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मैं कभी मोदी-राहुल से नहीं मिलना चाहूंगाः ग़ालिब गुरु

ग़ालिब का कहना है कि उसके उम्र के लड़के जम्मू कश्मीर को लेकर चिंतित तो हैं, लेकिन उससे कहीं ज्यादा वह अपने गोल पर फोकस कर रहे हैं

Updated On: Jan 15, 2018 10:13 AM IST

Anand Dutta
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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मैं कभी मोदी-राहुल से नहीं मिलना चाहूंगाः ग़ालिब गुरु

ग़ालिब गुरु. इस देश का नागरिक. इस देश और देश के लोगों की फिक्र करनेवाला. ये बात सही है कि जब तक उसका वजूद रहेगा, लोग उसे उसके पिता अफजल गुरु से जोड़कर ही देखेंगे. औरों के लिए यह अजीब बात हो सकती है. ग़ालिब के लिए उसका नाम अगर उसके पिता के साथ लिया जाता है तो यह उसके लिए फख्र की बात है. पिता से जुड़ी पुरानी यादें, उनसे किए वादे और जम्मू-कश्मीर की चढ़ती-उतराती राजनीतिक फिजां के बीच वह पूरे मन से नीट (मेडिकल एंट्रेंस) की तैयारी में लगा है.

बीते 11 जनवरी को जम्मू-कश्मीर बोर्ड के 12वीं के परिणाम आए थे. ग़ालिब ने एक बार फिर बेहतरीन प्रदर्शन किया. उसे 500 में कुल 441 नंबर आए. उससे अधिक नंबर स्कूल की एक छात्रा को मिले, लेकिन कश्मीर सहित पूरे देश की नजर ग़ालिब पर ही गई. वह इसे बहुत गंभीरता से या दवाब के तौर पर नहीं लेता है. कहता है दसवीं में भी मीडिया का ध्यान उसकी तरफ था, 12वीं में भी. इन सब के बीच वह केवल तैयारी करता रहा. सोपोर के एसआरएमएल स्कूल का यह छात्र कहता है कि फिलहाल 100 प्रतिशत फोकस मेडिकल परीक्षा पर है. उसे हर हाल में डॉक्टर बनना है.

जम्मू-कश्मीर में स्कूली छात्रों का सफर देश के अन्य हिस्सों से छात्रों के कहीं अधिक कठिन है. गालिब को ही ले लीजिए, पूरे 365 दिन में मात्र 15 दिन स्कूल जाने का मौका मिल पाया. बकौल गालिब- सबसे अधिक दिक्कत मेरे उम्र के लड़के-लड़कियों को हो रही है. सीबीएसई के मुकाबले जेएंडके की पढ़ाई बिल्कुल भी अच्छी नहीं है. मतलब उस स्तर की नहीं है. सेल्फ स्टडी के अलावा कोई ऑप्शन नहीं है मेरे पास.

रह गई एक कसक 

जब हालात खराब होते थे, तब ट्यूशन ही एकमात्र सहारा होता था. वह भी मात्र तीन दिन. लगातार प्रदर्शन, स्कूल बंद, इंटरनेट की सुविधा नहीं, इन सबके बीच दिमाग डिस्टर्ब रह रहा था. मैं और मेरे जैसे हजारों स्टूडेंट परेशान थे. घरवालों में दहशत फैली रहती थी. उन्होंने तय किया कि अब मुझे स्कूल नहीं जाने देंगे फिलहाल.

मेरे अब्बू और अम्मी तब्बसुम गुरु का कहना था मेडिकल एक नोबल प्रोफेशन है. मुल्क की खिदमत करने के लिए यह सबसे बढ़िया रास्ता है. अब्बू चाहते थे कि मैं मेडिकल के माध्यम से कौम की सेवा करूं. वो कहते थे बस अपने लोगों की खिदमत जितनी कर सकते हो, करो. मैं जब डॉक्टरी पूरा कर लूंगा, उसके बाद जम्मू-कश्मीर के रिमोट एरिया में जाकर काम करूंगा. वहां मेडिकल के हालात बहुत ही खराब हैं.

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ग़ालिब इस देश का ऐसा छात्र है जिसके पिता को इस देश की न्यायिक व्यवस्था ने फांसी की सजा दी. ऐसे में ग़ालिब भारत के न्यायिक व्यवस्था के बारे में क्या सोचता है? 'अगर हमारे देश की न्यायिक व्यवस्था बेहतर होती तो अब्बू को राहत मिलती. दूसरी बात कि हमें फांसी से पहले एक मुलाकात मिलती. वह भी नहीं मिली. इससे साफ दिखता है कि हमारे साथ अन्याय हुआ है. तीसरी बात अब्बू का नंबर 21 था फांसी में, पहले उसे क्यूं लाया गया.'

एक सवाल कि इतना होने के बाद भी ग़ालिब ने न्यायिक सेवा में जाना जरूरी क्यों नहीं समझा? उसका जवाब है कि मेरा डॉक्टर बनना अब्बू का सपना था. अब अम्मी का सपना है. इसे तो मुझे हर हाल में पूरा करना ही था.

कभी नहीं मिलना चाहूंगा मोदी, राहुल सहित किसी राजनेता से 

हाल ही में पीएम मोदी कश्मीर के छात्रों के एक दल से मिले थे. इसकी चर्चा उन्होंने मन की बात में भी की. छात्रों के उस दल में ग़ालिब तो नहीं था. लेकिन क्या वह कभी मोदी या राहुल गांधी से मिलना चाहेगा? उसका जवाब है- नहीं. बिल्कुल भी नहीं. किसी राजनेता से नहीं. कभी नहीं. इन सबने मिलकर मेरे अब्बू के साथ इंसाफ नहीं किया. मेरी अम्मी से कभी मिलने की कोशिश नहीं की. सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, सभी पार्टियों ने मिलकर मेरे साथ अन्याय किया है. किसी ने हमारे तकलीफ के बारे में नहीं सोचा. क्या कोई पॉलिटीशियन है जिससे मिलना चाहोगे? जवाब है- नहीं, कोई मॉडल नहीं है मेरे लिए.

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10 फरवरी 2013 को जिस वक्त अफजल गुरु को फांसी दी गई, उस वक्त गालिब की उम्र 12 साल थी. इस वक्त वह 16 साल का हो रहा है. क्या कभी पत्थरबाजों ने ग़ालिब से ये नहीं कहा कि आओ हमारे साथ, तुम भी इस सिस्टम के मारे हो, पत्थर बरसाओ? जवाब- मैंने कभी उनको ये मौका ही नहीं दिया. जब हालात ठीक होते थे तो स्कूल जाता था खराब होने पर घर में बंद. दोस्तों के बीच इस माहौल पर बातचीत के बजाए उनके साथ घर में कैरम खेलना ठीक लगता था. पता तो चलता था कि बाहर क्या हो रहा है, लेकिन इन सब के बीच खुद और पढ़ाई को बचाए रखना बहुत जरूरी था.

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वह कहता है कि उसके उम्र के लड़के जम्मू कश्मीर को लेकर चिंतित तो हैं, लेकिन उससे कहीं ज्यादा वह अपने गोल पर फोकस कर रहे हैं. अपने लक्ष्य पर ध्यान लगाए रहते हैं. वह सोचते हैं कि नेशन को कैसे सर्व करें. उसके मुताबिक देश के 70-80 प्रतिशत लोगों से मुझे शिकायत नहीं है. बस सरकार से तकलीफ है. क्योंकि उसने मेरे अब्बू जी के साथ गलत किया.

पत्थरबाजों के बारे में सोचने से बेहतर है, डेल स्टेन की बॉलिंग देखना 

अरुंधति रॉय ने आहत देश नामक किताब में अफजल गुरु से जुड़े फैक्ट को लिखा है. मुकदमे और एफआईआर को सिलसिलेवार ढंग से लिखा है. जिसमें बताया है कि अफजल कहीं से भी दोषी नहीं था. वह मोहरा मात्र था. ग़ालिब कहता है अभी तक उस किताब को पढ़ नहीं पाया है. अपनी स्टडी की वजह से. मेडिकल की पढ़ाई पूरी होने के बाद इन सब के बारे में सोचेगा.

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खाली समय में ग़ालिब क्रिकेट और कैरम खेलता है. कहता है मुझे एबी डिविलियर्स और डेल स्टेन पसंद हैं. अपने देश में विराट कोहली को पसंद करता हूं. हाल ही में लियोनार्डो डी कैप्रियो की फिल्म इंसेप्शन देखी थी और बाहुबली दोनों पार्ट एक साथ देखी थी. हंसते हुए कहता है कटप्पा के बारे में इतनी बात हो रही थी तो देखना ही था कि आखिर कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा?

इन सबके बीच अम्मी तब्बसुम गुरु केवल इस बात पर ध्यान दिलाती रहीं कि मुझे बेहतर करना है. देश की सेवा करना है. उन्होंने मेरे लिए बलिदान दिया है. मुझे उनके सपने को जीना है. मैं कश्मीर घाटी में लोगों को मेडिकल सेवा देना चाहूंगा. कश्मीर के हालात स्टेबल नहीं है. लेकिन अल्लाह ने चाहा तो हालात ठीक होंगे. अगर मैं नीट में सफल हुआ तो बारामुला या श्रीनगर में एडमिशन लेना चाहूंगा.

क्या देश घूमने का मन करता है? गालिब कहता है फिलहाल उसके बारे में सोचा नहीं है. बस डॉक्टर बनने पर ध्यान है. उसके मुताबिक एक छात्र अगर जम्मू में रहता है, उसे केवल अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए. प्रतियोगी परीक्षा के लिए उसे बाहर निकल जाना चाहिए.

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