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सियासी घमासान के बीच रुकी बिहार की आर्थिक रफ्तार

महागठबंधन में खींचतान से बिहार के विकास दर के और निचे जाने की आशंका है

Updated On: Jun 28, 2017 06:33 PM IST

FP Staff

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सियासी घमासान के बीच रुकी बिहार की आर्थिक रफ्तार

बिहार में महागठबंधन सरकार पर घिरे संकट के बादल फिलहाल टलते नहीं दिख रहे है. तीनों दलों के नेताओं के बयानबाजी के बीच सरकार का कामकाज रुक सा गया है. शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति तो पहले से खराब है ही साथ ही सात निश्चय के तहत शुरू हुई योजनाओं की प्रगति भी संतोषजनक नहीं है.

आर्थिक मामलों के जानकार एनके चौधरी की मानें तो राजनीतिक अस्थिरता के कारण विकास कार्य पर असर पड़ रहा है. कई विभागों की राशि खर्च नहीं हो रही है.

वहीं एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट के प्रोफेसर डीएम दिवाकर का यह भी कहना है कि राजनीतिक अस्थिरता में ब्यूरोक्रेट्स फाइल की गति धीमी कर देते हैं, जिसका असर योजनाओं की प्रगति पर पड़ता है.

एक आंकड़े के मुताबिक पिछले 3 महीने में बिहार सरकार मात्र 6.39 प्रतिशत ही खर्च कर पाई है. अधिकांश विभाग में अभी खाता भी नहीं खुला है. शौचालय निर्माण, इंदिरा आवास निर्माण में बिहार सरकार फिसड्डी है.

कई विभागों का खर्च शून्य

बिहार सरकार के कई विभागों कृषि, कला संस्कृति विभाग, पिछड़ा विभाग, भवन निर्माण विभाग, सहकारिता विभाग, शिक्षा विभाग, वित्त विभाग, उद्योग विभाग, लघु जलसंसाधन विभाग, पंचायती विभाग, पर्यटल विभाग, खान भूतत्व विभाग, लॉ विभाग, कैबिनेट विभाग, निर्वाचन विभाग, वाणिज्य कर विभाग जैसे प्रमुख विभागों में खर्च शून्य है.

इसके अलावा गन्ना उद्योग में 0.01 प्रतिशत, सामाज्य कल्याण में 0.24 प्रतिशत, साइंस टेक्नोलॉजी में 2.02 प्रतिशत खर्च हुआ है तो नगर विकास विभाग में 0.21 प्रतिशत, एसी/एसटी में 1.03 प्रतिशत ही खर्च हो पाया है.

कुछ विभाग जैसे आईटी में 45 प्रतिशत, जलसंसाधन में 29 प्रतिशत सहित चार पांच विभाग ही डबल डिजिट में तय योजना आकार की राशि का खर्च कर पाए हैं.

नीतीश के नजदीकी रहे विधायक ज्ञानेंद्र सिंह ज्ञानू जो अब बीजेपी में है कि माने तो नीतीश कुमार काम करना चाहते हैं लेकिन उनको काम करने नहीं दिया जा रहा है. वहीं जदयू के प्रवक्ता का दावा है कि सरकार काम कर रही है महागठबंधन और सरकार दोनों अलग अलग है एक साथ रहने पर यह चलते रहता है.

बिहार का विकास दर पिछले कई सालों से 10 प्रतिशत के आस पास है ऐसे में महागठबंधन में खींचतान बनी रही तो उसका नीचे आना तय है इसका असर आर्थिक गतिविधियों से लेकर रोजगार तक पड़ सकता है.

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