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पहली बार माओवाद सैन्य अभियान का अगुवा बनेगा बस्तर का आदिवासी नेता मादवी हिडमा

सीपीआई (माओवादी) एक प्रतिबंधित संगठन है और मादवी हिडमा फिलहाल बस्तर में बटालियन-1 का कमांडर है

Updated On: Jan 12, 2019 03:15 PM IST

Debobrat Ghose Debobrat Ghose
चीफ रिपोर्टर, फ़र्स्टपोस्ट

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पहली बार माओवाद सैन्य अभियान का अगुवा बनेगा बस्तर का आदिवासी नेता मादवी हिडमा

माओवादी नेता मादवी हिडमा का नाम सीपीआई (माओवादी) के सैन्य अभियान के मुखिया पद के दावेदारों में सबसे आगे चल रहा है. सीपीआई (माओवादी) एक प्रतिबंधित संगठन है और मादवी हिडमा फिलहाल बस्तर में बटालियन-1 का कमांडर है.

छत्तीसगढ़ में बस्तर के दंडकारण्य वाले इलाके में हिडमा स्थानीय निवासियों और सुरक्षाबलों के लिए एक अबूझ पहेली साबित हुआ है. अगर वह सीपीआई (माओवादी) के केंद्रीय सैन्य कमान (सीएमसी) का मुखिया बनने में कामयाब हो जाता है तो भारत में माओवादियों के इतिहास में शीर्ष नेतृत्व के पद पर पहुंचने वाला वह पहला स्थानीय आदिवासी होगा. अतिवादी रुझान वाले सीपीआई (माओवादी) के सभी शीर्ष पदों पर अभी तक अविभाजित आंध्रप्रदेश यानी अब के तेलंगाना के नक्सल नेताओं का कब्जा चला आ रहा है.

माओवादी अभियानों को तेज करने की कवायद में नए कमांडर की तलाश

सीपीआई (माओवादी) के महासचिव का पद नाम्बला केशव राव उर्फ बासव राजू को दिया गया है. कहा जा रहा है कि मुप्पला लक्ष्मण राव उर्फ गणपति ने महासचिव का पद 2018 में छोड़ दिया था. इसके बाद से ही यह साफ हो चला था कि नया नेतृत्व देश के नक्सल-प्रभावित जिलों में माओवादी अभियान को ज्यादा आक्रामक बनाने की कवायद करेगा और उसका खास जोर माओवादियों के गढ़ बस्तर पर रहेगा.

महासचिव के ओहदे पर काबिज बासव राजू (63वर्ष) माओवादियों के केंद्रीय सैन्य कमान सीएमसी का भी मुखिया है और स्वेच्छा से यह जिम्मेदारी छोड़ना चाहता है. उसे सैन्य-अभियान के पैंतरे चलने और विस्फोटकों, खासकर इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिल डिवाइस के इस्तेमाल में महारत हासिल है. बासव राजू चाहता है कि सीएमसी की अगुवाई कोई ऐसा व्यक्ति संभाले जिसे सैन्य- रणकौशल में महारत हासिल हो और जो खूब आक्रामक हो ताकि पूरे रेड कॉरिडोर (माओवादियों के दबदबे वाले इलाके) में नए जोश के साथ माओवादी कारकूनों का नेतृत्व कर सके.

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सीपीआई (माओवादी) के पोलित ब्यूरो की बैठक में बासव राजू ने कहा कि जो माओवादी नेता उम्रदराज और शरीर से लाचार हो चले हैं उन्हें अपना पद छोड़कर नई पीढ़ी को आगे लाना चाहिए. बासव राजू की बातों से एक संकेत यह भी मिला कि पार्टी रिटायरमेंट को लेकर एक नीति अख्तियार कर सकती है. गणपति ने सेहत से लाचार होने के कारण 2017 में केंद्रीय समिति छोड़ दी थी.

किसी स्थानीय आदिवासी के लिए संगठन के शीर्ष पर पहुंचना बहुत मुश्किल

शीर्ष स्रोतों से पता चला है कि सीएमसी के प्रधान के पद के लिए यों हिडमा का नाम सबसे आगे चल रहा है लेकिन इस पद के लिए कुछ और मजबूत दावेदार आर श्रीनिवास उर्फ रमन्ना, पी तिरुपति उर्फ देवजी, के सुदर्शन उर्फ आनंद और एम वेणुगोपाल उर्फ भूपति (पूर्व नक्सल नेता किशन जी का भाई) हैं. सीएमसी की अगुवाई इनमें से कौन करेगा- इसका अंतिम फैसला सीपीआई (माओवादी) की केंद्रीय समिति को करना है. नक्सल संगठन में शीर्ष के नेताओं का जिस तरह से चयन हुआ है उसे देखते हुए माना जा सकता है कि बस्तर के किसी स्थानीय आदिवासी के लिए संगठन में शीर्ष पद पर पहुंचना बहुत मुश्किल है.

केंद्रीय स्तर की संस्था होने के नाते सीएमसी गुरिल्ला कार्रवाइयों, सैन्य रणनीतियों और हथियारों की खरीद और आपूर्ति के बारे में फैसले लेती है. पी’पल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) के अतिरिक्त सीएमसी में कई अन्य उप-समितियां हैं, जैसे स्पेशल आर्मी मिलिट्री कमिटी तथा जोनल मिलिट्री कमिटी. क्षेत्र विशेष की जरूरतों के हिसाब से इस समितियों को निचले स्तर पर कई उपशाखाओं में बांटा जाता है. सीपीआई (माओवादी) की सैन्य शाखा का नाम पीएलजीए है. पीएलजीए सैन्य प्रशिक्षण, गुरिल्ला दस्ते का गठन, माओवादी कारकूनों की हिफाजत तथा हमले की कार्रवाइयों का जिम्मा निभाती है.

हिडमा कौन है?

हिडमा की पहचान को लेकर लोगों में कई तरह की बातें प्रचलित हैं लेकिन एक खास बात उसे लेकर सबसे ज्यादा कही जाती है- बात यह कि हिडमा फिलहाल छत्तीसगढ़ में दंडकारण्य के बस्तर में पीपल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी के बटालियन-1 का कमांडर है और वह हथियारबंद दस्ते के सबसे निचले स्तर से आगे बढ़ते हुए कमांडर के ओहदे तक पहुंचा है.

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हिडमा सुकमा जिले के पुवार्ति गांव का है और नक्सलियों के दबदबे वाले दक्षिणी सुकमा से अपना अभियान चलाता है. पुलिस और सुरक्षाबल के स्रोतों से हासिल जानकारी के मुताबिक, हिडमा कई दुर्दांत माओवादी हमलों में शामिल रहा जिसमें 2010 का चिंतलनार हमला भी शामिल है. इसमें सीआरपीएफ के 76 जवान शहीद हुए थे. हिडमा 2013 के झीरम घाटी हमले में भी शामिल रहा. इसमें छत्तीसगढ़ के कांग्रेस के शीर्ष स्तर के सभी नेता एकबारगी मारे गए. साल 2017 के बुरकापाल हमले में भी हिडमा की भूमिका रही. इसमें सीआरपीएफ के 23 जवान शहीद हुए थे.

हिडमा अबूझ पहेली क्यों है?

पुलिस नहीं जानती कि हिडमा शक्ल-ओ-सूरत से कैसा दिखता है, उसकी पृष्ठभूमि क्या है, उसकी उम्र कितनी है.

पुलिस के पास हिडमा की बस एक तस्वीर है- यह श्वेत-श्याम दौर (ब्लैक एंड ह्वाईट) की तस्वीर है और तकरीबन दो दशक पुरानी हो चुकी है. हिडमा के सिर पर 40 लाख का ईनाम है. कहा जाता है कि हिडमा अपने साथ एके 47 लेकर चलता है और उसके पास 250-300 माओवादी लड़ाकों का एक जत्था है.

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हिडमा के बारे में कई कहानियां प्रचलित हैं. कुछ लोग कहते हैं कि हिडमा जवान है और अभी 30 साल का भी नहीं हुआ जबकि कुछ और लोगों का कहना है कि हिडमा अब 50 साल की उम्र पार कर चुका है.

फर्स्टपोस्ट के सुकमा में एक स्रोत ने बताया कि “ हिडमा के वजूद को लेकर कई तरह की कहानियां प्रचलित हैं और इसी कारण हिडमा एक पहेली बना हुआ है. कुछ लोग कहते हैं झीरम घाटी हमले के बाद एक मुठभेड़ में उसकी मौत हो चुकी है और माओवादी कारकूनों के बीच नेता-पद के लिए उसके नाम का इस्तेमाल किया जा रहा है. हिडमा को किसी ने देखा नहीं और वो गांव के बाजार में भी चल आये तो उसे कोई पहचान नहीं सकता.”

बहरहाल, हिडमा के साथ एक वक्त तक काम करने वाले और अब हथियार डाल चुके एक माओवादी से जब इन पंक्तियों के लेखक ने साक्षात्कार में पूछा तो उसने बताया कि हिडमा अभी चालीस की उम्र में है और खुशखवार मिजाज का इंसान है.

छत्तीसगढ़ पुलिस के बस्तर रेंज के इंस्पेक्टर जेनरल विवेकानंद ने फर्स्टपोस्ट से कहा कि “ हिडमा एक स्थानीय आदिवासी जवान है और सुकमा में माओवादी बटालियन की अगुवाई करता है. विस्फोट और घात लगाकर किये जाने वाले कई हमलों में उसका हाथ रहा है. माओवादी नेता अक्सर अपने वास्तविक नाम से नहीं जाने जाते, उनके कई उपनाम होते हैं.”

हिडमा का नाम आगे क्यों चल रहा है?

- हिडमा को माओवादियों के बीच जुझारु और आक्रामक तेवर का नेता माना जाता है. वह फिलहाल बस्तर में बटालियन-1 के कमांडर के ओहदे पर है.

- हिडमा अभी ज्यादा उम्र का नहीं हुआ. पद के दावेदार अन्य माओवादी या तो हिडमा से बहुत ज्यादा उम्र के हैं या फिर उनकी सेहत खराब चल रही है. के सुदर्शन (65 साल) को कई बीमारियां हैं. एक अन्य दावेदार एम वेणुगोपाल जिसके जिम्मे महाराष्ट्र-छत्तीसगढ़ सीमा वाले इलाके का प्रभार है, उतना आक्रामक नहीं जितना कि हिडमा.

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- पी तिरुपति उर्फ देवजी बटालियन-2 का दंडकारण्य में कमांडर था लेकिन यह बटालियन अब खत्म कर दी गई है.

- अगर हिडमा का चुनाव होता है तो यह बस्तर के नौजवानों के लिए प्रेरक का काम करेगा. बस्तर माओवादियों के लिए अपने कारकून भर्ती करने की भी जमीन है. कुछ अरसे से माओवादी कारकूनों का संख्याबल घटा हुआ है.

- हिडमा को गुरिल्ला युद्ध की रणनीति बनाने में महारत हासिल है. कहा जाता है कि बस्तर के इलाके का पूरा नक्शा एकदम उसकी अंगुलियों की नोंक पर रहता है.

सीपीआई (माओवादी) की केंद्रीय समिति के सभी 21 सदस्यों में ज्यादातर की सेहत खराब चल रही है, वे बूढ़े भी हो चुके हैं. खुफिया एजेंसियों के सूत्रों के मुताबिक पूरे रेड कॉरिडोर में बस्तर का इलाका यों माओवादियों का सबसे मजबूत गढ़ है लेकिन यहां से अभी कोई व्यक्ति केंद्रीय समिति में नहीं पहुंचा है.

खुफिया एजेंसी के एक स्रोत के मुताबिक 'खबर आई थी कि हिडमा को केंद्रीय समिति का सदस्य बनाया गया है लेकिन यह खबर सच्ची नहीं थी. हिडमा बस्तर में बटालियन-1 का कमांडर है. देखना होगा कि केंद्रीय समिति उसे सीएमसी का मुखिया बनाती है या नहीं क्योंकि अभी तक शीर्ष नेतृत्व का कोई पद किसी आदिवासी नेता को नहीं मिला है. माओवादियों के सभी नेता आंध्रप्रदेश के हैं.'

सेंट्रल मिलिट्री कमीशन (माओवादियो का केंद्रीय सैन्य आयोग) की प्रधानी का जिम्मा अगर हिडमा के हाथ में आता है तो बस्तर में नक्सली अभियान ज्यादा तेज और घातक हो उठेंगे- बासव राजू ऐसा चाहता भी है.

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