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द्विपक्षीय वार्ता की थ्योरी ही गड़बड़ है!

द्विपक्षीय वार्ता आर्ट फिल्म टाइप की हो जाती है और आजकल मामला कमर्शियल फिल्मों का है

Updated On: Apr 17, 2017 01:28 PM IST

Piyush Pandey

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द्विपक्षीय वार्ता की थ्योरी ही गड़बड़ है!

कुछ राजनेताओं के लिए विवादित बयान इसबगोल की भूसी की तरह होते हैं. कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह संभवत: इसी विशिष्ट श्रेणी के राजनेता हैं.

वो सुबह उठते हैं. आंख मूंदकर अखबार में किसी खबर पर उंगली रखते हैं. फिर उस खबर में प्रधानमंत्री मोदी का नाम घुसेड़कर एक चटपटा बयान गढ़ते हैं. निकट रखे टीआरपी तराजू पर उस बयान को तोलते हैं. बयान 24 तोला टंच निकलता है तो फौरन किसी चैनल वाले को बुलाकर दे डालते हैं.

उनका ताजा विवादित बयान है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2019 का चुनाव जीतने के लिए पाकिस्तान पर आक्रमण कर सकते हैं.

मुझे दिग्विजय सिंह के बयान पर आपत्ति नहीं है. मैं ज्योतिषी भी नहीं कि ऐसा होगा या नहीं-कह सकूं. दरअसल, मैं उन लोगों के खिलाफ हूं, जो पाकिस्तान की नौटंकी के बीच पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय वार्ता का सुझाव दे रहे हैं. दरअसल, मैं द्विपक्षीय वार्ता की थ्योरी के ही खिलाफ हूं. पाकिस्तान के मुद्दे पर लौटने से पहले मैं इस थ्योरी पर अपना मत रखना चाहता हूं.

संसद में दिग्विजय सिंह हंसते हुए (फोटो: पीटीआई)

बुरा एक्सपीरियंस रहा है अपन का

बात उन दिनों की है, जब ‘सौदागर’ फिल्म का ईलू-ईलू सुनकर हमें पहली बार मुहब्बत हुई थी. इस पहली मुहब्बत को परवान चढ़ाने की चाहत में हमने एक प्रेम पत्र लड़की तक पहुंचवाया. पत्र में स्पष्ट लिखा था- ‘कृपया मामला द्विपक्षीय रखा जाए.‘

लेकिन लड़की ने नितांत द्विपक्षीय मामले को बहुपक्षीय बना दिया. लड़की के पिता, मामा से होते हुए मामला हमारे बापूजी तक पहुंचा और द्विपक्षीय प्रेम की तमाम संभावनाएं जूतों से पिटाई के बाद दम तोड़ गईं.

पड़ोसी शर्मा जी भी अपनी कार पर आए स्क्रैच के एक मामले को द्विपक्षीय वार्ता से हल करना चाहते थे. स्क्रैच मारने वाले से उन्होंने स्पष्ट कहा कि पांच हजार रुपए का भुगतान करे. शुरुआत में बंदा गुजारिश करता रहा कि मामला शांतिपूर्ण द्विपक्षीय वार्ता से हल किया जाए और दो हजार रुपए में मामला निपटाया जाए. शर्मा जी अड़े रहे। तभी सामने वाले के कुछ दोस्त मौका-ए-वारदात पर पहुंच गए. शाहरुख के 8 पैक एब्स से प्रेरित इन पहलवानों ने मामले को बिना वार्ता के द्विपक्षीय से न जाने कौन सा पक्षीय बना दिया. कुछ मिनटों बाद जब मैं उन्हें लेने पहुंचा तो शर्मा जी जमीनोन्मुखी पाए गए. धूल और गोबर से एक पक्षीय वार्ता करते हुए.

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समाज द्विपक्षीय वार्ता के खिलाफ है

मुझे लगता है कि समाज द्विपक्षीय वार्ता की इस समूची अवधारणा के खिलाफ है. दो पक्ष आपस में बात करें, उससे पहले ही कोई तीसरा पक्ष कान घुसाकर मुंह, फिर हाथ और फिर सशरीर मामले में घुस जाता है. मामला त्रिपक्षीय-चार पक्षीय होते-होते बहुपक्षीय हो जाता है. इस कदर कि फिर सभी पक्ष आपस में कंफ्यूज हो जाते हैं कि कौन किस पक्ष में है.

जहां दो पक्ष बेहद गोपनीय तरीके से दोपक्षीय वार्ता करते हैं, वहां भी न जाने किस सेटेलाइट तस्वीर के जरिए तीसरा पक्ष घुस आता है. मसलन- आप यूनिवर्सिटी में नंबर बढ़वाने जाइए. एक पक्ष से आपकी सारी सेटिंग हो जाएगी. बाबू और आपके बीच द्विपक्षीय वार्ता चल रही होगी कि कितने नंबर के लिए कितने का रेट है कि अचानक ऊपर से फरमान आएगा कि ऐसा संभव नहीं है और ऐसा चाहते हैं तो एक पक्ष मामले में और सम्मिलत होगा.

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फिर यह द्विपक्षीय वार्ता की फेल थ्योरी सिर्फ इंसानी समाज में ही नहीं है. पशु समाज भी ऐसा ही है. दो कुत्तों की लड़ाई में कई कुत्तों को बीच में घुसते आप रोज अपनी सड़क पर देख सकते हैं. पंचतंत्र की महान कहानी में जब दो बिल्लियां आपस में लड़ रही थीं, तब अचानक बंदर घुस आया. दोनों बिल्लियां लड़ने के बाद द्विपक्षीय वार्ता के जरिए मामला सुलटा सकती थीं, लेकिन बंदर ने मामले को त्रिपक्षीय बना दिया.

South Asian Association For Regional Cooperation Meet In Kathmandu

पाकिस्तान के साथ बातचीत में मसाले होने जरूरी

द्विपक्षीय अब कुछ नहीं है. ना मुहब्बत, ना लड़ाई. फिर द्विपक्षीय वार्ता का एक एंगल उसके बोरिंग होने से भी जुड़ा है. दो पक्ष मिलकर बात किए जा रहे हैं बस. कोई हंगामा नहीं, कोई जोर-आजमाइश नहीं. मजा नहीं आता इससे. द्विपक्षीय वार्ता एक लिहाज से आर्ट फिल्म टाइप की हो जाती है, और आजकल मामला कमर्शियल फिल्मों का है. और कमर्शियल फिल्म में सारे मसाले होने चाहिए.

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जरूरी है कि पाकिस्तान से कोई भी संवाद हो तो उसमें सारे मसाले हों क्योंकि सच यह है कि पाकिस्तान से द्विपक्षीय वार्ता संभव नहीं है. वो भी शांतिपूर्ण द्विपक्षीय वार्ता तो कतई संभव नहीं क्योंकि पाकिस्तान में शांतिपूर्ण द्विपक्षीय वार्ता तो सेना और प्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री और इमरान खान, तालिबान और सरकार, शाहिद आफरीदी और वकार युनूस ,बलूचिस्तान और केंद्र सरकार के बीच नहीं हो पा रही है, फिर पाकिस्तान भारत से कैसे शांतिपूर्ण द्विपक्षीय वार्ता करेगा?

वैसे, इतिहास गवाह है कि ‘कुत्ते की पूंछ’ कितने भी पक्ष मिलकर सीधी नहीं करा पाए हैं.

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