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पर्यावरण इंडेक्स में 177वें पायदान पर भारत: हम मरने की कगार पर हैं पर उलझे हैं पद्मावत में

पद्मावत महज एक फिल्म है जिसे हम देखेंगे और भूल जाएंगे. लेकिन पर्यावरण इंडेक्स का मामला हम भूलना भी चाहें तो ऐसा नहीं कर पाएंगे, क्योंकि मामला हमारी जिंदगी पर भारी पड़ रहा है

Ravi kant Singh Updated On: Jan 25, 2018 11:53 AM IST

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पर्यावरण इंडेक्स में 177वें पायदान पर भारत: हम मरने की कगार पर हैं पर उलझे हैं पद्मावत में

हाल की दो घटनाएं काफी अहम हैं. एक तो पद्मावत पर बवाल तो दूसरी ओर पर्यावरण इंडेक्स में भारत का 177वें पायदान पर सरक जाना. गंभीरता की कसौटी पर आंकें तो पहली घटना जहां तफरी और हुड़दंग से जुड़ी है तो दूसरी घटना हमारी इहलीला को लीलने पर उतारु है. जी हां. पद्मावत से हमारा जीना-मरना कतई नहीं जुड़ा है. पद्मावत महज एक फिल्म है जिसे हम देखेंगे और भूल जाएंगे. लेकिन पर्यावरण इंडेक्स का मामला हम भूलना भी चाहें तो ऐसा नहीं कर पाएंगे, क्योंकि मामला हमारी जिंदगी पर भारी पड़ रहा है. आज देश के पर्यावरण की हालत यह है कि सबसे नीचे के पांच देशों में हम शामिल हो चुके हैं. 2016 के एनवायरमेंट परफॉरमेंस इंडेक्स में भारत 141वें पायदान पर था. 2018 में यह 36 अंक गिर कर 177 वें स्थान पर पहुंच गया है.

जरा आंकड़ों पर गौर करें. पर्यावरण की सेहत के मामले में हम अन्य देशों के साथ पैंदे पर खड़े हो गए हैं. हवा की क्वालिटी इससे बदतर क्या हो सकती है कि 180 की रैंकिंग में हम 177 पर सरक जाएं. इतना कुछ के बावजूद पूरा देश इस पर माथापच्ची कर रहा है कि पद्मावत चले या नहीं. भंसाली के सिर पर ईनाम रखें या दीपिका पदुकोण को 'सूर्पनखा' बनाएं.

मर रहे हैं लोग, लेकिन फिक्र किसे

दरअसल भारत में पीएम 2.5 यानी बेहद महीन प्रदूषक कणों से मरने वालों वालों की संख्या पिछले एक दशक में बढ़ गई है. इस तरह के प्रदूषण से हर साल देश में 16 लाख 40 हजार लोगों की मौत हो जाती है. एनवायरमेंटल परफॉरमेंस इंडेक्स में स्विट्जरलैंड पहले नंबर पर है. इसके बाद फ्रांस, डेनमार्क, माल्टा और स्वीडन का नंबर है. सूचकांक की रिपोर्ट में कहा गया है कि पब्लिक हेल्थ के लिए खराब पर्यावरण सबसे बड़ा खतरा है.

बुरूंडी, कांगो के साथ खड़ा भारत

जीडीपी और आर्थिकी का हम लाखों खम ठोकें, पर्यावरण के मामले में बांग्लादेश, बुरूंडी, कांगो और नेपाल जैसे देशों से हम बहुत अच्छे नहीं हैं. येल और कोलंबिया यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट यही बताती है. डावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम से परे एक कार्यक्रम में यह सूचकांक जारी किया गया.

भारत में सरकार ने ठोस ईंधन और पराली जलाने के खिलाफ कई सख्ती बरती है. इंडेक्स गवाह है कि सारी कार्रवाई या तो हवा-हवाई है या फिर कागजों में कैद है. जैसा कि सरकारी निर्देश बताते हैं, वाहनों से निकलने वाले उत्सर्जन मानकों को कड़ा किया गया है. तब भी देश में वायु प्रदूषण का स्तर कम नहीं हुआ है. चीन हमारा पड़ोसी जरूर है, लेकिन पर्यावरण के मामले में नहीं. क्योंकि चीन में पर्यावरण की स्थिति बहुत अच्छी ना होते हुए भी रैंकिंग में 120वें स्थान पर है और हम कहां 177वें स्थान पर हैं.

विकास का जहरीला धुआं घातक

वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट की मानें तो भारत और चीन में प्रदूषण खतरनाक स्तर पर इसलिए है क्योंकि यहां आर्थिक गतिविधियां तेज हैं. दोनों देश विकास के रास्ते पर अग्रसर हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, देश जैसे-जैसे विकसित होते जाते हैं, वैसे-वैसे शहरों में लोगों की भीड़ बढ़ती है, औद्योगिक उत्पादन बढ़ता है, गाड़ियों की संख्या बढ़ती है और इससे लोग प्रदूषण के चपेट में आते हैं.

फिल्म है तो सियासत है, पर्यावरण से क्या

विडंबना देखिए कि जिस पर बहस होनी चाहिए, उस पर कुछ नहीं हो रहा. हमारी पूरी बहस पद्मावती के आस-पास सिमट गई है. जबकि इसकी ऐतिहासिक औकात शून्य से ज्यादा नहीं है. यह बात कोई और नहीं, बल्कि बीजेपी के फायरब्रांड नेता सुब्रमण्यम स्वामी कह रहे हैं. स्वामी ने पद्मावत बवाल पर कहा, 'इससे पुराने घाव ताजा होते हैं, इसलिए ऐसी फिल्में नहीं बननी चाहिए. इसकी ऐतिहासिक कीमत क्या है? जीरो है. निर्माता कहते हैं फिल्म का इतिहास से कुछ भी लेना-देना नहीं है, तो फिर क्यों बनाते हो?' स्वामी ने आगे पूछा, राहुल गांधी इसपर कोई स्टैंड क्यों नहीं ले रहे?

दूसरी ओर, राहुल ने ट्वीट कर कहा कि बच्चों के खिलाफ हिंसा को जायज ठहराने के लिए कोई भी कारण बड़ा नहीं हो सकता. घृणा और हिंसा कमजोरों का हथियार होता है. बीजेपी घृणा और हिंसा का उपयोग कर देश में आग लगा रही है.

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