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भारत-बांग्लादेश के बीच ‘टोबा टेक सिंह’ की तरह फंस गई है ‘तेनुआलोसा इलिशा’

हिलसा की प्रजाति फरक्का बराज की दीवार से टकराकर रह गई हैं

Mukesh Bhushan Updated On: Mar 10, 2017 03:51 PM IST

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भारत-बांग्लादेश के बीच ‘टोबा टेक सिंह’ की तरह फंस गई है ‘तेनुआलोसा इलिशा’

तेनुआलोसा इलिशा. उसका वैज्ञानिक नाम यही है. प्यार से हम उसे इलिशा, इलिशे या हिलसा आदि नामों से पुकारते हैं. जी हां, आपने ठीक पहचाना ! वही हिलसा मछली, जिसके स्वाद की दुनिया दीवानी है. खाने की मेज पर इसका होना किसी बांग्लाभाषी परिवार की प्रतिष्ठा बढ़ा देता है.

इस महत्वपूर्ण हैसियत के बावजूद ‘क्लुपेडियाइ’ नामक परिवार की इस चमकदार मछली की हालत टोबा टेक सिंह सरीखी हो गई है. वही सआदत हसन मंटो की कहानी वाले टोबा टेक सिंह, जिनका शव भारत-पाकिस्तान की सीमा पर ‘नो मेंस लैंड’ में पाई गई थी.

आप पूछ सकते हैं कि इंसान और मछली की क्या तुलना? पर वैज्ञानिक मानते हैं कि पारिस्थितिकी (इकोलॉजी) में ‘एवरीथिंग इस इक्वल टू एवरीथिंग’. यानी सब सबके बराबर हैं. न तो किसी का महत्व कम है और न ही किसी का ज्यादा. यदि एक का महत्व कम हो जाए तो दूसरे का भी अपने आप ही कम हो जाता है.

टोबा टेक सिंह तो भारत-पाकिस्तान में विभाजन के बीच फंस गए थे. लेकिन हिलसा की प्रजाति बांग्लादेश (तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान) सीमा से करीब 16 किमी पहले बनी उस दीवार से उलझकर रह गई हैं, जिसका नाम है फरक्का बराज.

फरक्का बराज ने किया रास्ता बंद

फरक्का बराज:

फरक्का बराज:

करीब 42 सालों से मादा हिलसा फरक्का बराज की दीवार से सिर पटक-पटककर लौट रहीं हैं. इस दीवार ने उनके परंपरागत मार्ग को अवरुद्ध कर दिया है, जिसका इस्तेमाल वे अपने अंडे देने के लिए उपयुक्त स्थान तक पहुंचने में करती रहीं हैं. ऐसा करते हुए समुद्र के खारे पानी से दूर गंगा की उल्टी दिशा में दौड़ लगाते हुए इलाहाबाद तक पहुंच जाती थीं.

हालांकि इनका मूल स्थान गंगा के मुहाने पर है जहां समुद्र का खारा पानी मिलता है. नदी और समुद्र के इसी संगम पर वयस्क हिलसा अठखेलियां करती हैं. मॉनसून आते ही ब्रीडिंग के लिए मादा मीठे और साफ पानी की ओर निकल पड़ती हैं.

लेकिन, 1975 के बाद इनके लिए सबकुछ पहले जैसा नहीं रहा. इसी साल फरक्का बराज की कमीशनिंग की गई थी. तभी से इस बराज ने हिलसा के जीवन-चक्र में उथल-पुथल मचा रखा है. बाद में बढ़ते जल-प्रदूषण ने रही-सही कसर भी पूरी कर दी है.

पश्चिम बंगाल सरकार की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 14 सालों में तो हिलसा का उत्पादन 90 फीसदी कम हो गया है. इसका उत्पादन 2001 में जहां 80,000 टन रिकार्ड किया गया था, वही 2014 में यह 1000 टन पर सिमट गया. उसके बाद सरकार की चिंता सामने आई. सेंट्रल इनलैंड फिशरी रिसर्च सेंटर को इसका खास दायित्व दिया गया है.

इस रिसर्च सेंटर के निदेशक डॉ बसंत कुमार दास की झल्लाहट बेवजह नहीं है कि, मछलियों की चिंता लोगों की ‘लिस्ट प्रायोरिटी’ होनी चाहिए. बताते हैं कि पिछले 25 सालों से फरक्का बराज के ‘फिश लैडर’ (मछलियों की आवाजाही के लिए बनाए गए सीढीदार गेट) को खोला ही नहीं गया.

उन्होंने बताया, ‘हमलोगों ने अपने रिसर्च के आधार पर मैडम ( केंद्रीय मंत्री उमा भारती) को रिपोर्ट दी है. अब वे फरक्का बराज के फिश लैडर को खोलने के लिए संबंधित अधिकारियों को निर्देश देंगी’. डॉ दास यह भी बताते हैं कि इस बराज के ऊपरी हिस्से में हिलसा है या नहीं इसका पता लगाने के लिए 25 लाख का एक प्रोजेक्ट मिला है. चार महीने के इस प्रोजेक्ट का काम इसी माह शुरू हुआ है. इससे हमें पता चलेगा कि हिलसा के माइग्रेशन में क्या परेशानी है?

खुद को बचाने का रास्ता 

डॉ दास मानते हैं कि सभी जीवों में अपने आप को बचाने का ‘इंस्टिंक्ट’ होता है. इस इंस्टिंक्ट के कारण हिलसा ने अबतक अपने को बचाए रखा है. यह ठीक वैसे ही है जैसे रास्ते में अवरोध मिलने पर हम ‘डाइवर्जन’ खोज लेते हैं. हिलसा ने भी ‘डाइवर्जन’ खोज लिया है. जब बराज के कारण पुराना रास्ता बंद हो गया तो ब्रह्मपुत्र और मैगना नदी में इसने ‘डाइवर्जन’ खोज लिया. चूंकि यह इलाका अब बांग्लादेश में है, इसीलिए वहां इसका उत्पादन ज्यादा हो गया है और भारत में उसका आयात किया जाता है.

हालांकि, दास बताते है कि इस साल (2016) भारत में भी हिलसा का उत्पादन बंपर हुआ है. इसके आंकड़े अभी नहीं आए हैं. एकबार आंकड़े मिल जाएं तब यह पता लगाया जाएगा कि इसकी वजह क्या है.

हिलसा मछली:

हिलसा मछली:

पिछले दशकों में मादा हिलसा के समक्ष फरक्का के डाउनस्ट्रीम में ही अंडे देने की मजबूरी बन गई है. इसने इसकी साइज पर असर डाला है. वयस्क होने से पहले ही मछुआरे इन्हें पकड़ लेते हैं और उन्हें इसकी अच्छी कीमत मिल जाती हैं. अंडेवाली मादा हिलसा भी पकड़ी जा रही है. इसके कारण उत्पादन पर गंभीर असर पड़ा है. कम होती उपलब्धता की वजह से छोटी हिलसा की भी अच्छी कीमत मिलने लगी है. एक किलो वाली हिलसा की कीमत 1500 से 2000 रुपये तक हो गई है.

कूटनीतिक रिश्तों के लिए महत्वपूर्ण

आधुनिक समय में बांग्लादेश-भारत के बीच यह मछली ‘डिप्लोमेसी’ का हिस्सा भी बन गई है. अपनी बांग्लादेश यात्रा के दौरान 2011 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का यह बयान काफी चर्चित रहा था कि ‘हिलसा के स्वाद के बारे में काफी सुन चुका हूं. यदि बांग्लादेश इसे खाने में सर्व करता है तो मैं इसके लिए शाकाहार का त्याग करने की सोच रहा हूं’.

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने पर बांग्लादेश ने उनके लिए जो गिफ्ट भेजे थे, उनमें 20 किलो हिलसा मछली भी थी. कूटनीतिक रिश्तों में ऐसे संकेतों के मायने काफी गहरे होते हैं.

भारत ने 2005 में बांग्लादेश से हिलसा के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया था. जिसने वहां के मछुआरों की कमर तोड़ दी. हालांकि इससे पश्चिम बंगाल के संभ्रांत परिवारों की ‘डाइनिंग टेबल’ भी उदास हो गई. बाद में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के आग्रह पर प्रतिबंध हटाया गया.

पद्मा नदी:

पद्मा नदी:

अब 2012 में बांग्लादेश ने हिलसा के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया है. ऐसा हिलसा का अस्तित्व बचाने के लिए किया गया है. इसका तेजी घटता प्रोडक्शन बांग्लादेश के लिए खतरे की घंटी बजा चुका है. अब पश्चिम बंगाल सरकार चाहती है कि केंद्र बांग्लादेश पर ऐसे प्रतिबंध हटाने का दबाव बनाए. प्रतिबंध के कारण हिलसा की तस्करी भी बड़े पैमाने पर होने लगी है.

हिलसा का लगातार घटता उत्पादन भारत से ज्यादा बांग्लादेश की चिंता का कारण है. बांग्लादेश में कुल मत्स्य उत्पादन के 12 फीसदी हिस्से पर हिलसा का कब्जा है. वहां की जीडीपी में हिलसा का योगदान एक प्रतिशित है. बांग्लादेश सरकार हिलसा को बचाने के लिए भारत का सहयोग चाहती है.

बांग्लादेश की एक तिहाई आबादी की आजीविका गंगा-बह्मपुत्र-मैगना घाटी की मछलियों पर निर्भर है. इनमें हिलसा का स्थान सबसे महत्वपूर्ण है. बांग्लादेश में गंगा को पद्मा के नाम से जाना जाता है. बंगाल (पूर्व व पश्चिम दोनों) के लोगों का मानना है कि स्वाद में पद्मा-हिलसा का कोई मुकाबला नहीं है.

क्या हम खोज पाएंगे अपना वैकल्पिक रास्ता?

'इलिशे गुरी, इलिशे गुरी, इलिश माछे दीम, 'इलिशे गुरी, इलिशे गुरी, दिनेर बेले हीम.’

बांग्लाभाषी परिवारों की कई पीढ़ियों ने कवि सत्येंद्रनाथ दत्त के 1916 में लिखे इस गीत को गुनगुनाते हुए करीब सौ मॉनसून गुजार दिए हैं.

पश्चिम बंगाल के नदिया जिले में जन्मे सौमित्र राय इसका अर्थ समझाते हैं- बारिश में खेलते बच्चे, इस गीत में, इलिश के झुंड से यह अपेक्षा करते हैं कि वे ज्यादा से ज्यादा अंडे दे ताकि हर दिन इसका आनंद ले सकें.

बंगाल की संस्कृति से हिलसा का नाता सदियों पुराना है. यह गीत तो बस इस नाते की एक झलक भर है. खास अवसरों और शादी समारोहों में खाने की मेज पर हिलसा के ढेर सारे प्रकार और इसे पकाने के तरीकों से परिवार की हैसियत का पता लगा लिया जाता है.

‘जमाई षष्ठी’, (दामाद को खुश करने का मौका) हो या नए साल के स्वागत के लिए ‘पोइला बैशाख’, इलिश का होना परंपरा की जरूरत है. हिलसा के परंपरागत रस्ते को रोककर हमने अपनी परंपरा को भी मुश्किल में डाल दिया है. बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने तो घोषणा कर दी है कि पोइला बैशाख के मौके पर वे हिलसा को डाइनिंग टेबल से दूर रखेंगी.

बहरहाल, अपने आप को बचाने के लिए हिलसा ने तो वैकल्पिक मार्ग खोज लिया है, उसे परंपरागत रास्ते पर लौटाने के लिए ‘फिश लैडर’ बनाने में भी हम सफल हो सकते हैं. लेकिन, आधुनिक विकास हमारे सामने जिस तरह के अवरोध उत्पन्न कर रहा है, उसका विकल्प क्या हम खोज पाएंगे? इससे पहले कि सत्येंद्रनाथ दत्त के गीत हमारी यादों से मिट जाएं, हमें अपना वैकल्पिक रास्ता ढूंढना ही होगा, और ये रास्ता 'एवरीथिंग इस इक्वल टू एवरीथिंग' से ही गुजरता है.

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