकाल सकते हैं. इसके बाद लोग ड्रम में ताला लगा देते हैं, क्योंकि पानी को आसानी से चुराया जा सकता है. यहां यह समस्या आम हो चुकी है.'

खान के मुताबिक, ज्यादातर कुंओं में पानी अगले दिन रीचार्ज हो जाता है, लेकिन और पानी प्राप्त करना मुश्किल है, क्योंकि नजदीकी जल निकाय इस इलाके से काफी दूर है. उन्होंने बताया, 'सरकार की तरफ से पानी की सप्लाई के लिए गांव में कोई पाइप लाइन नहीं है. सर्वतला झील तकरीबन 40-45 किलोमीटर दूर है और रास्ता काफी ऊबड़-खाबड़ है. झील से किसी तरह का नाला या पाइपलाइन नहीं तैयार किया गया है और दूसरा कोई विकल्प नहीं है. हम सिर्फ बारिश के पानी पर निर्भर हैं.'

water conservation

इस इलाके में पानी के टैंकर की उपलब्धता के बारे में पूछे जाने पर खान ने बताया कि गांव में महीने में दो बार एक टैंकर पहुंचता है. उनका कहना था, '6,000 लीटर पानी का एक टैंकर 15 दिनों के लिए तकरीबन 60 घरों को पानी की सप्लाई मुहैया कराता है. इसका मतलब यह हुआ कि औसतन हर घर को रोजाना सिर्फ 6 लीटर पानी मिलता है. हमारे लिए पानी का साधन मिलना बेहद मुश्किल है.'

'बेहद खर्चीला मामला है पाइपलाइन बिछाना'

स्थानीय इकाइयों ने इस सिलसिले में कई बार राज्य सरकार से संपर्क किया है, लेकिन उसका कोई नतीजा नहीं निकला. खान कहते हैं, 'जल परिषद को कई बार सूचित किया गया है और विभाग को कई चिट्ठियां लिखी गई हैं. हालांकि, हमें उनसे अब तक कोई जवाब नहीं मिला है. हमें उम्मीद है कि यह मसला कभी कभी न कभी जरूर सुलझेगा.'

पानी की किल्लत राजस्थान की सबसे ज्वलंत समस्याओं में से एक है. जमीन के नीचे का पानी खतरनाक रफ्तार से सूख रहा है, लिहाजा डार्क जोन की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है. राज्य के कुछ हिस्सों में तापमान 47 डिग्री तक पहुंच जाने के कारण हालात और मुश्किल भरे हो गए हैं.

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राजस्थान सरकार के पब्लिक हेल्थ इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट के चीफ इंजीनियर (ग्रामीण) सीएम चौहान ने बताया, 'सरकारी नियमों के मुताबिक, 1,500 से ज्यादा आबादी वाले इलाकों में ही पानी का लाइन बनाने की बात है. इसी वजह से कुछ गांवों में पानी का पाइपलाइन उपलब्ध नहीं है. नदी जैसे पानी के प्राकृतिक संसाधन भी कुछ गांवों से काफी दूर हैं, जिसके कारण वहां पानी का पाइप लाइन बिछाना काफी खर्चीला है.'

उनका कहना था, 'लोग इन इलाकों में ट्यूबवेल और हैंडपंप के जरिए पानी का इस्तेमाल करते हैं. अब चूंकि भूजल स्तर काफी नीचे जा रहा है और हैंडपंप सूख रहे हैं, लिहाजा पानी को ढो कर लाना ही एकमात्र तात्कालिक समाधान है. ढुलाई के नियमों के तहत रोजाना प्रति व्यक्ति 10 लीटर पानी की इजाजत है. यह सिर्फ पीने के मकसद के लिए है. कुछ इलाकों में कम आबादी है, जबकि एक टैंकर की क्षमता ज्यादा है. लिहाजा, हम वहां साइज के आधार पर एक सप्ताह या 10 दिनों के लिए पानी की सप्लाई करते हैं.'

प्रतीकात्मक तस्वीर रॉयटर से

प्रतीकात्मक तस्वीर रॉयटर से

लोगों को वाटर हार्वेस्टिंग के लिए किया जा रहा प्रोत्साहित

चौहान का यह भी कहना था कि गांवों के लोगों को अब वाटर हार्वेस्टिंग के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है. राज्य में बारिश के पानी को संग्रह करने की अपनी चुनौतियां हैं. बीते साल यानी 2017 में राजस्थान में नॉर्मल से 26 फीसदी ज्यादा बारिश हुई. इस दौरान राज्य के 33 में से 8 जिलों में असामान्य बारिश हुई. व्यापक स्तर पर भी पानी की उपलब्धता की स्थिति काफी अच्छी नहीं है.

नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट- कंपोजिट वाटर मैनेजमेंट इंडेक्स' (सीडब्ल्यूएमआई) के मुताबिक, भारत के 21 शहरों में साल 2020 तक भूजल तकरीबन खत्म हो जाएगा. इससे औसतन देश के 10 करोड़ लोग प्रभावित होंगे. इसके अलावा, रिपोर्ट की मानें तो 2030 तक तकरीबन 40 फीसदी भारतीयों के पास पीने का पानी उपलब्ध नहीं होने की आशंका है.

(लेखक राजस्थान की स्वतंत्र पत्रकार और 101Reporters.com की सदस्य हैं. 101Reporters.com देशभर में जमीनी स्तर पर काम करने वाले पत्रकारों का नेटवर्क है)

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