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पाकिस्तान चुनाव: कई मुश्किलों से जूझ रहे हैं अल्पसंख्यक उम्मीदवार

अल्पसंख्यकों की यही मांग है कि पाकिस्तान सरकार कम से कम उन्हें इतनी सुरक्षा जरूर मुहैया कराए कि वे बेधड़क अपना वोट डाल सकें

Updated On: Jul 23, 2018 05:03 PM IST

FP Staff

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पाकिस्तान चुनाव: कई मुश्किलों से जूझ रहे हैं अल्पसंख्यक उम्मीदवार

पाकिस्तान में 25 जुलाई को आम चुनाव है. एक तरफ पूरा देश चुनावी तैयारी में लगा है तो दूसरी ओर यहां के अल्पसंख्यक इस चिंता में हैं कि उनकी बात संसद तक कौन पहुंचाएगा.

पाकिस्तान की आबादी के लिहाज से यहां हिंदू, सिख, ईसाई और अहमदी मुसलमान अल्पसंख्यक हैं. 20 करोड़ की आबादी में मात्र 4 प्रतिशत मजहबी अल्पसंख्यक हैं, जबकि मुसलमानों की कुल आबादी में 15 से 20 फीसदी शिया हैं. इससे भी गंभीर बात यह है कि काफी कम अल्पसंख्यकों और महिलाओं को टिकट मिला है, वह भी आरक्षित सीट के तहत.

अल्पसंख्यकों की दशा यह है कि 342 सीटों वाली नेशनल असेंबली और चार राज्यों की विधानसभा में मुट्ठी भर अल्पसंख्यक निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ रहे हैं. ये उम्मीदवार किसी पार्टी से नहीं जुड़ना चाहते.

टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अल्पसंख्यकों को इस बात की चिंता सताए जा रही है कि उन चरमपंथी संगठनों के जनप्रतिनिधित्व का क्या होगा जिन्होंने नई पार्टी के नाम पर चुनाव में अपने उम्मीदवार उतारे हैं. सुन्नी चरमपंथियों का एक तबका इस चुनाव में काफी सक्रिय है जो पाकिस्तान को शिया मुसलमानों से मुक्ति दिलाने की वकालत कर रहा है.

यहां के अल्पसंख्यकों की यही मांग है कि पाकिस्तान सरकार कम से कम उन्हें इतनी सुरक्षा जरूर मुहैया कराए कि वे बेधड़क अपना वोट डाल सकें.

जैसा कि एक ईसाई निर्दलीय उम्मीदवार शहजादा ने बताया कि वे चुनाव जीतकर अपने समुदाय का कुछ भला करना चाहती हैं जिसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और स्वच्छ पेयजल की समस्याएं अहम हैं.

20 लाख की आबादी के साथ हिंदू पाकिस्तान के दूसरे सबसे बड़े अल्पसंख्यक हैं. इनका रहबर सिंध प्रांत में ज्यादा है जहां सबसे ज्यादा गरीबी है. भारत और पाकिस्तान के बीच तनातनी का खामियाजा इन्हें सबसे ज्यादा भुगतना पड़ता है जब इन्हें बहुसंख्यक कातर निगाहों से देखते हैं.

वीरू कोहली नाम की एक महिला उम्मीदवार यहां से निर्दलीय चुनाव लड़ रही हैं. उनका मानना है कि अगर वे जीत जाती हैं तो पाकिस्तान संसद में हिंदुओं की बात पुरजोरी से उठा सकेंगी.

शियाओं की हालत यह है कि उन्हें संसद में कोई निश्चित भागीदारी नहीं दी गई है जिस कारण वे या तो निर्दलीय लड़ेंगे या अपनी पार्टी बनानी होगी.

यहां अहमदियों ने पाकिस्तान चुनाव का खुलकर विरोध किया है क्योंकि उन्हें पंजीकृत वोटरों की लिस्ट में एक अलग दर्जे में रखा गया है.

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