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क्या गुल खिलाएगी भारत की उत्तर कोरिया के बारे में बदलती नीति

अमेरिका-जापान-दक्षिण कोरिया की तरफ भारत का झुकाव पहले की तुलना में ज्यादा होता है तो यह आगे चलकर भारत के फायदे में साबित होगा

Sreemoy Talukdar Updated On: Sep 17, 2017 05:11 PM IST

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क्या गुल खिलाएगी भारत की उत्तर कोरिया के बारे में बदलती नीति

उत्तर कोरिया को लेकर भारत में जो वाद-विवाद चलते हैं. उनमें प्रचलित एक आम ख्याल यह है कि निरंकुश वंशवाद का डंडा फटकार रहे युवा तानाशाह किम-जोंग उन सनकी आदमी है. मुमकिन है, बेतरतीब हेयरकट और फूले गालों वाले 33 वर्षीया तानाशाह किम जोंग खुद ही चाहते हों कि उनकी छवि एक सनकी आदमी की बने.

तानाशाह होना कैसे किम जोंग के लिए है फायदेमंद

दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति के साथ एटमी लड़ाई ठानने के अबूझ जान पड़ते कदम और विस्फोटक बयानबाजी के जरिए उत्तर कोरिया का यह तानाशाह निश्चित ही दुनिया को यह जताना चाहता है कि वह खतरे की हद तक पागलपने का शिकार है. एक ऐसा उन्मादी जो किसी एक कोने में खड़े होकर एटमी धमाके के किसी बटन पर अंगुली बस दबाने वाला ही है.

लेकिन पागलपना एक कारगर सैन्य नीति भी हो सकती है. यह बात अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने कही थी. अगर हम किसी व्यक्ति को सनकी समझ लेते हैं तो बड़ी आशंका है कि हम उसकी धमकियों को या तो बढ़ा-चढ़ाकर आंके या फिर उसे जरूरत से ज्यादा कम समझ लें. ऐसी सूरत में हम विरोध की सही रणनीति नहीं बना पाते. ध्यान दीजिए कि अपनी सारी ताकत और चतुराई के बावजूद किस तरह अमेरिका उत्तर कोरिया के एटमी कार्यक्रम की काट में कोई कारगर रणनीति नहीं बना पा रहा है.

अगर अमेरिका की हालत ऐसी है तो फिर संयुक्त राष्ट्रसंघ के बारे में कुछ ना कहा जाए तो ही अच्छा. संयुक्त राष्ट्रसंघ ने उत्तर कोरिया पर प्रतिबंध लगाए हैं लेकिन ये प्रतिबंध कुछ वैसे ही साबित हो रहे हैं जैसे गैंडे की पीठ पर कोई चींटी अपने दांत चुभो रही हो. अपने से ताकतवर देशों से होड़ करने के मामले में सनकी होने की छवि किम जोंग उन के लिए इस लिहाज से भी फायदेमंद है कि उन्हें अपने फैसलों को नैतिकता के किसी चौखटे में रखकर पेश करने की जरूरत नहीं रह जाती, उन्हें बस इतना भर जताने की जरूर है कि हम बस छुट्टा सांड हैं और अपने को जिन्दा रखने के लिए हमला करने पर आमादा हैं.

लेकिन किम जोंग उन को बेलगामै सनकी मानना एक बड़ी भूल है. उत्तर कोरिया का तानाशाह एकदम सधा हुआ खिलाड़ी है. उसके होश-ओ-हवाश एकदम दुरुस्त है और उसे साफ-साफ दिख रहा है कि इराक के सद्दाम हुसैन या लीबिया के मुअम्मर गद्दाफी जैसी हालत को हासिल नहीं होना है तो फिर एटमी हथियारों का जखीरा अपने पास जमा करके रखना जरूरी है.

इन दोनों नेताओं को फुसलाया गया कि तुम अपने एटमी कार्यक्रम से परहेज करो तो तुम्हारे मुल्क के खिलाफ लगे प्रतिबंधों में ढील बरती जाएगी और सहायता दी जाएगी और फिर एक बार उन्होंने इस रास्ते पर कदम बढ़ाए तो अमेरिका ने आगे बढ़कर उन्हें सत्ता से बेदखल करते हुए उन्हें मार डाला.

लेखक और प्रोफेसर आंद्रेई लेंकोव ने किम वंश के बारे में फॉरेन पॉलिसी में लिखा है 'सियासी मामलों में किम हमेशा जुझारू साबित होते हैं, एकदम आखिर-आखिर तक टिके रहने वाले. वे बहुत सोच-समझकर दांव खेलते हैं और उनके हर कदम का एक स्पष्ट उद्देश्य होता है. इस वंश के लोगों के हाथ में सत्ता है और इसे देखते हुए उन्हें पागलपन ना सिर्फ गलत है बल्कि खतरनाक भी.'

उत्तर कोरिया का एटमी कार्यक्रम बड़ी तेजी से प्रगति कर रहा है

चौतरफा घिरा हुआ उत्तर कोरिया के तानाशाह को लगता है कि सिर्फ एटमी हथियारों का जखीरा ही तैयार करना जरूरी नहीं बल्कि अपने को बचाए रखने के लिए अमेरिका तक निशाना साधने की सलाहियत हासिल करना भी जरूरी है. ऐसा करने पर ही माना जा सकता है कि उत्तर कोरिया एक हद तक महफूज है.

 

Kim Jong Un, Ri Sol Ju

यह भी बहुत संभव है यह देखकर और ज्यादा ताकत मिली हो कि अमेरिका के ओवल ऑफिस (राष्ट्रपति निवास) में अब डोनाल्ड ट्रंप विराजमान हैं. किम ने शायद यह समझ लिया है कि जब उत्तर कोरिया पर संकट की घड़ी आन पड़ेगी तो अमेरिकी के एशियाई सहयोगी देशों के लिए खतरा बनना या फिर गुआम स्थित अमेरिकी फौजी ठिकाने को निशाना बनाना भर काफी नहीं होगा.

इसी समझ से शुक्रवार के दिन उत्तर कोरिया ने जापानी एयरस्पेस को भेदते हुए प्रशांत महासागर में बैलेस्टिक मिसाइल दागी. बीते 29 अगस्त से अब तक उसने ऐसा दूसरी बार किया है. मंझोली दूरी तक मार करने वाले ये बैलेस्टिक मिसाइल अपने साथ एटमी वारहेड ले जाने में सक्षम हैं.

उत्तर कोरिया का एटमी कार्यक्रम भी बड़ी तेजी से प्रगति कर रहा है. बीते 3 सितंबर को उत्तर कोरिया ने एक थर्मोन्यूक्लियर बम का परीक्षण किया जिसकी वजह से चीन में भूकंप के झटके महसूस किए गए और पूरी दुनिया में हलचल मच गई. अति उच्च कोटि के इस थर्मोन्यूक्लियर रक्षा-उपकरण को उत्तर कोरिया ने हाइड्रोजन बम बताया.

हिरोशिमा पर गिराए गए अमेरिकी बम से यह सौ गुना ज्यादा ताकतवर था. मामले के विशेषज्ञों का कहना है कि इस रक्षा उपकरण की डिजाइन और उसकी ताकत दो चरणों वाले थर्मोन्यूक्लियर बम के आंकड़ों से मेल खाते हैं और अगर इस थर्मोन्यूक्लियर रक्षा-उपकरण को अंतर्महाद्वीपीय(इंटरकान्टिनेन्टल) बैलेस्टिक मिसायल पर लगा दिया जाए तो वह उत्तर अमेरिका तक पहुंचकर उसके एक-दो शहरों को तबाह करने की ताकत रखता है. ह्वासोंग-14/केएन 20  उत्तर कोरिया का ऐसा ही हथियार है. इस दिशा में उत्तर कोरिया ने जैसी प्रगति की है उसे लेकर विशेषज्ञ हैरत में हैं.

रिसर्चर अंकित पांडा और एमआईटी के प्रोफेसर विपिन नारंग का कहना है कि उत्तर कोरिया ने अपने एटमी कार्यक्रम में अपूतपूर्व प्रगति की है. 'उत्तर कोरिया ने अपने राजकीय नियंत्रण वाले सेंट्रल न्यूज एजेंसी के मार्फत एक बड़ी जटिल तकनीकी सूचना जारी की जिससे जाहिर होता है कि उसके पास थर्मोन्यूक्लीयर बम की खास डिजायन विकसित करने की सलाहियत है. इस सूचना में उत्तर कोरिया ने दो चरणों वाले टेलर-यूलम बम की तकनीक के बारे में कुछ जानकारियां दी थीं. अगर सूचना सही है तो फिर उत्तर कोरिया ने बहुत बड़ी कामयाबी हासिक की है. आण्विक क्षमता से लैस कई देश इस तरह की डिजायन बनाने की सलाहियत हासिल करने के लिए बहुत जोर लगा रहे हैं लेकिन इसमें उन्हें कामयाबी नहीं मिली है जैसे कि भारत और पाकिस्तान जिन्होंने अपना परमाणु-परीक्षण बीस साल पहले 1998 में ही कर लिया था.  फ्रांस ने ऐसी विध्वंसक ताकत हासिल करने में 8 साल लगाए. फ्रांस 1968 में ऐसी डिजायन बना सका था. उत्तर कोरिया को इस मुकाम तक आने में महज 10 साल लगे- जो कि इस मुल्क पर लगी पाबंदियों को देखते हुए बहुत आश्चर्यचकित करने वाला है.' अंकित पांडा और विपिन नारंग ने यह बात वार ऑन द रॉक मैगजीन में लिखी है.

दोनों लेखकों का आंकलन है कि उत्तर कोरिया अभी और बहुत बाद के समय तक मिसाइल दागने जारी रखेगा ताकि वह ज्यादा से ज्यादा सटीक निशाना साधने की सलाहियत हासिल कर सके.

उत्तर कोरिया की यह कवायद प्योंगयांग के सत्ता-प्रतिष्ठान से जारी हो रही जुमलेबाजी से मेल खाती है जिसमें नार्थ कोरियन न्यूज एजेंसी (केसीएनए) ने किम जोंग उन को यह कहते हुए दिखाया है कि 'हमारा अंतिम लक्ष्य अमेरिकी के साथ वास्तविक ताकत का एक संतुलन कायम करना और अमेरिकी शासकों को यह बताना है कि वे फौजी कार्रवाई के बारे में सोचें भी नहीं..ह्वासोंग-12 की मारक क्षमता और विश्वसनीयता एक साबित तथ्य है.'

किम जोंग उन के फैसलों का असर भारत की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा

यह बात अब एकदम जाहिर है कि किम जोंग उन बिल्कुल मूर्ख नहीं है और उसकी गतिविधियां सनकीपन का नतीजा नहीं कही जा सकतीं. ऐसे में सवाल उठता है कि कोरियाई प्रायद्वीप में जब हालात इतने डांवाडोल हैं तो क्या भारत की उत्तर कोरिया को लेकर नीति पुख्ता है या फिर उसे दुरुस्त करने की जरूरत है. बेशक भारत उत्तर कोरिया के सीधे निशाने पर नहीं है लेकिन एशिया में अगर एटमी जंग छिड़ती है तो उसका असर पूरे इलाके पर पड़ेगा और एशिया की एक महाशक्ति होने के नाते भारत अपने को इस जंग से अछूता नहीं रख सकता. भारत की अर्थव्यवस्था पर भी बुरा असर पड़ेगा.

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हाल के महीनों में भारत की नीतियों में बड़े बदलाव आए हैं. भारत चीन और सऊदी अरब के बाद उत्तर कोरिया का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार था लेकिन संयुक्त राष्ट्रसंघ द्वारा लगाए प्रतिबंधों का सख्ती से पालन करते हुए भारत ने अब इस झगड़ालू मुल्क से सिर्फ खाद्य-पदार्थ और दवाइयों की ही तिजारत जारी रखी है, बाकी चीजों के व्यापार पर रोक लगा दी है. नीति में इस बदलाव की भारत ने कीमत भी चुकाई है. उत्तर कोरिया उन थोड़े से देशों में एक हैं जिनके साथ व्यापार संतुलन भारत के पक्ष में रहा है (साल 2015-16 में 111 मिलियन डॉलर के सामान का निर्यात और 88 मिलियन डॉलर के सामान का आयात)

बाकी मोर्चे पर भी बदलाव दिख रहे हैं. भारत किम राजवंश के मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों पर उसके खिलाफ संयुक्त राष्ट्रसंघ में मतदान करने से बचता रहा है. भारत ने अपने रिश्ते उत्तर कोरिया के साथ मधुर बना रखे थे, यहां के छात्रों को भारत तकनीकी प्रशिक्षण देता था. उत्तर कोरिया के विदेश मंत्री 2015 में नई दिल्ली के दौरे पर आए थे. देहरादून के सेंटर फॉर स्पेस साइंस एंड टेक्नोलॉजी इन एशिया एंड द पैसेफिक (सीएसएसटीईएपी) में चलने वाले तकनीकी प्रशिक्षण कार्यक्रम पर अमेरिका और संयुक्त राष्ट्रसंघ ने चिंता जताई थी.

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के सैम्युअल रमानी ने डिप्लोमेट में लिखा है कि, 'संयुक्त राष्ट्रसंघ ने 2016 में कहा कि सीएसएसटीईएपी का प्रशिक्षण कार्यक्रम प्रतिबंधों का उल्लंघन है. इसके पहले इस संस्थान से कम से कम 30 कोरियाई वैज्ञानिकों को प्रशिक्षण दिया जा चुका था जो कि प्योंगयांग के एटमी और बैलेस्टिक मिसाइल कार्यक्रम के विकास में शायद मददगार साबित हुआ होगा. संयुक्त राष्ट्रसंघ के अधिकारी इस बात को लेकर बहुत ज्यादा चिंतित थे कि प्रशिक्षण-कार्यक्रम के तहत सेटेलाइट कम्युकेशन ट्रेनिंग तथा लॉन्च ह्वीकल की टेस्टिंग से संबंधी जानकारियां उत्तर कोरिया के वैज्ञानिकों को दी गईं.'

ये सारी बातें अब रुक गई हैं. संयुक्त राष्ट्रसंघ ने कुछ नए प्रतिबंध लगाए हैं और भारत ने वादा किया है कि वह इन  प्रतिबंधों का ठीक-ठीक अर्थों में पालन करेगा. इस कारण भारत और उत्तर कोरिया के बीच किसी किस्म का सैन्य, तकनीकी, वैज्ञानिक या आर्थिक लेन-देन रुक गया है. इस महीने जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे के भारत दौरे के क्रम में इन प्रतिबंधों को लेकर भारत ने नए सिरे से अपनी प्रतिबद्धता जाहिर की. भारत और जापान के 13 वें शिखर सम्मेलन के बाद जारी संयुक्त बयान में उत्तर कोरिया को लेकर पिछले साल की तुलना में ज्यादा सख्त लफ्जों का व्यवहार किया गया है.

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पिछले साल के बयान में कहा गया 'दोनों प्रधानमंत्री यूरेनियम जुटाने और एटमी हथियार तथा बैलेस्टिक मिसाइल बनाने के उत्तर कोरिया के निरंतर जारी प्रयासों की हरसंभव सख्त लफ्जों में निंदा करते हैं और जोर देकर कहना चाहते हैं कि उत्तर कोरिया ऐसे उकसावों से बाज आए, अपने अंतरराष्ट्रीय दायित्व और वादों को पूरा करे, संयुक्त राष्ट्र संघ के सुरक्षा परिषद् के प्रस्तावों के दायरे में रहे और कोरियाई प्रायद्वीप को एटमी हथियारों से मुक्त करने के प्रयास करे. दोनों प्रधानमंत्रियों ने इलाके के लिए खतरा बन रहे एटमी हथियारों के प्रसार के विरुद्ध आपसी सहयोग करने की बात दोहराई. दोनों ने उत्तर कोरिया से यह भी कहा कि अगवा नागरिकों के मसले का वह फौरी तौर पर समाधान करे.'

इस साल के संयुक्त बयान (अनुच्छेद 53) में कई ज्यादा सख्त लफ्जों का व्यवहार किया गया है और पहले की तुलना में बात ज्यादा व्यापक दायरे में कही गई है. संयुक्त वक्तव्य में '29 अगस्त 2017 के दिन जापानी इलाके के ऊपर से बैलेस्टिक मिसाइल दागने' की घटना का जिक्र है और इसे 'अंतरराष्ट्रीय शांति, स्थिरता तथा वैश्विक स्तर पर होने वाले निरस्त्रीकरण के प्रयासों के प्रति गंभीर और वास्तविक खतरा' करार दिया गया है. अंतरराष्ट्रीय समुदाय(खासकर चीन) से कहा गया है कि उत्तर कोरिया पर दबाव बढ़ाने के लिए वह संयुक्त राष्ट्रसंघ के सुरक्षा परिषद के संबंधित प्रस्तावों पर पूरी तरह और कड़ाई से अमल करें.

भारत एक जवाबदेह एटमी ताकत के रुप में सामने आना चाहता है इसलिए परमाणु-निरस्त्रीकरण पर भारत का पक्ष जग-जाहिर है. लेकिन भारत ने इस मामले में अगर अमेरिकी नीति के प्रति कहीं ज्यादा झुकाव दिखाया है तो उसकी वजह खुद उत्तर कोरिया है. भारत को भय है कि एक निरंकुश राष्ट्र के रूप में उत्तर कोरिया और पाकिस्तान चीन के संरक्षण में एक-दूसरे के ज्यादा नजदीक ना आ जाएं (उत्तर कोरिया के एटमी हथियारों के निर्माण में पाकिस्तान मददगार रहा है, इस बात के दस्तावेजी प्रमाण हैं). भारत को यह भी आशंका है कि पाकिस्तान उत्तर कोरिया से अपने बैलेस्टिक मिसाइल कार्यक्रम के लिए मदद हासिल कर सकता है.

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पाकिस्तान के हाथ लग सकता है बैलेस्टिक मिसाइल की तकनीक

पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने अपने संस्मरण में लिखा है कि उत्तर कोरिया को ढेर सारी रकम देकर पाकिस्तान ने उसके ‘नोदोंग’ को अपना ‘घौरी’ बनाकर पेश किया. फिलहाल पाकिस्तान अमेरिका से दूर जा रहा है. उसका झुकाव रूस, चीन और उत्तर कोरिया के मेल से बनने वाली धुरी की तरफ हो रहा है. ऐसे में शायद ही कोई नीति-निर्माता हो जो इस आशंका से इनकार करे कि उत्तर कोरिया के अंतर्महाद्वीपीय बैलेस्टिक मिसाइल की तकनीक पाकिस्तान के हाथ लग सकती है.

प्योंगयांग से दूर हटने और अमेरिकी के ज्यादा करीब आने से भारत को आर्थिक और राजनयिक फायदे होंगे. अगर वॉशिंगटन से तालमेल ज्यादा बेहतर होता है तो डोनाल्ड ट्रंप पाकिस्तान के खिलाफ भारत की ज्यादा मदद कर सकते हैं. आर्थिक रूप से देखें तो दक्षिण कोरिया भारत में निवेश बढ़ाने की बात कह ही चुका है. मिसाल के लिए केया मोटर्स ने आंध्रप्रदेश कार-प्लांट लगाने का एलान किया है.

उत्तर कोरिया के खिलाफ भारत की नीति में बदलाव एक बड़े रणनीतिक जरूरत की मांग है. अमेरिका-जापान-दक्षिण कोरिया की तरफ भारत का झुकाव पहले की तुलना में ज्यादा होता है तो यह आगे चलकर भारत के फायदे में साबित होगा. साथ ही युद्ध पर उतारू एक राष्ट्र को समर्थन देना और यह उम्मीद पालना की दुनिया ऐसे एक दूसरे राष्ट्र (पाकिस्तान) की निन्दा करेगी, अपने आप में अनैतिक है. मोदी सरकार को यह बात ध्यान में रखनी होगी.

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