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मॉनसून 2018: क्या मौसम विभाग की भविष्यवाणी इस साल सच होगी?

जून 2017 की शुरुआत में विभाग ने मॉनसून के सामान्य रहने की भविष्यवाणी की थी, अब 15 मई को मौसम विभाग नए पूर्वानुमान जारी करने वाला है

Updated On: Apr 20, 2018 08:28 AM IST

Bhuwan Bhaskar Bhuwan Bhaskar
लेखक भारतीय अर्थव्यवस्था और कृषि मामलों के जानकार हैं

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मॉनसून 2018: क्या मौसम विभाग की भविष्यवाणी इस साल सच होगी?

मौसम विभाग ने इस साल के लिए एक बार फिर सामान्य मॉनसून की घोषणा की है. चुनावी साल से ठीक पहले आई इस घोषणा से निश्चित तौर पर सरकार के रणनीतिकारों को राहत मिली होगी क्योंकि भारत में मॉनसून की बारिश का मतलब होता है खेती में बेहतर उपज. और बेहतर खेती से ग्रामीण भारत, किसानों और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था में ज्यादा आमदनी का सीधा रिश्ता होता है.

लेकिन भारतीय खेती और अर्थव्यवस्था के लिए मौसम विभाग की राहत देने वाली भविष्यवाणी वास्तव में कितनी असरदार होगी, इसका ठीक-ठीक पता चलने में अभी दो से ढाई महीने का वक्त और लगेगा. इसका पता तब चलेगा जब केरल से होता हुआ मॉनसून भारत के अंदरूनी भागों में बढ़ेगा और किसान खरीफ फसलों की बुवाई शुरू करेंगे.

मौसम विभाग पास या फेल?

मौसम की भविष्यवाणी दरअसल हर साल भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) के लिए एक परीक्षा की तरह होती है, जिसके नतीजे मॉनसून की प्रगति के साथ धीरे-धीरे निकलते हैं. दुर्भाग्य से विभाग साल-दर-साल इस परीक्षा में फेल होता रहा है. पिछले साल जुलाई में महाराष्ट्र के बीड जिले के आनंदगांव में किसानों के एक समूह ने भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) के खिलाफ पुलिस में शिकायत की. आरोप लगा किसानों को गुमराह करने का. लगभग उसी समय स्वाभिमानी शेतकरी संगठन ने धमकी दी कि वह पुणे के आईएमडी ऑफिस पर ताला लगा देंगे. आखिर आईएमडी पर किसानों के आक्रोश का सबब क्या था?

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दरअसल जून 2017 की शुरुआत में विभाग ने मॉनसून के सामान्य रहने की भविष्यवाणी की थी. फिर 12 जून को महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त मराठवाड़ा इलाके की कृषि मौसम इकाई ने किसानों को खरीफ फसलों की बुवाई शुरू करने की सलाह दी. किसानों ने अच्छी बारिश की उम्मीद में पिछले साल के मुकाबले 4-गुना ज्यादा बुवाई की. बादल भी मेहरबान हुए और 20 जून तक झमाझम बारिश हुई. लेकिन उसके बाद आसमान सूखा तो ऐसे, कि तीन हफ्तों तक बारिश की कोई बूंद नहीं गिरी. राज्य के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने 9 जुलाई को किसानों से बुवाई 20 जुलाई तक टालने का अनुरोध किया. लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. लगभग 75% बुवाई पूरी हो चुकी थी. जाहिर है किसानों का गुस्सा फूट पड़ा.

हर बार किसान बेहाल

यह हाल केवल महाराष्ट्र का नहीं था. मध्य प्रदेश में तिलहन और दलहन की खेती भी कम बारिश से प्रभावित हुई, जबकि हरियाणा और पंजाब में बारिश की अनियमितता के कारण धान के उत्पादन पर असर पड़ा.

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यहां तक कि महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश में हुई कम बारिश के कारण सोयाबीन के उत्पादन में करीब 10 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई. और यह तब हुआ जब 2017 में मौसम विभाग की भविष्यवाणी पिछले 8 वर्षों में सबसे कम खराब रही. मौसम विभाग ने अप्रैल में लंबी अवधि के औसत का 98% प्रतिशत बारिश होने का अनुमान जताया था, जबकि वास्तव में यह 95% रही.

2016 में तो हालात इस कदर खराब हुए थे कि मौसम विभाग ने जहां सामान्य से 106% ज्यादा वर्षा का अनुमान जताया था, वहीं वास्तविक बारिश महज 97% हुई. इसी तरह 2014 और 2015 में भी आईएमडी के अनुमान और वास्तविक बारिश के स्तर में 10% से ज्यादा अंतर रहा था.

कैसा अंदाजा लगाया जाता है मॉनसून का

लेकिन मौसम विभाग की इन असफलताओं के बीच यह समझना भी जरूरी है कि ये अनुमान किस तरह लगाए जाते हैं और इनका मतलब क्या होता है? क्यों लगातार होने वाले निवेश और उन्नत तकनीकों के बावजूद भारतीय मौसम विभाग चूक जाता है? और उससे भी बड़ी बात यह कि भले देश भर के औसत में 3-10% का अंतर होता है, लेकिन अलग-अलग भू-भागों में यह अंतर बहुत ज्यादा क्यों होता है?

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मौसम विभाग दरअसल मॉनसून का जो अनुमान जारी करता है, आधुनिक दौर में उसकी तकनीक की शुरुआत 1994 में हुई. इसी साल 'मध्यम अवधि के मौसम अनुमान के लिए राष्ट्रीय केंद्र' (NCMRWF) की स्थापना हुई जिसने अंकों पर आधारित मॉडल के माध्यम से वायुमंडलीय आंकड़ों को जटिल फॉर्मूलों के जरिए भविष्य के मौसम का अनुमान लगाने के लिए इस्तेमाल करना शुरू किया.

साल 2014 में इसे और उन्नत कर मौसम की भविष्यवाणी के लिए सांख्यिकीय मॉडल का इस्तेमाल शुरू हुआ. लेकिन अमेरिका में विकसित इस मॉडल की अपनी कुछ दिक्कतें हैं, जिनके कारण अवधि बढ़ने के साथ ही अनुमान के गलत होने की संभावना बढ़ती जाती है. केवल 5 दिनों तक के अनुमान में 60% सटीकता होती है, जबकि उसके बाद की अवधि के अनुमान का कोई भरोसा नहीं होता.

कितना सटीक होता है यह अंदाजा?

जब मौसम विभाग ये कहता है कि उत्तर भारत में किसी साल सामान्य बारिश हुई, तो उससे यह पता नहीं चलता कि किसी एक हिस्से में तो 125% बारिश से आई बाढ़ में सब डूब गया और दूसरे हिस्से में 75% बारिश के कारण लोग प्यासे मर रहे हैं.

यह गड़बड़ी इसलिए होती है क्योंकि फिलहाल मौसम विभाग जिले के आधार पर मौसम का अनुमान जारी करता है और इन अनुमानों के लिए इनपुट के तौर पर इस्तेमाल किए जाने वाले आंकड़े जिन केंद्रों में जमा होते हैं, उनके बीच कई बार 200 किलोमीटर से भी अधिक की दूरी होती है.

ऐसे में मौसम का अनुमान जारी करने के लिए जरूरी तत्व जैसे, धूल, एरोसोल, नमी इत्यादि से जुड़े आंकड़ों में बड़ा अंतर रह जाता है और इसलिए मौसम विभाग के अनुमान में त्रुटियां देखने को मिलती हैं.

क्या होगा इस साल?

ऐसे में सवाल है कि क्या 2018 के लिए मौसम विभाग द्वारा जारी अनुमान सच साबित होगा और सालों से सूखा झेल रहे किसानों को राहत मिलेगी. पिछले एक दशक में मौसम विभाग की सबसे सटीक भविष्यवाणी 2008 में हुई थी, जब वास्तविक से उसका अंतर केवल 1% रहा था.

हर बीतते साल के साथ मौसम विभाग की तकनीकी सक्षमता बढ़ रही है, इसलिए उम्मीद की जा सकती है कि 15 मई को जारी होने वाले विभाग के अगले अनुमान आने तक स्थितियां और साफ हो जाएंगी और 2018 एक बार फिर मौसम विभाग के रिकॉर्ड में अनुमान के सफल सालों की मिसाल बनेगा.

(लेखक कृषि और आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)

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