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Independence Day 2018: 15 अगस्त को आजाद होने के बावजूद भारत के पास क्यों नहीं था राष्ट्रगान?

अगर राष्ट्रगान आजादी के पहले ही बना लिया गया था तो 15 अगस्त 1947 को ही इसे राष्ट्रगान के तौर पर मान्यता क्यों नहीं दी गई?

Updated On: Aug 15, 2018 07:28 PM IST

Aditi Sharma

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Independence Day 2018: 15 अगस्त को आजाद होने के बावजूद भारत के पास क्यों नहीं था राष्ट्रगान?

आज पूरा देश आजादी के जश्न में डूबा हुआ है. देश 15 अगस्त को अपना 72वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है. 15 अगस्त 1947 में देश को आजादी मिली जिसके बाद से हर साल दिल्ली के लाल किले पर झंडा फहराकर स्वंतंत्रता दिवस मनाया जाता है. देश के प्रधानमंत्री लाल किले पर झंडा फहराते हैं, जिसके बाद राष्ट्रगान गाया जाता है. इस राष्ट्रगान का भी अपना ही एक इतिहास है. रविंद्रनाथ टैगोर देश का राष्ट्रगान ‘जन गण मन' 1911 में ही लिख चुके थे. लेकिन इसे राष्ट्रगान के तौर पर 1950 में मान्यता मिली. क्या कभी सोचा है ऐसा क्यों हुआ? अगर राष्ट्रगान आजादी के पहले ही बना लिया गया था तो 15 अगस्त 1947 को ही इसे राष्ट्रगान के तौर पर मान्यता क्यों नहीं दी गई? इसके पीछे भी एक दिलचस्प कहानी है जो आज हम आपको बताएंगे.

दरअसल आजादी की जंग में केवल रविंद्रनाथ टैगोर का लिखा 'जन गण मन' ही लोकप्रिय नहीं हुआ था, बल्कि इसके साथ और भी दो गीत काफी लोकप्रिय हुए थे. ये थे ‘वंदे मातरम’ यानी हमारा राष्ट्रगीत और ‘सारे जहां से अच्छा’. इन गीतों ने देश में स्वतंत्रता संग्राम के दौरान लोगों में एक नई जान भरने का काम किया था, जिसका असर 1947 को पूरी दुनिया ने देखा.

लोगों के दिलों में एक खास जगह बना चुका था 'वंदे मातरम'

'वंदे मातरम', 'जन गण मन' से काफी साल पहले ही लिखा जा चुका था. अंग्रेजों के शासन में अधिकारी के तौर पर काम करने वाले बंकिम चंद्र चटर्जी ने 1875 में इसे लिखा था. इसे लिखे जाने के पीछे भी एक बड़ा कारण था. 1870 में अंग्रजों ने आधिकारिक समारोह के दौरान ‘गॉड सेव द क्वीन’ गाना अनिवार्य कर दिया था.

Independence Day

बंकिम चंद्र चटर्जी को अंग्रेजों के इस फैसले से काफी ठेस पहुंची और उन्होंने अग्रेजों के फैसले के विरुद्ध एक और विकल्प के तौर पर एक गीत लिखा. ये गीत बांगला और संस्कृत भाषा को मिलाकर लिखा गया था, जिसका शीर्षक 'वंदे मातरम' रखा गया. इस गीत का प्रकाशन 1882 में बंकिमचंद्र के उपन्यास आनंद मठ में अंतर्निहित गीत के रूप में हुआ था. इस उपन्यास में यह गीत भवानंद नाम के संन्यासी द्वारा गाया गया है. इसकी धुन यदुनाथ भट्टाचार्य ने बनाई थी.

बंगाल में चले आजादी के आंदोलन में विभिन्न रैलियों में जोश भरने के लिए यह गीत गाया जाने लगा. धीरे-धीरे यह गीत लोगों में लोकप्रिय हो गया. चाहे वो अंग्रेजों की गोली का शिकार बनकर दम तोड़ने वाली आजादी की दीवानी मातंगिनी हजारा हों या मैडम भिकाजी कामा या फिर फांसी पर चढ़ कर देश के लिए शहीद होने वाले भगत सिंह और उनके साथी ही क्यों न हों, वंदेमातरम हर एक की जबान पर था.

क्यों होने लगे इस गीत को लेकर विवाद?

एक वक्त ऐसा भी आया जब ब्रिटिश हुकूमत वंदे मातरम की लोकप्रियता से डरने लगी और उसने इस पर प्रतिबंध लगाने पर विचार करना शुरू कर दिया. लेकिन तब तक ये गीत हर एक क्रांतिकारी के जेहन में बस गया था और लगातार उनमें लड़ाई लड़ने के लिए एक नया जोश भर रहा था. लेकिन बात सिर्फ यहीं खत्म नहीं हुई. 1923 के बाद से इस गीत में मूर्ति पूजा को लेकर विवाद उठने लगे. कई मुस्लिम संगठनों ने आपत्ति उठाई कि ये गीत केवल एक विशेष धर्म के हिसाब से बनाया गया है और हिंदू राष्ट्रवाद को प्रदर्शित करता है. ये सवाल उस समय मुस्लिम संगठनों के साथ-साथ सिख, जैन, ईसाई और बौध संगठनों ने भी उठाए.

बाद में कलकत्ता में कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने 1937 में इसका हल ये निकाला कि इस गीत के शुरुआत के केवल दो अंतरे ही गाए जाएंगे जिनमें कोई भी हिंदू वादी तत्व नहीं रहेगा. लेकिन मुस्लिम संगठन इस हल से भी संतुष्ट नहीं थे. वो चाहते थे कि इस पूरे गीत को ही हटा दिया जाए. ऐसे में गीत सबसे ज्यादा लोकप्रिय होने के बावजूद राष्ट्रगान की जगह हासिल नहीं कर सका.

71st Independence Day

'सारे जहां से अच्छा' गीत का भी था खास योगदान

दूसरी तरफ इकबाल का लिखा ‘सारे जहां से अच्छा’ भी भारत को आजाद कराने की लड़ाई में काफी ज्यादा लोकप्रिय हुआ. लेकिन इसके बावजूद ये गीत राष्ट्रगान बनने की रेस से बाहर हो गया. वजह थी इसके रचयता इकबाल का पाकिस्तान की मांग उठाना. इस गीत ने काफी हद तक पाकिस्तान की मांग को लेकर हो रहे आंदोलन को भी बढ़ावा दिया. ये बात और है कि आजादी के 72 साल बाद भी ये गाना आज बच्चे-बच्चे की जुबान पर है.

बात करें 'जन गण मन' की तो ये कविता पांच पदों में थी और संस्कृत और बांगला भाषा को मिलाकर लिखी गई थी. 27 दिसंबर 1911 को इस गीत को पहली बार गाया गया था. उस समय इस गीत को लेकर भी एक जिक्र होता था कि ये गीत जॉर्ज पंचम के स्वागत के लिए लिखा गया है. लेकिन ये बात रविंद्रनाथ टैगोर ने खुद 1939 में एक खत के जरिए खारिज कर दी.

कैसे हुआ राष्ट्रगान का चुनाव?

फिर आया वो समय जब देश को आजादी मिली. उस समय राष्ट्रगान के चुनाव के लिए 'जन गण मन' और 'वंदे मातरम' के बीच वोटिंग कराई गई. तमाम विवादों के बावजूद उस समय सबसे ज्यादा वोट 'वंदे मातरम' को ही मिले. लेकिन विविधता में एकता वाले राष्ट्र के लिए एक ऐसे राष्ट्रगान की जरूरत थी जो पूरे देश का प्रतीक बने. और जिसे लेकर किसी के मन में कोई शंका न हो. इसलिए सबसे ज्यादा वोट मिलने के बावजूद 'वंदे मातरम' को राष्ट्रगान नहीं बनाया गया.

इसी के चलते जब देश आजाद हुआ तो उसके पास अपना कोई राष्ट्रगान नहीं था. 1950 में जब संविधान बनाया गया तो उसमें 'जन गण मन' को राष्ट्रगान के तौर पर मान्यता दी गई. हालांकि तब 'वंदे मातरम' की लोकप्रियता को भी देखते हुए इसके पहले 2 अतंरों को राष्ट्रगीत के तौर पर मान्यता दे दी गई.

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