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अवैध खनन की वजह से मध्य प्रदेश बूंद-बूंद के लिए तरसने पर मजबूर होगा

बालू के अवैध खनन का प्रकृति-परिवेश पर गहरा असर होता है. नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता मेधा पाटकर ने इस बात को समझाते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक जल-स्रोत के नजदीक किसी भी किस्म के खनन का काम वर्जित है

Updated On: Jan 30, 2019 02:22 PM IST

Manish Chandra Mishra

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अवैध खनन की वजह से मध्य प्रदेश बूंद-बूंद के लिए तरसने पर मजबूर होगा

विधानसभा (2018) चुनावों से पहले कांग्रेस बालू के अवैध खनन के मसले पर शिवराज सिंह चौहान (बीजेपी) के नेतृत्व वाली मध्यप्रदेश सरकार के पीछे लट्ठ लेकर पड़ी थी. सूबे में सत्ता बदल गई है- कमलनाथ ने मुख्यमंत्री बनने पर वादा किया था कि वे अवैध खनन पर अंकुश लगाएंगे और माइनिंग (खनन) के क्षेत्र में सुधार करेंगे लेकिन सत्ता के बदलने के बाद भी इस मामले में हालात सुधरते नहीं दीखते.

नई सरकार ने हालांकि समस्या से निपटने के लिए कई उपायों का वादा किया था लेकिन जमीनी हकीकत कहीं ज्यादा संगीन है.

आरोपों की झड़ी

सूबे की पिछली विधानसभा में कांग्रेस के अजय सिंह नेता-प्रतिपक्ष थे. उन्होंने शिवराज सिंह की सरकार पर आरोप लगाया था कि खुद मुख्यमंत्री के रिश्तेदार अवैध खनन के काम में लगे हैं. अजय सिंह ने 2017 के मार्च में विधानसभा में अपने भाषण के दौरान कहा था- “मुख्यमंत्री जरुर ही इस बात से आगाह होंगे कि उनके भतीजे जहाजपुर में बिना एन्वायर्नमेंटल क्लीयरेंस के अवैध रीति से बालू का खनन कर रहे हैं. बालू के खनन के कुल 586 में से 450 खदानें दो कंपनियों को आबंटित कर दी गई हैं. जो लोग इन कंपनियों के मालिक हैं उनके बारे में सूचना निश्चित ही सार्वजनिक की जानी चाहिए.”

अब, सूबे में दोनों पार्टियों की जगह बदल गई है- कांग्रेस शासन में है और बीजेपी विपक्ष में तो विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ठीक यही आरोप लगा रहे हैं कि कांग्रेस की सरकार बालू के अवैध खनन में लगी है. उन्होंने कहा – ‘मुझे नहीं मालूम कि हमारी सरकार के खिलाफ लगाये गये आरोप सही थे या नहीं. लेकिन, यह बात सच है कि कांग्रेस के शह पाये ठेकेदार संरक्षित खनन-क्षेत्रों में अवैध तरीके से खनन के काम में लगे हैं.”

उन्होंने बालू की ऊंची कीमतों पर भी चिन्ता जतायी. नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने दावा किया कि “ कांग्रेस का शह पाकर बालू-माफिया ने भाव बढ़ा दिये हैं और इस कारण विकास के कई काम रुक गये हैं. इस कारण केंद्र से चलायी जा रही कुछ योजनाओं जैसे प्रधानमंत्री सड़क योजना तथा प्रधानमंत्री आवास योजना पर असर पड़ा है.

‘नदी को मारा जा रहा है’- मेधा पाटकर

बालू के अवैध खनन का प्रकृति-परिवेश पर गहरा असर होता है. नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता मेधा पाटकर ने इस बात को समझाते हुए कहा कि, “ सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक जल-स्रोत के नजदीक किसी भी किस्म के खनन का काम वर्जित है. बालू के खनन का काम चाहे कितने भी छोटे स्तर पर क्यों ना किया जा रहा हो, उसके लिए वन एवं पर्यावरण मंत्रालय से मंजूरी लेना जरुरी है. अगर खदान का इलाका 50 एकड़ से कम हो तो पर्यावरण पर होने वाले असर के आकलन से संबंधित स्टेट एन्वायर्नमेंट इम्पैक्ट अथॉरिटी उस पर बालू के खनन की अनुमति दे सकती है.”

मेधा पाटकर ने पिछली सरकार पर खनन-कार्य को मंजूरी देने के मामले में नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि इसी कारण “ मध्यप्रदेश की नदियां लगभग मर चुकी हैं. अगर आप नर्मदा नदी की पेटी को बालू निकालने के लिए खोदते हैं तो इससे जल-चक्र प्रभावित होगा. मैं अभी उत्तराखंड में गंगा नदी के किनारे हूं और यहां भी हालत वैसी ही है.”

साल 2012 और 2013 में राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण(एनजीटी) के ज्यादातर खनन-विरोधी फैसले मध्यप्रदेश सरकार के खिलाफ थे. पाटकर का कहना है, “ मध्यप्रदेश ही एकमात्र राज्य था जिसने एनजीटी के 2013 के अगस्त के फैसले को चुनौती दी और लघु-खनिज(माइनर मिनरल्स) के खनन पर लगी रोक में छूट लेनी चाही. इसमें बिना एन्वायर्नमेंट क्लीरेंस के बालू का खनन करना भी शामिल है. एनजीटी ने अपील खारिज कर दी लेकिन रोक लगे होने के बावजूद राज्य की सरकार ने अवैध तरीके से हो रहे खनन-कार्य को फलने-फूलने दिया. नई सरकार अगर अवैध खनन पर अंकुश लगाना चाहती है तो फिर एक जटिल और बहुत बड़ा काम उसके सामने करने के लिए आन खड़ा है.

“ बालू के खनन से जुड़े माफिया-तंत्र को तीन हिस्से में बांट सकते हैं. एक हिस्सा बालू की खुदाई करने वालों का है, दूसरा हिस्सा बालू का भंडारण करने वालों का और तीसरा हिस्सा बालू के परिवहन से जुड़ा है. सरकार को कठोर दंड के प्रावधान करने होंगे. अभी प्रशासन की तरफ से बस इतना भर होता है कि ट्रैक्टर के ड्राइवर को गिरफ्तार कर लिया और ठेकेदार पर थोड़ा-बहुत जुर्माना लगा दिया. इतने भर से बात नहीं बनने वाली..”

पर्यावरण का नुकसान, राजस्व की हानि

नर्मदा नदी को बचाने के लिए बरसो से संघर्ष कर रहे मध्यप्रदेश के सामाजिक कार्यकर्ता विनायक परिहार ने राजस्व में हुई हानि का आकलन किया है. उन्होंने बताया कि “ हाल की सीएजी रिपोर्ट के मुताबिक बालू के अवैध खनन से 600 करोड़ रुपये के राजस्व का घाटा हुआ है. सीएजी की रिपोर्ट में तो बस नमूने के तौर पर राजस्व-हानि का आकलन किया गया है. राजस्व में वास्तविक घाटा और ज्यादा हुआ होगा. हमारा आकलन है कि पिछले 10 साल में सरकारी खजाने को 2 लाख करोड़ रुपये का चूना लगा है और यह रकम मध्यप्रदेश सरकार के कुल कर्जे से ज्यादा है. विनायक परिहार का दावा है कि मध्यप्रदेश में बालू के खनन के 90 फीसद ठिकाने गैरकानूनी हैं.

सरकार ने हाल ही में साल 2016-17 के आंकड़े जारी किये हैं. इन आंकड़ों के मुताबिक सरकार को बालू के खनन के मद में 240 करोड़ रुपये की रॉयल्टी हासिल हुई है.

पर्यावरण को हो रहे नुकसान के बारे में बताते हुए विनायक परिहार ने कहा कि “ बालू के खनन के कारण नर्मदा खत्म हो चली है —15-20 किलोमीटर के दायरे में लगभग 20 जगहों पर कुछ माह तक नदी सूख जाती है. हमलोग नई सरकार से मांग कर रहे हैं कि वह मामले की राज्य स्तर पर सीबीआई से विशेष जांच(एसआईटी) करवाये.”

Illegal Sand Mining In Madhya Pradesh Narmada

हालांकि, विनायक परिहार को ऐसा नहीं लगता कि नई सरकार इस दिशा में कोई कदम उठायेगी. परिहार को आशंका है कि मंत्री और विधायक अवैध खनन-कार्य में लगे हैं.

खनन माफिया का चंगुल

अधिकारियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को इस बात का खूब पता है कि बालू के अवैध खनन से जुड़ा माफिया तंत्र बहुत ताकतवर है. यह माफिया-तंत्र पूरे इंतजाम करके रखता है कि कोई भी उसकी राह मे बाधा ना बने.

राज्यसभा में 7 फरवरी 2018 को एक प्रश्न के जवाब में सरकार ने कहा था कि साल 2015 और 2016 में मीडियाकर्मियों पर हमले की सबसे ज्यादा घटनाएं मध्यप्रदेश में हुईं. साल 2015 में मध्यप्रदेश में ऐसी 19 घटनायें हुईं जबकि 2016 में ऐसे 24 मामले सामने आये. और, मीडियाकर्मियों पर हमले की ज्यादातर घटनाओं का रिश्ता बालू के अवैध खनन के मामलों से था.

साल 2017 के दिसंबर में छत्तरपुर जिले में कम से कम छह पत्रकार हमले की चपेट में आकर घायल हुये. ये पत्रकार बालू के अवैध खनन के मामलों की रिपोर्टिंग कर रहे थे. साल 2018 के मार्च में ऐसे ही एक मामले की खोज-बीन कर रहे एक पत्रकार को भिंड जिले में दिन-दहाड़े ट्रक से कुचल दिया गया. एक बड़ा दर्दनाक हादसा मध्यप्रदेश के पत्रकार संदीप कोठारी के साथ हुआ. वे अवैध खनन के मामलों की अक्सर खोज-बीन करते थे. संदीप कोठारी का क्षत-विक्षत शव महाराष्ट्र के नागपुर में मिला.

कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर चुनौतियों से निपटने के मसले पर चर्चा के दौरान रिटायर्ड डीजीपी नंदन दुबे ने बताया , “ सबसे बड़ी चुनौती है जमीनी स्तर पर स्थानीय प्रशासन का निहित स्वार्थ. अगर प्रशासन और स्थानीय पुलिस के मन में रहता कि समस्या को सुलझा देना है तो वे ऐसा कर दिखाते. बालू के अवैध खनन के मसले से दूर रहने के लिए पुलिस पर हर किस्म के दबाव हैं, इसमें राजनीतिक दबाव भी शामिल है. किसी एक एजेंसी के बूते की बात नहीं कि वह इस समस्या से लड़े. मामले से जुड़े तमाम पक्ष एकजुट होकर साझा अभियान चलायें, यही सबसे कारगर समाधान होगा.”

सिहोर के सुप्रिन्टेन्डेन्ट ऑफ पुलिस(आरक्षी अधीक्षक) राजेश सिंह चंदेल का कहना है कि, “ हमने अन्य एजेंसिया की मदद से कुछ जगहों पर रेड डालने में कामयाबी हासिल की है. ऐसे अभियान में सबसे बड़ी चुनौती तालमेल बैठाने की आती है, बालू की खदान हर तरफ से खुली होती हैं और उनका विस्तार एक बड़े दायरे में होता है. लेकिन, जिला कलेक्टर की मदद से हम रात मे होने वाली बालू की ढुलाई को रोकने में कामयाब हुये हैं.”

बालू के खनन के कुछ अहम इलाकों में काम कर चुके एक अन्य वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी ने अपना नाम गुप्त रखने की शर्त पर बताया कि बालू-माफिया से लोहा लेने में कौन सी चुनौतिया पेश आती हैं. इस अधिकारी के मुताबिक “ बालू के खनन से जुड़ा माफिया तंत्र इतना मजबूत है कि कोई अधिकारी उसके खिलाफ कार्रवाई करना चाहे तो ये लोग उसके खिलाफ जासूस लगा देते हैं और उसकी गतिविधियों पर नजर रखते हैं. ये लोग पुलिस की हर गतिविधि से आगाह होते हैं और रेड के पहले या रेड के दौरान मौके से फरार हो जाते हैं.”

आईपीएस अधिकारी के मुताबिक “ खनन ही नहीं बल्कि बालू के परिवहन का काम भी माफिया-तंत्र बड़े कायदे से करता है. अगर उन्हें पता चल जाये कि बालू ढुलाई के रास्ते में पुलिस चेकप्वाइंट लगाने वाली है तो वे एकदम ही आखिरी लम्हे में ईआरपी( इन्टरप्राइज रिसोर्स प्लानिंग) के जरिये ऑनलाइन इन्वायस बना लेते हैं ताकि मामला अवैध ना लगे. अदालत में अवैध खनन के मामलों को साबित करना और उसपर जुर्माना आयद करना बहुत मुश्किल होता है.”

बहरहाल, परिवहन कंपनी के लिए काम करे एक ड्राइवर ने मामले से जुड़ी अपने हिस्से की कहानी बयान की. उसने नाम गुप्त रखने की शर्त पर बालू की ढुलाई से जुड़े जोखिम और खतरों के बारे में बताया. ड्राइवर का कहना था,“ मैं चंबल के इलाके में काम करता हूं और यहां हमेशा ही खतरा रहता है कि दो ठेकेदारों के बीच बालू की खुदाई के हलके को लेकर संघर्ष छिड़ जायेगा. खनन के काम में भारी मशीनों का इस्तेमाल होता है. सो, इन दिनों बहुत कम लोग खुदाई के काम में हाथ डालते हैं. ड्राइवरों को हर कदम पर परेशानी का सामना करना पड़ता है. पुलिस उन्हें कभी भी रोक लेती है और मामले में कानूनी कार्रवाई चलने पर वाहन जब्त कर लिया जाता है. ठेकेदार चाहता है कि जितना बालू जमा हो सके उतना ही अच्छा, ऐसे में ड्राइवर और मजदूरों को रोजाना औसतन 18 घंटे काम करना होता है.”

कंस्ट्रक्शन इंडस्ड्री भी खुश नहीं

“ यों तो बालू का खनन एक फायदे का धंधा है लेकिन आम व्यवसायी के लिए बालू के खनन के कारोबार में हाथ डालना तकरीबन असंभव है क्योंकि खुदाई और ढुलाई के काम में जोखिम ज्यादा है.” यह कहना है सिहोर में भवन-निर्माण की सामग्रियों की आपूर्ति का कारोबार कर रहे व्यवसायी महेन्द्र त्यागी का. महेन्द्र त्यागी ने सालों तक बालू की आपूर्ति का व्यवसाय संभाला लेकिन अब यह काम छोड़कर भवन-निर्माण की अन्य सामग्रियों की सप्लाई का काम कर रहे हैं.

उन्होंने बताया कि “ मसला रॉयल्टी के भुगतान का नहीं है.. पुलिसकर्मी और माइनिंग ऑफिसर से लेकर स्थानीय गुंडों-मवालियों तक हरेक का इस काम में कुछ ना कुछ ‘हिस्सा’ बनता है. खदान से गोदाम तक बालू को ले जाने में व्यवसायी को हर जगह रुपये चुकाने होते हैं. अगर सरकार पूरी प्रक्रिया को आसान बना दे तो इस उद्योग में रोजगार के ज्यादा अवसर पैदा होंगे.” नई सरकार क्या कदम उठाने की सोच रही

खनिज संसाधन मंत्रालय के नये मंत्री प्रदीप जैसवाल इस बात से सहमत हैं कि बालू का अवैध खनन सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है. उन्होंने कहा कि “ चंद कंपनियों ने इस काम पर एकाधिकार बना लिया है. हमलोग अवैध खनन को रोकने के साथ-साथ इसे भी खत्म करने पर ध्यान दे रहे हैं. हमारी योजना स्थानीय निकायों को सशक्त बनाने और उन्हें बालू के खनन का परमिट दे सकने में सक्षम बनाने पर है.”

मंत्री ने कहा कि वे एक नई नीति तैयार करने के बारे में सोच रहे हैं. इस नीति का नाम होगा- नवीन खनिज कर एवं रेत नीति. यह जल्दी ही लागू की जायेगी. साथ ही, स्थानीय नौजवानों के लिए रोजगार के अवसर पैदा करने के लिए बालू के खनन पर नियंत्रण का जिम्मा ग्राम स्तर के संघों को दिया जायेगा.

मंत्री प्रदीप जैसवाल के मुताबिक “ सरकार बिचौलियों की भूमिका को कम करते हुए बालू के खनन से हासिल राजस्व को दोगुना करने की कोशिश कर रही है. हमलोग व्यवस्था को सरल बनाने के लिए माइनिंग ऑफिसर के अधिकारों को भी फिर से बहाल करने की सोच रहे हैं.”

तस्वीर और वीडियो साभार: विचार मध्यप्रदेश

( लेखक स्वतंत्र पत्रकार और जमीनी स्तर के संवाददाताओं के अखिल भारतीय नेटवर्क 101Reporters.com के सदस्य हैं)

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