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राजस्थान: चुरू में ग्लोबल कंपनी ने दवा ट्रायल के लिए गांव वालों को बनाया बलि का बकरा

ग्लेनमार्क फार्मास्यूटिकल लिमिटेड नाम की दवा कंपनी ने गांव में रहने वाले लोगों पर दवाई का ट्रायल किया, प्रयोग के लिए लोगों से स्वीकृति नहीं ली गई थी

FP Staff Updated On: Apr 25, 2018 10:26 PM IST

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राजस्थान: चुरू में ग्लोबल कंपनी ने दवा ट्रायल के लिए गांव वालों को बनाया बलि का बकरा

राजस्थान के एक प्राइवेट अस्पताल ने एक कंपनी द्वारा बनाई जा रही दवा का दर्जन भर से ज्यादा लोगों पर एक्सपेरिमेंट किया गया. अप्रैल में हमने दिगरिया गांव के करीब 12 लोगों से मुलाकात की, जिनको ऐसी दवा दी गई थी जो कि नुकसानदायक थी. उनमें से तीन लोगों ने बाकी लोगों की खराब हालत देखकर दवा लेने से मना कर दिया. वहीं जिन लोगों को दवाएं दी गईं, उनमें कुछ लोगों को सुस्ती, पेट दर्द व सिर दर्द जैसी शिकायतें शुरू हो गईं.

गांव में कुछ और लोगों को भी इस ट्रायल के लिए मनाने की कोशिश की गई, लेकिन उन्होंने मना कर दिया. राजस्थान के कुछ और गांवों से भी लोगों को इस क्लीनिकल ट्रायल के लिए राजी किया गया था, लेकिन उन लोगों ने बातचीत में अपनी पहचान जाहिर किए जाने से मना कर दिया.

दिगरिया गांव के जिन लोगों पर ट्रायल किया गया, उन्होंने बताया कि-

1. सेहत के लिए खतरनाक साबिक हो सकने वाली यह दवा देने के पहले उन लोगों से कोई मंजूरी नहीं ली गई थी.

2. इनमें से किसी को भी नहीं पता था कि जो दवाएं उन्हें दी जा रही हैं वो अभी तक बाज़ार में नहीं आई हैं.

3. उनमें से किसी को भी संभावित साइडइफेक्ट के बारे में भी नहीं बताया गया था और उनमें से काफी लोगों को अभी भी सिर-दर्द, बदहजमी, कमजोरी जैसी समस्याएं हैं.

4. काफी मामलों में उन्हें बताया गया था कि जो दवाएं उन्हें दी जा रही हैं वो बदहजमी को ठीक करने के लिए हैं.

उनमें से एक व्यक्ति ने बताया कि उसने दवा का नाम लिख लिया था. इस दवा का नाम 'क्वेटियापाइन' था. यह एक एंटी-साइकोटिक दवा है, जो कि स्किजोफ्रीनिया जैसी मानसिक बीमारियों को ठीक करने के लिए दिया जाता है. डॉक्टरों ने बताया कि पेट दर्द के अलावा सुस्ती, सिर-दर्द जैसे लक्षण एंटी-साइकोटिक दवा के ही हैं.

दवा बनाने वाली कंपनी खुद कर रही जांच

दवा बनाने वाली कंपनी ग्लेनमार्क फार्मास्यूटिकल लिमिटेड ने इस बात से मना किया कि किसी को भी ट्रायल के लिए क्वेटियापाइन दवा दी गई है. कंपनी के एक प्रतिनिध का कहना है कि हम लोग ऑस्टियोऑर्थराइटिस के ट्रायल के लिए दवाएं दे रहे थे. उन्होंने कहा कि कंपनी को अस्पताल के रिकॉर्ड में कुछ अनियमितता मिली है, इसलिए इस मामले में हम लोग खुद अपनी जांच कर रहे हैं.

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एक आधिकारिक बयान में ग्लेनमार्क ने इस संभावना से इनकार नहीं किया कि मालपाणी अस्पताल, जिसे ये ट्रायल का काम सौंपा गया था, उसने लोगों की मंजूरी लिए बिना ही उन पर दवाओं का परीक्षण किया गया.

जब मालपाणी अस्पताल से संपर्क किया गया तो उन्होंने ये बात तो मानी कि लोगों को क्लिनिकल ट्रायल के लिए अस्पताल लाया गया था, लेकिन उन्होंने कहा कि किसी को भी दवा नहीं दी गई.

पैसे और खाने का लालच देकर लाए गए थे लोग

हालांकि जिन लोगों के ऊपर ये क्लिनिकल ट्रायल किए गए, उन्होंने बताया कि उन लोगों यह कहकर लाया गया था कि एक मेडिकल कैंप में कुछ दिनों की नौकरी दी जाएगी, जहां डॉक्टर और नर्सों की उन्हें मदद करनी होगी.

इन 12 लोगों ने बताया कि दिगरिया गांव के लोगों को 500 रुपए प्रतिमाह और भरतपुर के लोगों को 1000 रुपए प्रतिमाह के साथ खाना और शराब का लालच देकर यहां लाया गया था.

सरकार ने जांच के लिए तीन लोगों को पैनल को गठित किया है

मामले में कई जांच शुरू कर दी गई है. राज्य सरकार जांच के लिए तीन लोगों का पैनल गठित कर दिया है, इसके अलावा सेंट्रल ड्रग स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइज़ेशन (सीडीएससीओ) द्वारा भी इस मामले में जांच कर रही है.

हालांकि अभी तक दोनों जांच एजेंसियों ने अपनी रिपोर्ट दाखिल नहीं की है, लेकिन पहचान ज़ाहिर न करने की शर्त पर सीडीएससीओ के सूत्रों ने बताया कि अस्पताल के रिकॉर्ड में जितनी GRC 27864 दवा दर्ज थी और जितनी दी गई थी उसमें असमानता थी. ग्लेनमार्क का कहना है कि उन्होंने अस्पताल को 36 टेबलेट दिए जबकि अस्पताल के रिकॉर्ड में सिर्फ 33 टेबलेट मिली. व्यक्तिगत स्तर पर अस्पताल के अधिकारियों ने स्वीकार किया कि वास्तव में तीन लोगों को ये दवाएं दी गई थीं.

राजस्थान के स्वास्थ्य मंत्री कालीचरण सराफ ने कहा कि ये काफी गंभीर मामला है और जो भी दोषी है उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी.

भारत में क्लिनिकल ट्रायल के लिए आखिर क्या हैं नियम-

इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च ने इस मामले में 12 गाइडलाइंस तय किए है, जिसमें दूसरी गाइडलाइन साफतौर पर कहती है कि क्लिनिकल ट्रायल बिना व्यक्ति की स्वीकृति के नहीं होना चाहिए और उसकी स्वीकृति पूरे होशो हवास में व सोची समझी होनी चाहिए.

स्वीकृति का अर्थ है कि जिसके ऊपर क्लिनिकल ट्रायल किया जा रहा है उसे ये बताया जाना चाहिए कि रिसर्च किसलिए किया जा रहा और इसके साइड-इफेक्ट क्या हो सकते हैं? इसके अलावा जिस व्यक्ति पर प्रयोग किया जा रहा है वो कभी भी इस ट्रायल से अपने को अलग कर सकता है.

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

दूसरी गाइडलाइंस यह भी कहती है कि ट्रायल योग्य डॉक्टर द्वारा ही किया जाना चाहिए. ये गाइडलाइंस पूरे भारत में सभी क्लिनिकल ट्रायल के लिए लागू होती हैं.

क्या कहना है गांव वालों का?

जिनको GRC 27864 दवा दी गई थी उनसे मिलने के लिए न्यूज़ 18 ने चुरू जिले का रुख किया. चुरू के दिगारिया गांव के 12 लोगों पर ये ट्रायल किया गया था. सावरमल मेघवाल नाम के व्यक्ति ने जिसको ये दवा दी गई थी उसने बताया कि दवा दिए जाने के बाद से ही उसे सिर-दर्द व शरीर दर्द की शिकायत हो रही है. वो दिहाड़ी मजदूर है जो रोज के 300 रुपए कमाता है.

गांव के ही एक और आदमी शेर सिंह ने 17 अप्रैल की रात में जयपुर में दस दिन के लिए लगने वाले एक मेडिकल कैंप के बारे में बताया. उसने कहा कि कैंप में हमें 500 रुपए रोजाना के हिसाब से दिए जाएंगे और हमारे रहने व खाने का भी इंतजाम होगा. इसके लिए हमें डॉक्टर व नर्स की सहायता करनी होगी.

11 और लोगों के साथ मेघवाल अगले दिन जयपुर चला गया जहां उसे मालपाणी अस्पताल के एक बेसमेंट में रखा गया. बेसमेंट के गेट पर लाल रंगों से क्लिनिकल ट्रायल लिखा हुआ था.

उन्हीं में से एक आदमी मूलाराम मेघवाल ने बताया कि उस दिन हमें दोपहर व रात के खाने के अलावा शराब भी दी गई. किसी ने भी हमसे उस दिन काम करने को नहीं कहा. हम लोगों को दो बार खाना दिया गया और शराब दी गई.

अस्पताल और इन लोगों के बीच मध्यस्थ का काम कर रहे भूर सिंह ने 19 अप्रैल को दिन के 2 बजे गांव वालों से एक-एक टेबलेट खाने को कहा.

दिगरिया गांव के ही एक और व्यक्ति ने कहा कि भूर सिंह ने हम लोगों से कहा कि तुम लोगों को इस तरह के तीन टेबलेट दिए जाएंगे और तीसरा टेबलेट खाने के बाद तेरह दिनों तक यहां से जाने नहीं दिया जाएगा.

जिन गांव वालों ने वह दवा खाई उन्हें सिर-दर्द, पेट दर्द और सुस्ती की शिकायत होने लगी. हालांकि कुछ लोगों ने वो दवा खाने से मना कर दिया.

जिन लोगों ने टेबलेट खाई वो दोपहर से रात तक सोते रहे

दिगरिया गांव के ही निवासी लच्छूराम ने बताया कि उस दिन हम लोग अस्पताल के बाहर थाड़ी देर तक टहलने के लिए गए थे. जब हम वापस लौटे तो हम लोगों ने देखा हमारे साथ के कुछ लोग नशे जैसी हालत में हैं. भूर सिंह ने हम लोगों से भी वो टेबलेट खाने को कहा लेकिन हमने मना कर दिया. जिन लोगों ने वो टेबलेट खाई वो उस दिन पूरी दोपहर और पूरी रात सोते रहे.

5. Regenerative Medicine

उनमें से किसी को इस बात की भनक भी नहीं थी कि उन्हें कौन सी दवा दी जा रही है. लेकिन सोनू मेघवाल को थोड़ी बहुत अंग्रेज़ी पढ़नी आती थी इसलिए उसने दवा का नाम पढ़ लिया.

सोनू ने बताया कि वो लोग दवा के पत्ते से एक-एक टेबलेट निकाल कर हम लोगों को दवा दे रहे थे. मैं लाइन में अंतिम से दूसरा था इसलिए उन्होंने मुझे पूरा का पूरा दवा का पत्ता पकड़ा दिया और कहा कि एक खुद खा लो और एक साथ वाले को दे दो. जब उन्होंने मेर हाथ में दवा का पत्ता दिया तो मैने दवा का नाम पढ़ लिया.

कैसे खुला राज

लच्छूराम उन तीन लोगों में से था जिन लोगों ने दवा खाने से इंकार कर दिया था. इसलिए वो अपने पूरे होशो हवास में था. लिच्छूराम भागकर गांव आ गया और गांव के कुछ और लोगों को अस्पताल लेकर गया ताकि वहां फंसे लोगों को छुड़ाया जा सके. उसने दवा के पत्ते की फोटो खींच ली थी. बाद में उसने जयपुर के स्थानीय डॉक्टर को वो फोटो दिखाई ताकि पता लग सके कि उसके साथी क्यों बीमार पड़ गए थे.

एक डॉक्टर ने नाम न ज़ाहिर किए जाने की शर्त पर बताया कि गांव के लोग क्वेटियापाइन का रैपर लेकर आए. ये दवा सीज़ोफ्रीनिया, बाईपोलर डिसऑर्डर व डिप्रेशन जैसे रोगों को ठीक करने के लिए दी जाती है. ये एक तरह की एंटी-साइकोटिक दवा है.

ट्रायल के लिए नहीं ली गई थी स्वीकृति

मालपाणी अस्पताल के डायरेक्टर एनके मालपाणी ने यह बात स्वीकर की कि इस ट्रायल के लिए गांव वालों की स्वीकृति नहीं ली गई थी. उन्होंने कहा कि हमारे लोगों ने गांव वालों को इस ट्रायल के बारे में नहीं बताया था. गांव वाले यहां पैसे के लिए आए थे. हालांकि हमारे पास क्लिनिकल ट्रायल का लाइसेंस हैं और हम लोग उस दिन ऑस्टियोऑर्थराइटिस के लिए ट्रायल कर रहे थे. वो दवा ग्लेनमार्क कंपनी से दी गई थी.

सीडीएससीओ के अधिकारियों ने को बताया कि पूछताछ के दौरान ये बात सामने आई है कि ग्लेनमार्क फार्मास्यूटिकल लिमिटेड कंपनी द्वारा दी गई ये दवा तीन लोगों को दी गई थी.

जयपुर का मालपाणी अस्पताल उन कुछ अस्पतालों में से एक है जहां पर मॉडरेट ऑस्टियोऑर्थराइटिस के लिए ग्लेनमार्क मॉलीक्यूल GRC 27864 का ट्रायल किया जा रहा है. ग्लेनमार्क के प्रवक्ता ने बताया कि मालपाणी अस्पताल ने इसके लिए सिर्फ तीन आदमियों को चुना था.

हालांकि सीडीएससीओ का कहना है कि जिन तीन आदमियों का नाम मालपाणी अस्पताल द्वारा बताया जा रहा है कि जिनके ऊपर ट्रायल किया गया था उन लोगों ने इस बात से साफ इनकार कर दिया. अधिकारियों ने कहा कि हम लोगों मामले की जांच के लिए खुद उनके पास गए. उन्होंने बताया कि हम लोग कभी अस्पताल गए ही नहीं. इसलिए इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि कुछ गलत नामों को अस्पताल के रिकॉर्ड में रखा गया हो.

स्वास्थ्य मंत्री ने दिया कड़ी कार्रवाई का भरोसा

राजस्थान के स्वास्थ्य मंत्री द्वारा कड़ी कार्रवाई का आश्वासन दिए जाने के बावजूद अभी तक इस मामले में एफआईआर तक नहीं दर्ज हुई है. गांव वालों द्वारा शिकायत किए जाने पर भी पुलिस ने एफआईआर दर्ज करने से मना कर दिया.

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बीदासर के सर्किल इंस्पेक्टर प्रहलाद राय ने कहा कि इस मामले की एफआईआर सिर्फ जयपुर में ही रजिस्टर की जा सकती है क्योंकि घटना वहीं घटित हुई है. यहां हम इसलिए भी एफआईआर नही दर्ज कर सकते क्योंकि इसमें कई गांवो के लोग शामिल हैं.

जब चुरू के एसपी व जिलाधिकारी से इस मामले में संपर्क किया गया तो उन्होंने सर्किल इंस्पेक्टर से अपनी सहमति जताई. चुरू के एमएलए खेमाराम मेघवाल ने कहा कि मुझे मामले की जानकारी नहीं है मैं पिछले हफ्ते काफी व्यस्त था इसलिए अखबार पढ़ने का मौका नहीं मिला.

यह कंपनी सालों से भारत सहित विश्व में कर रही क्लिनिकल ट्रायल

ग्लेनमार्क भारत सहित पूरे विश्व में कई सालों से क्लिनिकल ट्रायल कर रहा है. रोगियों की सुरक्षा और रेग्युलेटरी नियमों का पालन करना हमारी प्राथमिकता में है. औसत दर्जे के ऑस्टियोऑर्थराइटिस से पीड़ित रोगियों के इलाज के लिए ग्लेनमार्क मॉलीक्यूल GRC 27864 का क्लिनिकल ट्रायल कई जगहों पर चल रहा है. जयपुर का मालपाणी अस्पताल उन में से एक है.

मालपाणी अस्पताल ने अभी तक इस मामले में तीन लोगों का नामांकन किया है जिनके ऊपर किसी तरह के विपरीत प्रभाव पडने की बात नहीं कही गई है. GRC 27864 की दूसरे चरण की स्टडी 23 अलग-अलग जगहों पर शुरू कर दी गई है लेकिन अभी तक प्रोटोकॉल से संबंधित कोई भी मुद्दा हमारे सामने नहीं आया है. मालपाणी अस्पताल में भी ट्रायल के लिए ग्लेनमार्क के पास सारी स्वीकृतियां हैं.

हालांकि मीडिया रिपोर्ट के अनुसार जब अनियमितताओं की जानकारी कंपनी के पास आई तो हमने फैसला किया कि वहां क्लिनिकल ट्रायल को तुरंत रोका जाए और मामले की जांच की जाए. इस मामले में कंपनी जांच अधिकारियों से हर तरह का सहयोग करेगी. एक ज़िम्मेदार संस्थान के रूप में हम कभी भी रोगियों की सुरक्षा के साथ समझौता नहीं करेंगे.

(न्यूज-18 के लिए रौनक कुमार गुंजन की रिपोर्ट)

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