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मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में धंधा हुआ मंदा, हो सकती है छंटनी

नोटबंदी के पहले 34 दिनों में एसएमई उद्योग धंधों को 35 से 50 फीसदी का नुकसान झेलना पड़ा है

Ravishankar Singh Ravishankar Singh Updated On: Mar 06, 2017 08:04 AM IST

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मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में धंधा हुआ मंदा, हो सकती है छंटनी

देश में अगले कुछ दिनों में नौकरियों में छंटनी की जा सकती है. देश में पिछले सात वर्षों में पहली बार मैन्युफैक्चर्ड वस्तुओं की बिक्री में 3.7 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है.

विश्व में आर्थिक मंदी और मांग में कमी के कारण भारत के उद्योग धंधे पर सीधा असर पड़ रहा है. भारत से निर्यात होने वाले प्रमुख सामान जैसे चमड़ा, स्टील और वस्त्र उद्योग का बुरा हाल हो गया है.

साल 2014 के नवंबर महीने में प्रधानमंत्री मोदी ने 'मेक इन इंडिया' कार्यक्रम की शुरुआत की थी. 'मेक इन इंडिया' के तहत सरकार ने निवेश के लिए कई योजनाओं की शुरुआत की थी. इसके बावजूद साल 2015-16 के दौरान भारत में तैयार वस्तुओं की बिक्री में 3.7 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है.

दूसरी तरफ प्रमुख कंपनियों ने छंटनी शुरू कर दिया है. साल 2016 के शुरुआत से सितंबर 2016 तक एक इंजीनियरिंग कंपनी ‘लार्सन एंड टुब्रो’ ने करीब 14 हजार कर्मचारियों को छंटनी कर दी. सॉफ्टवेयर कंपनी माइक्रोसॉफ्ट, आईबीएम, नोकिया जैसी कई बड़ी कंपनियों ने भी अपने कर्मचारियों की छंटनी छोटे स्तर पर की है. अब इंफोसिस, स्नेपडील जैसी कंपनियां छटनी कर रही हैं.

जानकार मानते हैं कि विश्व में आर्थिक मंदी और ऊपर से नोटबंदी ने भारत के एसएमई इंडस्ट्री के धंधे को चौपट कर दिया है. है. मांग में आई कमी के कारण कंपनियों के द्वारा लगातार छंटनी की जा रही है.

'मेक इन इंडिया' अभियान की शुरुआत के कुछ दिन बाद ही नोकिया ने चैन्नई स्थित अपना प्लांट बंद कर दिया था. प्लांट के बंद होने से प्लांट में काम करे 6600 कर्मचारी बेरोजगार हो गए थे.

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नोटबंदी का असर कपड़ा और चमड़ा इंडस्ट्री पर सबसे अधिक 

मांग में कमी के लिए यूरोपीय मार्केट में मंदी, ब्रेग्जिट और नोटबंदी का असर भारत के कपड़ा और लेदर इंडस्ट्री पर नजर आ रहा है. भारत से निर्यात होने वाली ये दो महत्वपूर्ण वस्तुएं हैं.

सरकार की कुछ नीतियों की वजह से भी मांग में कमी आ रही है जैसे उच्च आयात शुल्क, स्थानीय लागत में वृद्धि. इन कारणों की वजह से मांग में गिरावट आई है.

आरबीआई  ने एक आंकड़ा जारी किया है, जिसमें साल 2015-16 में सेवा क्षेत्र में 4.9 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है. पिछले सात सालों में पहली बार विनिर्माण क्षेत्र में गिरावट देखी गई है. साल 2009-10 में 12.9 फीसदी की वृद्धि दर थी जो कि 2015-16 में  नकारात्मक यानी -3.7 फीसदी हो गई है.

पिछले कुछ सालों से 100 करोड़ रुपए से कम की सालाना बिक्री वाली कंपनियों पर गंभीर असर देखने को मिले हैं. आरबीआई के मुताबिक पिछले सात सालों में इन कंपनियों के बिक्री पर गंभीर असर पड़े हैं.

साल 2009-10 में 8.8 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई तो साल 2015-16 आत-आते इन कंपनियों की बिक्री में 19.2 प्रतिशत की गिरावट देखी जा रही है.

जानकार मानते हैं कि निवेश में जो गिरावट आई है वह मांग में कमी आने के कारण हुई है. भारतीय रिजर्व बैंक की ताजा रिपोर्ट में तिमाही दर तिमाही साल दर साल गिरावट दर्ज की गई है.

लागत में कटौती का आसान रास्ता छंटनी 

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व्यापारी वर्गों का कहना है कि अगर बिक्री में सुधार नहीं हुआ तो कंपनियां लागत में कटौती करेगी. जानकार मानते हैं कि भारत में लागत में कटौती करने का सबसे आसान तरीका है कर्मचारियों की संख्या में कमी करना. विश्व की अर्थव्यवस्था में अगर सुधार नहीं हुआ तो आने वाले कुछ दिनों में और छंटनी देखने को मिलेगा.

भारत के श्रम मंत्रालय के द्वारा साल 2015 को लोकसभा में एक आंकड़ा पेश किया गया. इस आंकड़े के अनुसार पिछले चार सालों में 186 औद्योगिक कारखाने बंद किए गए हैं. जिसकी वजह से 12176 लोगों को रोजगार से हाथ धोना पड़ा है.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार भारत में वित्तीय संकट की वजह से कई कंपनियों को बंद करना पड़ा. नोटबंदी के पहले 34 दिनों में एसएमई उद्योग धंधों को 35 से 50 फीसदी का नुकसान झेलना पड़ा है.

पीएम मोदी ने रोजगार देने के मकसद से कई योजनाओं की शुरुआत कर रहे हैं. 'मेक इन इंडिया' भी उनमें से एक है. सरकार मेक इन इंडिया के तहत निवेशकों को रिझाने का खूब प्रयास कर रही है. लेकिन, पिछले कुछ सालों में मैन्युफैक्चर्ड वस्तुओं की बिक्री में गिरावट ने सरकार को मुश्किल में डाल दिया है.

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