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यहां हर चीख की कीमत लाखों में होती है...

उत्तराखंड के जंगलों में सफेदपोश वन अधिकारियों और तस्करों की मिलीभगत से बाघ और वन्य जीवन लुप्त होते जा रहे हैं

Nazim Naqvi Updated On: Jul 05, 2017 07:51 PM IST

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यहां हर चीख की कीमत लाखों में होती है...

हो सकता है कि देहरादून, हरिद्वार, अल्मोड़ा, हल्द्वानी जैसे शहरों से गुजरते हुए आपको सामान्य जीवन और प्राकृतिक सौंदर्य के बीच वो कोलाहल न सुनाई देता हो जो सड़क से 100-150 मीटर अंदर, घने पेड़ों के पीछे गूंज रहा है.

वन्य जीवन पर लाखों-करोड़ों फूंकने वाली सरकार का सारा ताम झाम, सुरक्षा का बंदोबस्त बस वहीँ तक नजर आता है जहां तक आपकी नजरें ऊंचे-ऊंचे पेड़ों की हरियाली से टकराकर लौट आती है. उसके बाद की दुनिया में झांकने की इजाजत किसी को भी नहीं है.

हालांकि उत्तराखंड में तस्करों का अपना जलवा है लेकिन बाघों की आबादी वाले इलाकों में बसी तस्करों की दुनिया, वो दुनिया है जिसके सफेदपोश गुलाम आपको उन बैठकों में जरूर मिल जाएंगे जिनका विषय ‘वन्य जीवन और उनपर बढ़ते खतरे’ होता है. लेकिन ‘मुख्य वन्य जीव वार्डन’ डीवीएस खाटी के मुताबिक सब कुछ सामान्य है. हालांकि जबसे वर्तमान मुख्य वन्य जीव वार्डन, खाटी इस पद पर आये हैं, तब से बाघों के लुप्त होने की वारदातें कुछ ज्यादा ही बढ़ गई हैं.

ऐसा नहीं है कि इस संबंध में वर्तमान सरकार ने बढ़ते अपराधों को देखते हुए, वर्तमान वार्डन की लापरवाहियों के खिलाफ 18 अप्रैल, 2017 को एक जांच समिति का गठन जरूर कर दिया. लेकिन करीब ढाई महीने गुजर जाने के बावजूद इस संवेदनशील मुद्दे पर कोई प्रगति नहीं हो पाई है.

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उत्तराखंड में जंगलों से घिरा एक पहाड़ी गांव (फोटो: फेसबुक से साभार)

जांच आयोग का मतलब, मुद्दे को ठंडे बस्ते में डाल देना

देहरादून के एक पत्रकार को तो जरा भी यकीन नहीं है कि इसमें कोई प्रगति होगी. उन्होंने कहा, 'इस राज्य में जांच समिति या जांच आयोग बिठाने का सीधा मतलब होता है, मुद्दे को ठंडे बस्ते में डाल देना. आप एक आरटीआई डाल कर पूछिए कि पिछले 17 वर्षों में जो जांच आयोग या समितियां बनी हैं उनका क्या हुआ? जवाब देखकर आप हैरान रह जाएंगे.'

ऑपरेशन ऑय ऑफ द टाइगर- इंडिया के प्रमुख राजीव मेहता तो बड़ा बुनियादी सवाल उठाते हैं, 'जिसके खिलाफ जांच बैठाई गई है उनमें वर्तमान प्रमुख वन संरक्षक वन्य जीव/प्रमुख वन्य जीव प्रतिपालक, वर्तमान सीइओ (निदेशक कॉर्बेट टाइगर रिजर्व) अपने पदों पर आसीन हैं, ऐसे में कैसे कोई जांच हो सकती है. मुझे ये सारी कवायद एक भद्दे मजाक से ज्यादा और कुछ नहीं लगती.'

बहरहाल सच्चाई ये है कि वर्तमान प्रमुख वार्डन के कार्यकाल में लगभग 55 बाघ की खाल पकड़ी जा चुकी हैं. जैसा कि उत्तराखंड की वर्तमान सरकार के संज्ञान में भी लाया गया है, हैरत होती है कि जब मार्च, 2016 में 5 बाघों के शिकार में अभियुक्त रामचंद्र को गिरफ्तार किया गया था. और वन्य-जीवन संस्थान के परीक्षण के बाद 5 में से 4 खालें कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के बाघों की निकलीं थीं फिर भी प्रशासन ने 2016 में, बाघों की सघन छानबीन (इंटेंसिव मॉनिटरिंग) नहीं कराई, क्यों?

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जांच पड़ताल को रोका जाए तो क्या इशारा निकलता है

राजीव मेहता इसका जवाब देते हुए कहते हैं कि 'यह इसलिए नहीं हुआ ताकि ये न पता चल सके कि क्षेत्र में अत्यधिक संख्या में हुए बाघों का शिकार, कहीं प्रकाश में न आ जाए. इतनी बड़ी तादाद में बाघों का शिकार हो जाए और उसकी कोई जांच पड़ताल न हो, बल्कि उस जांच पड़ताल को प्रमुख वार्डन द्वारा रोका जाए तो इससे क्या इशारा निकलता है.'

सवाल तो कई हैं लेकिन सबसे अहम सवाल ये कि वर्तमान सरकार ‘प्रमुख वार्डन’ को क्यों बचा रही है. उनके पद पर रहते हुए, आखिर कैसे उनके खिलाफ कोई जांच निष्पक्ष तरीके से हो सकती है. हालांकि इसके लिए हल्द्वानी और हरिद्वार के कुछ समाजसेवी, अदालत का दरवाज़ा खटखटाने की तैयारी कर रहे हैं. लेकिन संदेह के घेरे में खुद वर्तमान सरकार है, हो सकता है कि खाटी को बचाने में उनका फायदा हो?

इस बीच एक सुझाव, राष्ट्रीय वाइल्ड लाइफ क्राइम ब्यूरो की तर्ज पर ‘राज्य वाइल्ड लाइफ क्राइम ब्यूरो’ बनाने की भी है. इस मांग में एक तर्क भी नजर आता है क्योंकि राज्य वन विभाग का अपना निगरानी प्रशासन होते हुए भी, अभी तक, ज्यादातर तस्करी मामले हमेशा पुलिस प्रशासन द्वारा ही पकड़े गए हैं. ऐसे में उनकी सेवाओं का औचित्य ही क्या है.

हां, अगर कोई ऐसा वन अपराध नियंत्रण ब्यूरो खोलकर उसे शक्तिया दी जाएं, तो वह ज्यादा असरदार साबित हो सकता है. लेकिन हजारों करोड़ की वन्य जीव तस्करी से मालामाल हो रहे प्रशासनिक और वन विभाग के अधिकारी, राजनेता कब ऐसा कोई कदम उठाएंगे, इस प्रश्न का जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं है.

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घने जंगलों से घिरे जिम कॉर्बेट पार्क का एक नजारा (फोटो: फेसबुक से साभार)

बात बढ़ने पर जांच आयोग बिठा दिया जाता है

जब तक इसका कोई जवाब नहीं मिल जाता है तब तक, जंगलों की खामोशी को चीरकर गूंजती, घबराए हुए बाघों की हर आवाज के साथ लाखों का वारा न्यारा होता है. ऐसी हर आवाज पर एक हाथ के मुस्कुराते हुए गांधी जी, दूसरे के हाथ में मुस्कुराने लगते हैं. इस बीच, अगर पानी सिर से ऊंचा हो जाता है तो एक जांच आयोग बिठा दिया जाता है.

सड़क से दूर, जंगलों के अंदर स्थापित राक्षसी तानाशाही और सड़कों के किनारे-किनारे बसे देवभूमि के बीच, जो अंतर है, वो शाश्वत है. सुरक्षा के नाम पर बाघों कि निर्मम हत्या का सिलसिला जारी है.

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