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डोकलाम विवाद: चीन को समझ आ गया है कि ये 1962 वाला भारत नहीं है

1962 की हार से बीते कुछ दशकों में भारत का चीन के प्रति जो सहमा हुआ स्टैंड था वह डोकलाम में बिल्कुल बदला नजर आया

Updated On: Aug 30, 2017 01:33 PM IST

Ajay Singh Ajay Singh

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डोकलाम विवाद: चीन को समझ आ गया है कि ये 1962 वाला भारत नहीं है

1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद उस वक्त भारत में ऑस्ट्रेलिया के उच्चायुक्त वाल्टर क्रॉकर ने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की हालत एक कविता के जरिए बयां की थी. ये कविता ब्रिटिश कवि रॉबर्ट ब्राउनिंग ने लिखी थी. हिंदी में इसका अनुवाद कुछ इस तरह से होगा-

मैं एक बूढ़ा और अकेला आदमी हूं मेरी आंखें डूबते सूरज जैसा देखती हैं मेरे दिल की कड़वाहट आंसुओं से निकलती है मेरा हर दिन एक जैसा ही है मैं एक ठहरे पानी की तरह हूं...मैं और क्या कहूं?

वाल्टर क्रॉकर ने नेहरू की शानदार जीवनी लिखी थी. इस किताब में 1962 के युद्ध के बाद के नेहरू की हालत को उन्होंने बखूबी बयां किया था. क्रॉकर ने लिखा था कि, 'चीन के हमले के बाद नेहरू दोबारा मजबूती से नहीं चल सके'. वाल्टर क्रॉकर ने अपनी किताब में लिखा है कि 1962 के हमले के बाद नेहरू का लोगों पर से भरोसा उठ गया था. फिर वो चाहे चीन के हों या हिंदुस्तान के. चीन के हमले से नेहरू का भरोसा टूटा था. वो जिस पर सबसे ज्यादा यकीन करते थे, उन्होंने नेहरू का भरोसा तोड़ा था .

Jawahar Lal Nehru

पंडित जवाहरलाल नेहरू

निजी तौर पर तो नेहरू टूट ही गए थे. 1962 की जंग के बाद उनकी जो सोच थी, वो लंबे वक्त तक भारत की चीन नीति को प्रभावित करती रही थी. पिछले पांच दशक से भारत, चीन के साथ रिश्तों में कूटनीति को अहमियत देता रहा. चीन की सैन्य ताकत के आगे खुद को कमजोर समझता रहा. सीमा पर हर झड़प के बाद भारत का चीन के आगे झुकने वाला ही रवैया रहा. चीन को भी भारत से अपनी बात मनवाने की आदत पड़ गई थी.

यही वजह है कि सोमवार को तड़के जब दोनों देशों के राजनयिक डोकलाम से सेना हटाने के सहमति पत्र को तैयार कर रहे थे, तो उसकी भाषा बदली हुई थी. दोनों देशों के बीच रिश्ते का माहौल भी बदला हुआ था. भारत ने डोकलाम को लेकर जो नीति अपनाई, उससे साफ हो गया कि भारत ने 1962 की हार के भूत को अपने सिर से उतार दिया है. अब एशिया के दो बड़े देशों की ताकत का संतुलन और रिश्ते नए सिरे से तय हो रहे हैं.

अगर हम डोकलाम विवाद के सुलझने को हार और जीत के चश्मे से देखेंगे, तो ये बचकाना होगा. ये न तो किसी पक्ष की हार है और न ही किसी की जीत. हां, ये तय है कि दोनों देशों के बीच रिश्ते अब नई शर्तों पर तय होंगे. ऐसा करके प्रधानमंत्री मोदी ने जता दिया है कि वो जोखिम लेने से नहीं डरते. वो साहसिक कदम उठाने से भी पीछे नहीं हटने. मोदी ने जता दिया है कि देश हित में वो किसी भी सीमा तक जाने को तैयार हैं.

ताजा हालत की तुलना पहले के दौर से कीजिए. पहले जब भी भारत-तिब्बत सीमा पुलिस ने सरहद पर चीन के निर्माण पर चिंता जताई थी, तो सरकार ने कोई भी कदम नहीं उठाया.

Indian army soldiers are seen after snowfall at India-China trade route at Nathu-La

साल 2000 तक भारत-तिब्बत सीमा पुलिस के पास माना के आगे के सरहदी इलाके तक पहुंचने की सुविधा भी नहीं थी. सीमावर्ती इलाकों की सड़कें इतनी खराब थीं कि जो लोग सीमा पर गश्त के लिए जाते थे, उनको मुख्यालय से संपर्क बनाए रखने के लिए सैटेलाइट फोन दिए जाते थे. ताकि वो किसी इमरजेंसी की सूरत में उस फोन के जरिए मदद मांग सकें. सेना और आईटीबीपी ने कई बार इस दिक्कत का जिक्र सरकारी अधिकारियों से किया, मगर उनकी कोई सुनवाई नहीं हुई. सेना और आईटीबीपी को ये लगता था जैसे वो दीवार से सिर फोड़ रहे हैं.

भारत के नेताओं और अफसरों के दिल में चीन का अनकहा डर बैठा हुआ था. नेहरू के बाद की भारत की तमाम सरकारें चीन को लेकर शुतुरमुर्गी नीति पर चलती रहीं. इनमें अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार भी शामिल थी. भारत के हुक्मरान चीन की चुनौती की तरफ से आंखें मूंदे रहे. वो 1962 की लड़ाई में हार का भूत सिर से उतार ही नहीं सके थे. चीन के साथ रिश्तों की बात आते ही भारत के नेताओं-अफसरों पर डर हावी हो जाता था.

लेकिन, डोकलाम मसले पर मोदी सरकार ने जिस तरह से शुरुआत से ही सख्त रुख अपनाया, वो भारत की कूटनीति का बिल्कुल नया ही रूप-रंग था. मोदी सरकार को बहुत से जानकारों ने चेतावनी दी थी कि चीन के इरादे खतरनाक हैं. मोदी को सलाह दी गई कि चीन के प्रति बेरुखी का रवैया ही ठीक है. लेकिन मोदी ने ये तमाम सलाहें अनसुनी कर दीं. मोदी ने चीन को लेकर अपनी अलग नीति पर चलने की ठानी. वो चीन से पिछली सरकारों की तरह रिश्ते नहीं निभाना चाहते थे.

यही वजह है कि जब उन्होंने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को भारत आने का न्यौता दिया, तो उनकी मेहमाननवाजी दिल्ली के बजाय अहमदाबाद में की. उन्होंने शी जिनपिंग के साथ दोस्ताना ताल्लुक की खुलकर नुमाइश की. वो भी तब, जब उसी दौरान चीन ने लद्दाख में घुसपैठ की कोशिश की थी. ये तनातनी काफी दिनों तक चली थी.

जिस वक्त मोदी अहमदाबाद में जिनपिंग और उनकी पत्नी पेंग लियुआन की अगुवानी कर रहे थे, ठीक उसी वक्त गृह मंत्रालय के अधिकारी, लद्दाख में चीन की घुसपैठ को लेकर फिक्रमंद थे.

सूत्र बताते हैं कि लद्दाख में चीन की हरकत को लेकर मोदी ने ऊपरी तौर पर तो कोई सख्ती नहीं दिखाई. मगर शी जिनपिंग के साथ बातचीत में इस घुसपैठ के मुद्दे को मजबूती से उठाया था. सूत्रों के मुताबिक मोदी ने जिनपिंग से पूछा कि आखिर जब भी चीन के बड़े नेता भारत आते हैं, उसी वक्त घुसपैठ की घटनाएं क्यों होती हैं? जिनपिंग ने इस बात को गंभीरता से लिया. नतीजा ये हुआ कि जैसे ही चीन के राष्ट्रपति स्वदेश लौटे तो ये विवाद सुलझ गया.

हालांकि मोदी को जल्द ही ये एहसास हो गया कि दोनों नेताओं के आपस में अच्छे रिश्ते इस बात की गारंटी नहीं हैं कि दोनों देशों के बीच हालात और रिश्ते भी सामान्य रहें. ये बात उस वक्त साफ हो गई, जब चीन ने न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप में भारत की एंट्री को वीटो कर दिया. पाकिस्तान के कुछ आतंकवादियों को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित करने के संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रस्ताव को भी चीन ने वीटो कर दिया.

इसका बदला मोदी ने अपने तरीके से लिया. भारत ने चीन के महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट वन बेल्ट, वन रोड का समर्थन करने से मना कर दिया. भारत ने इस पर हुई कांफ्रेंस में भी हिस्सा नहीं लिया. दिल्ली में भारत के दूतावास ने अपनी सरकार को ये यकीन दिलाया था कि भारत वन बेल्ट वन रोड कांफ्रेंस में हिस्सा लेगा. लेकिन, भारत ने कहा कि ये प्रोजेक्ट उसकी संप्रभुता में दखल है. भारत के इस रुख का कई देशों ने समर्थन किया. चीन को इसकी बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी. उसे लगा था कि हर बार की तरह इस बार भी भारत उसके आगे झुकेगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

EDS PLS TAKE A NOTE OF THIS PTI PICK OF THE DAY:::::::::: Hamburg : Prime Minister Narendra Modi and Chinese President Xi Jinping exchange greetings at the BRICS leaders' informal gathering, in Hamburg, Germany on Friday. PTI Photo / Twitter (PTI7_7_2017_000125B)(PTI7_7_2017_000236B) *** Local Caption ***

चीन को वन बेल्ट वन रोड पर भारत के रुख से ही समझ जाना चाहिए था कि भारत अब बदल चुका है. लेकिन चीन ये कूटनीतिक संदेश नहीं समझ पाया. भारत को लेकर चीन के विदेश मंत्रालय का अनुमान गलत साबित हो गया. डोकलाम को लेकर चीन ने आक्रामक बयानबाजी से भारत को धमकाने और दबाने की कोशिश की. लेकिन भारत ने बेहद परिपक्व मगर सख्त रुख अपनाए रखा. भारत ने चीन की धमकियों की अनदेखी करते हुए ये साफ कर दिया कि वो अपने हितों की रखवाली के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है.

चीन को आखिर में ये अंदाजा हो गया कि वो 1962 की जंग का हवाला देकर भारत को डरा नहीं सकता. रक्षा मंत्री अरुण जेटली ने ठीक ही कहा था कि 2017 के भारत और 1962 के भारत में बहुत फर्क है. अब जब प्रधानमंत्री मोदी ब्रिक्स सम्मेलन में शामिल होने चीन जाएंगे, तो वो बेहद मजबूती स्थिति में होंगे.

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