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IIT कानपुर: दलित सहयोगी को अपमानित करने वाले प्रोफेसरों पर कार्रवाई में हिचकिचाहट कैसी?

देश के प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थानों में से एक के एयरोस्पेस विभाग में इन दिनों सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है

Updated On: Sep 18, 2018 10:23 PM IST

Sandip Roy

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IIT कानपुर: दलित सहयोगी को अपमानित करने वाले प्रोफेसरों पर कार्रवाई में हिचकिचाहट कैसी?

देश के प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थानों में से एक के एयरोस्पेस विभाग में इन दिनों सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. ये विभाग पूरे साल विवादों की वजह से चर्चा में रहा और इन विवादों की धमक डिपार्टमेंट के बाहर भी महसूस की गई. सुब्रमण्यम सदेरला का आईआईटी कानपुर में इस साल की शुरुआत में एयरोस्पेस डिपार्टमेंट में चयन हुआ था. लेकिन अप्रैल आते-आते आईआईटी कानपुर को सदेरला की शिकायत पर जांच टीम का गठन करना पड़ा. सदेरला का आरोप था कि उनके साथ कॉलेज में उच्चस्तर की रैगिंग की गई है, और ऐसा इसलिए किया गया है क्योंकि वो दलित हैं.

सदेरला का कहना है कि उनके साथ घटी इस तरह की घटना से वो निराश और हताश हैं और वो महसूस करते हैं कि उपहासपूर्ण और अशोभनीय हरकतों से उन्हें परेशान करने की कोशिश की गई. उनकी ये शिकायत दिल्ली में एससी/एसटी कमीशन के पास पहुंची. कमीशन ने इस शिकायत के खिलाफ जांच का निर्देश दिया लेकिन इस मामले में आरोपी बनाए गए प्रोफेसरों ने इस आदेश के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दी और स्टे ले लिया. कोर्ट ने आदेश दिया कि इस मामले पर आईआईटी बोर्ड ऑफ गवर्नर्स खुद की एक जांच कमेटी गठित करे.

इसके बाद एक सदस्यीय जांच टीम का गठन किया गया जिसका नेतृत्व रिटायर्ड जज सईद उज जमां सिद्दीकी कर रहे थे. सिद्दीकी ने इस मामले से संबंधित सभी लोगों की गवाही ली. उन्होंने आरोपियों को सभी गवाहों से क्रॉस एक्जामिनेशन करने की अनुमति दी. उन्होंने आदेश दिए कि इस मामले से संबंधित सभी तरह के ईमेल और दस्तावेज खंगाले जाएं और उसे इस जांच कमेटी के सामने प्रस्तुत किया जाए.

इसके बाद उन्होंने अपनी रिपोर्ट पेश की जिसकी एक प्रति फ़र्स्टपोस्ट के पास भी है. ये रिपोर्ट सनसनीखेज और घातक है. इसके मुताबिक जिन चारों प्रोफेसरों के खिलाफ शिकायत की गई थी, वो चारों इस मामले में दोषी पाए गए हैं. रिपोर्ट में इस बात पर सहमति जताई गई है कि सदेरला की जानकारी, कार्यप्रणाली और चयन को जानबूझ कर कम आकंने की कोशिश की गई थी.

उनके चयन में प्रक्रियात्मक खामियां बरती गई हैं, ऐसे ईमेल्स भेजे गए. उन्हें सेमिनार में शर्मिंदा किया गया. एक ईमेल सभी आईआईटी सीनेटरों को भेजा गया था जिसमें सदेरला की अकादमिक योग्यता पर सवाल खड़े किए गए थे. उन्हें डिनर पार्टी में अपमानित किया गया. सईद की जांच रिपोर्ट के मुताबिक चारों आरोपी प्रोफेसरों ने आईआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थान की छवि को जानबूझ धूमिल करने का प्रयास किया था. उन प्रोफसरों पर रिपोर्ट में सख्त टिप्पणी करते हुए लिखा गया है कि उन्हें भावी पीढ़ियों को पढ़ाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए, यहां तक कि उन्हें प्राथमिक स्कूलों में भी पढ़ाने से प्रतिबंधित कर देना चाहिए.

ये रिपोर्ट चारों आरोपी प्रोफेसर्स, सीएस उपाध्याय,संजय मित्तल, ईशान शर्मा और राजीव शेखर के लिए मुंह पर तमाचे जैसा है. इस रिपोर्ट में चारों के खिलाफ आरोप विस्तार से बताए गए हैं. शेखर ने एक ईमेल भेजा था जिसका शीर्षक था 'दस साल के अभिशाप का एक बार से फिर से हमला'.

इस मेल में सदेरला की अकादमिक योग्यता पर सवाल उठाए गए थे. सिद्दीकी कहते हैं कि शेखर ये जानते थे कि सदेरला का चयन आईआईटी के वैधानिक नियमों के अनुसार ही हुआ है. ऐसे में शेखर का इस प्रक्रिया पर सवाल उठाने पर लिखा गया मेल एक आरक्षित श्रेणी के व्यक्ति को सबके सामने शर्मिंदा करना है और ये गंभीर आचरण की श्रेणी में आता है. सिद्दीकी रिपोर्ट में ध्यान दिलाते हुए कहते हैं कि जिस तरह की भाषा पत्र में इस्तेमाल की गई है वो आक्रामक और अपमानपूर्ण है और इस तरह की भाषा उनके लिए कलंक है जो कि आईआईटी जैसी देश के प्रमुख संस्थानों में शिक्षा देने का काम कर रहे हैं.

मित्तल और उपाध्याय को उच्च स्तर का गंभीर आचरण का आरोपी पाया गया है. मित्तल ने कथित रूप से एक विभागीय कार्यक्रम में कहा कि सदेरला को इस विभाग के लिए चुने जाने का मतलब है कि इस विभाग का स्तर नीचे गिरता जा रहा है. शर्मा पर आरोप है कि उन्होंने एक अकादमिक सेमिनार में सदेरला का उपहास किया. सिद्दकी लिखते हैं कि उनके परीक्षण में इस बात का पता चला है कि शर्मा वास्तविक रूप से सदेरला के उत्तर से संतुष्ट थे इसलिए उन्होंने सेमिनार के बाद किसी तरह की कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई. लेकिन इसके बाद भी उनका कहना था, 'अगर तुम सही हो तो पिछले दस साल से जो मैं पढ़ा रहा हूं वो गलत है.'

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आईआईटी कानपुर के कंप्यूटर साइंस और इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट की तस्वीर ( विकीपीडिया से साभार )

ऐसा केवल इसलिए किया गया जिससे कि सदेरला कमरे में मौजूद छात्रों के लिए हंसी का पात्र बन सके. हालांकि बचाव पक्ष का कहना था कि कोई स्पष्ट जातिगत टिप्पणी नहीं की गई थी लेकिन रिपोर्ट में इसे खारिज करते हुए कहा गया है कि यह मुद्दा है ही नहीं. मुद्दा ये है कि अन्य स्टूडेंट्स के सामने सदेरला के खिलाफ निशाना साधा गया और उन्हें शर्मिंदा और अपमानित किया गया. यहां तक कि ये भी आरोप लगाया गया था कि पीएचडी के एक स्टूडेंट ने सदेरला को अश्लील और भद्दी बातें कही जब वो हॉस्टल में चाय पी रहे थे.

रिपोर्ट के मुताबिक कुल मिला कर वहां का माहौल इतना कसैला बन चुका था कि सदेरला वहां पर चर्चा और अफवाहों का केंद्र बन चुके थै और उनके बारे में केवल प्रोफेसर और स्टूडेंट्स ही नहीं बल्कि वहां आने वाले हॉकर्स और परिसर के गॉर्ड्स भी उनके बारे में चटखारे लेकर बातें करने लगे थे. सिद्दीकी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि इस तरह के वातावरण से आईआईटी परिसर की प्रतिष्ठा घूमिल हुई है.

सबसे ज्यादा चुभने वाली बात ये है कि चारों आरोपियों ने न केवल सदेरला को बदनाम करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी बल्कि उन्होंने वहां पर एक ऐसे गुट का गठन कर दिया जिसका काम केवल निर्लज्ज,आक्रामक, और बेशर्म तरीके से अपने ही नियोक्ता की नीतियों को चुनौती देना रह गया था. इससे आईआईटी कानपुर में अराजकता का माहौल बन गया था. हालांकि उन चारों का कहना था कि उन्होंने अपने संस्थान को प्रतिष्ठा के स्तर को बरकरार रखने के लिए सब कुछ किया था.

सिद्दीकी का कहना था कि मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक उन प्रोफेसरों ने स्पष्ट किया था कि वो न तो अपने कृत्यों के लिए शर्मिंदा हैं और न ही उसको लेकर चिंतित और परेशान हैं. ऐसे में आईआईटी की एक मीटिंग में व्यक्त की गई ये सलाह कि उन प्रोफेसरों को माफी मांगकर इस विवाद का हल निकाल लेना चाहिए, बेमकसद थी क्योंकि वो लोग इस बात को मानने को ही तैयार नहीं थे कि उन्होंने किसी प्रकार की कोई गलती की है.

अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निरोधक अधिनियम की धारा 33 के सेक्शन 3 का प्रावधान बिल्कुल स्पष्ट है. इसमें कई तरह के अत्याचार की बातें लिखी गई हैं. जिनमें अनुसूचित जाति या जनजाति के घर के बाहर कूड़ा करकट, मल, गंदगी फेंकना, इस समुदाय से संबंधित किसी व्यक्ति को नग्न करके घुमाना और एससी/एसटी समुदाय से जुड़े किसी भी व्यक्ति की जमीन पर कब्जा करना अपराध है.

इसके अलावा इसमें ये भी प्रावधान है कि अनुसूचित जाति,अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य को जानबूझकर जनता की नजर में जलील या अपमानित करना या डराना भी अपराध है जिसकी सजा कम से कम छह महीने की जेल है और इस सजा को 5 साल तक बढ़ाया जा सकता है और जुर्माना भी लगाया जा सकता है.

सिद्दीकी अपनी रिपोर्ट में लिखते हैं, 'ये कर्तव्य भ्रष्ट अधिकारी अपनी कब्र खुद ही खोदने में लगे हैं.' लेकिन अब सवाल ये उठता है कि क्या आईआईटी के पास इनके खिलाफ कार्रवाई करने का दृढ़ निश्चय है. इस मामले पर बात करने के लिए 6 सितंबर को एक बोर्ड मीटिंग बुलाई गई थी जिसमें कुछ सदस्यों ने कमेटी की रिपोर्ट को खारिज करने अथवा नजरंदाज करने की कोशिश की.

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सदेरला पर दबाव बनाया जा रहा है कि वो इस मामले को वापस ले लें. बोर्ड मीटिंग में चेयरमैन ने निर्णय लिया है कि आरोपी प्रोफेसरों को सेवा शर्तों के उल्लंघन के तहत दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी. एससी/एसटी एक्ट के उल्लंघन  के तहत कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी. लेकिन राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने 10 सितंबर को आईआईटी के डायरेक्टर और पीड़ित छात्र को अपने यहां बुलाया और जांच कमेटी की रिपोर्ट देखने के बाद डायरेक्टर को आरोपी बनाए गए प्रोफेसरों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने के लिए अल्टीमेटम दिया है.

अब दो कमेटी ने परेशान करने वालों को दोषी करार दे दिया है और उनके खिलाफ इसी एससी/एसटी एक्ट के तहत जनसेवकों को काम में लापरवाही बरतने के लिए सजा की संभावना बन गई है. इसके लिए उन्हें 15 का समय दिया गया था जिसमें एक सप्ताह का वक्त गुजर गया है और समय तेजी से निकलता जा रहा है.

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