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'पाकिस्तान अकेला वह देश है, जहां सेना की तादाद के आधार पर खतरे गढ़े जाते हैं'

शुरू से ही पाकिस्तान पर फ़ौज का आधिपत्य बन गया. दूसरे देश, अपने ऊपर आने वाले संभावित खतरों को देखते हुए अपनी सेना का अनुपात बनाते हैं, पाकिस्तान अकेला वह देश है जहां सेना पहले थी और उसकी तादाद को देखते हुए संभावित खतरों को गढ़ा गया

Nazim Naqvi Updated On: Apr 22, 2018 01:43 PM IST

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'पाकिस्तान अकेला वह देश है, जहां सेना की तादाद के आधार पर खतरे गढ़े जाते हैं'

सोचिए विश्व के मान-चित्र पर एक ऐसा देश भी है जिसके बारे में दुनिया के लोग यह सोच रहे हैं कि उसकी बुनियाद ही गलत पड़ी है और जब तक उसे नहीं सुधारा जाता, वह सबके लिए ख़तरा बना रहेगा.

सोचिए हिंदुस्तान के लिए यह ख़तरा कितना बड़ा है क्योंकि वह न सिर्फ उसका पड़ोसी है बल्कि वह हज़ारों वर्ष के अपने इतिहास को भी उसके साथ साझा करता है और 70 साल पहले उसके ही एक अंग को काटकर बनाया गया था.

जी हां, हम बात कर रहे हैं पाकिस्तान की. इसके एक हाई-प्रोफाइल पूर्व राजनायिक हुसैन हक्कानी अपने सालों की रिसर्च के बाद पाकिस्तान की अवाम को ये बताना चाहते हैं कि पकिस्तान की अवधारणा को फिर से सोचना कितना जरूरी है.

पुस्तक का नाम है ‘रीइमेजिनिंग पाकिस्तान: ट्रांस्फोर्मिंग ए डिसफंक्शनल न्यूक्लियर स्टेट’. इसके लेखक हुसैन हक्कानी का परिचय कुछ इस तरह है कि वह एक पाकिस्तानी हैं जो भारत के साथ पाकिस्तान के एतिहासिक रिश्तों का ताना-बाना दुरुस्त करना चाहते हैं.

इतिहास, सियासत, आतंकवाद और अर्थव्यवस्था की बिखरी हुई तस्वीर के टुकड़ों से वह फिर एक तस्वीर बनाना चाहते हैं और इसी मुहिम के तहत अपनी पुस्तक के समर्थन में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाना चाहते हैं. पेश है उनसे की गई दो-टूक बातचीत के अंश.

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फ़र्स्टपोस्ट: हक्कानी साहब, री-इमेजिनिंग पाकिस्तान जो आपकी किताब है उसे समझने के लिए पहले इमेजिनिंग ऑफ़ पाकिस्तान को समझना चाहता हूं, उससे जो री-इमेजिनिंग चाहता है.

जवाब: देखें पाकिस्तान जब बना था तो ये बहुत सोच-विचार के बाद नहीं बना था. इतिहास पर नज़र डालें तो आप देखेंगे कि उस जमाने में वोटिंग का जो तरीका था वो संप्रदाय के आधार पर था. मुसलमान सिर्फ मुसलमान को वोट देता था हिंदू, हिंदू को वोट देता था, शिड्यूल कास्ट वाला शेड्यूल कास्ट वाले को वोट देता था. तो मुसलामानों के वोट लेने के लिए मुस्लिम-लीग ने उस ज़माने में ये नारा दिया और हालात ऐसे हो गए कि उसके नतीजे में एक देश बन गया.

देश बना लेकिन बहुत सारे सवालों का जवाब उसमें शामिल ही नहीं था. मिसाल के तौर पर ‘अच्छा! अगर हम मुसलमानों का मुल्क बनाएंगे जहां वो मेजोरिटी में हों तो जहां मुसलमान माइनॉरिटी में होंगे, उनका क्या बनेगा?’ जो ग़ैर-मुस्लिम हैं उस मेजोरिटी एरिया में उनका क्या बनेगा? और अगर जैसा मुस्लिम लीग ने पहले मांगा था कि हमारे यहां जो प्रांत हैं, उनमें से जिनमें मुसलमान बहुमत में हैं उनको पाकिस्तान बना दिया जाए, बिना विभाजन के. तो अगर विभाजन से पहले के पंजाब और बंगाल को देखें तो उसमें मुसलमान 54% होता 46% ग़ैर-मुस्लिम होता. तो फिर देश तोड़ने की जरूरत ही क्या थी?

तो मेरा कहना ये है कि पाकिस्तान की अवधारणा की जो प्रक्रिया थी वह सही नहीं थी. मगर जब हालात की वजह से एक मुल्क बन गया तो फिर उसमें बहुत सी चीज़ें झूठी गढ़ी गईं, उस अवधारणा को उचित ठहराने के लिए. इतिहास फिर से गढ़ा गया. कहा गया कि मुसलमान-हिंदू साथ ही नहीं रह सकते, यह दो अलग-अलग कौमें हैं, मजहब हमारी कौमियत की बुनियाद है.

इसके बाद पाकिस्तान के दृष्टिकोण से यह एक हादसा ही कहा जाएगा कि जो विभाजन का फॉर्मूला बनाया गया उसमें उसे टोटल हिंदुस्तान की 19% जनसंख्या मिली, 17% रिसोर्सेज मिले और 33% सेना मिली.

फ़र्स्टपोस्ट: हां ज़रा ये कलकुलेशन समझाइए, पुस्तक विमोचन वाले दिन भी आपने इसपर जोर दिया था. इस कलकुलेशन से आप क्या साबित करना चाहते हैं?

जवाब: मैं ये कहना चाहता हूं कि अंग्रेजों ने भारतियों को फ़ौज में लेने का एक फॉर्मूला बना रखा था. इसपर एक बहुत अच्छी किताब है, लॉर्ड रोबर्ट्स ऑफ़ कंधहार ने लिखी थी 1857 के बाद, कि हिंदुस्तान में कौन-कौन सी जातीय और समुदाय हैं जिन्हें फ़ौज में लिया जाए और किनको न लिया जाए. मसलन बंगालियों को नहीं लेना है, मद्रासियों को नहीं लेना है, साउथ वालों को नहीं लेना, गुर्जर को नहीं लेना. जाट को लेना है. राजपूत को लेना है, वगैरह वगैरह. अच्छा. फिर उसके अंदर उसने यूनिट बनाए थे. मुसलमानों के यूनिट अलग बनाए थे, सिखों के अलग और हिंदुओं के अलग.

द्वितीय विश्व-युद्ध के ज़माने में हुआ ये था अगर आपको याद हो तो कि गांधी जी ने तो नॉन-कोऑपरेशन शुरू कर दिया था कि नहीं जी हम तो नहीं कोऑपरेट करते, आप हमें आजादी दीजिए. लेकिन मुस्लिम-लीग ने उसे सहयोग दिया था. इसका नतीजा यह हुआ कि द्वितीय विश्व-युद्ध के लिए जो बर्तानवी फ़ौज थी, उसका एक तिहाई हिस्सा पंजाबी मुसलमानों और पठानों का था. विभाजन के बाद यह हिस्सा पाकिस्तान को दे दिया गया.

फ़र्स्टपोस्ट: मतलब इस तरह फ़ौज को धर्म के आधार पर बांटा गया?

जवाब: नहीं-नहीं, ये फ़ौज का वो तबका था जो वहीँ का रहने वाला था. वो था ही ज्यादा. जैसे सिख ज्यादा थे. मतलब एक तिहाई को देखें न. इंडिया की आबादी में सिख एक तिहाई नहीं हैं लेकिन आर्मी में एक तिहाई थे उस समय. भई, अगर आप बंगालियों की भर्ती नहीं करोगे, पूरे साउथ से नहीं रिक्रूट करोगे तो जहां से रिक्रूट करोगे वहां वालों का हिस्सा ज्यादा हो जाएगा न.

दूसरी तरफ प्रशासनिक-सेवा में मामला बिलकुल उल्टा था. सिविल-सर्विस में कुल 6 आईसीएस उस इलाके से थे जो पाकिस्तान को मिला. बाक़ी देश के दूसरे हिस्सों के जो मुस्लिम आईसीएस थे उनसे अंग्रेजों ने कहा, तुम पाकिस्तान जाओ. तो पाकिस्तान में पहले पांच-सात-दस साल सारे यूपी और सीपी के जो आईसीएस थे वही छाए हुए थे. उर्दू बोलने वाले 54 या 56 आईसीएस गए यहां से. यह वह थे जिन्होंने कभी उन इलाकों को देखा तक नहीं था.

तो अचानक एक नया देश बन गया जिसके पास सेना अनुपात में बहुत बड़ी है. सिविल सर्वेंट जो हैं वह उस इलाके के रहने वाले नहीं हैं और बहुत सारे नेता भी वहां के नहीं हैं. खुद जिन्ना साहब बंबई से गए. लियाकत अली खान करनाल के रहने वाले थे. ऊपर से आबादी का इतना बड़ा ट्रांसफर हो गया कि ईस्ट पंजाब सारा मुसलामानों से मुक्त हो गया और वेस्ट पंजाब सारा हिंदुओं और सिखों से मुक्त हो गया.

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इसी का यह नतीजा है कि शुरू से ही पाकिस्तान पर फ़ौज का आधिपत्य बन गया. दूसरे देश, अपने ऊपर आने वाले संभावित खतरों को देखते हुए अपनी सेना का अनुपात बनाते हैं, पाकिस्तान अकेला वह देश है जहां सेना पहले थी और उसकी तादाद को देखते हुए संभावित खतरों को गढ़ा गया.

फ़र्स्टपोस्ट: तो आप कहना क्या चाहते हैं?

जवाब: मैं यह कह रहा हूं कि हिंदुस्तान के लिए और दूसरी अंतरराष्ट्रीय ताकतों के लिए भी यही बेहतर है पाकिस्तान की इस अवधारणा को ही बदला जाए. एक फ़ौजी और आतंकी मुल्क होने के बजाय, इस्लाम के नाम पर आतंकवाद में उलझने वाला मुल्क होने के बजाय, एक ऐसा मुल्क हो जाए जो अपनी आर्थिक स्थितियों को सुधारना चाहता है, जो पढने-लिखने पे तवज्जो देता है.

आखिर यह क्यों संभव नहीं है कि पाकिस्तान और भारत ऐसे रहना शुरू कर दें एक दूसरे के साथ जैसे अमरीका और कनाडा रहते हैं. देश अलग-अलग हैं लेकिन अलग-अलग होते हुए भी बहुत कुछ सांझा है.

हुसैन हक्कानी

हुसैन हक्कानी

फ़र्स्टपोस्ट: आपको लगता है कि जो एडवोकेसी आप कर रहे हैं. जो विचार आपके हैं ये विचार पाकिस्तान को मजूर होंगे?

जवाब: देखिए जब जिन्ना ने 1937 का चुनाव लड़ा था तो उनको बहुत ज्यादा वोट नहीं मिले थे. वे नाराज़ होकर इंग्लैंड चले गए. लेकिन फिर वापिस आए. 1940 में उन्होंने पाकिस्तान का नाम लेना शुरू किया. आप उस ज़माने के न्यूज़पेपर देखें, शुरू के वर्षों में उस एडवोकेसी के हक में बात बनती नहीं दिखाई देती लेकिन 46 तक आते-आते वही एडवोकेसी एक लहर बन चुकी थी, जिसके नतीजे में बंटवारा होना पड़ा.

तो मेरा कहना ये है कि ये कभी न कहें कि जब कोई नई अवधारणा की सोच शुरू करें तो उससे पहले ही दिन पूछा जाए कि भैया तुम्हारी इस इमेजिनिंग के पीछे कितने लोग हैं. आप इस वक़्त पाकिस्तान की आबादी देखें, कोई 20 करोड़ की आबादी है जिसमें से दस करोड़ लोगों की उम्र 21 साल से कम है, वो जो 21 साल से कम के बच्चे हैं उनको क्या चाहिए, उनको स्कूल चाहिए, उनको नौकरी चाहिए, उनको शादी चाहिए, उनको खुशहाली चाहिए, वो देखते हैं कि फिल्म के अंदर, जो बॉलीवुड की फिल्में हैं उसमें इंडियन नौजवान हैं वो ऐसी जिंदगी गुज़ार रहा है, हमारे पास ऐसे अवसर नहीं हैं, हॉलीवुड की जो फिल्में हैं उसमें अमरीकन नौजवान ऐसी जिंदगी गुज़ार रहा है. तो एक तरफ तो उसके सामने यह सब है और दूसरी ओर हाफ़िज़ सईद हैं जो कह रहे हैं कि तुम हमारे पास आ जाओ हम तुम्हें जन्नत में हूरें देंगे.

फ़र्स्टपोस्ट: मैंने यह फ़र्स्टपोस्ट इसलिए पूछा क्योंकि आप पुस्तक में पाकिस्तानी अवाम को संबोधित कर रहे हैं लेकिन इसका विमोचन पाकिस्तानियों के बीच नहीं कर पा रहे हैं?

जवाब: एक बात तो ये याद रखिए कि इन सब कुछ के बावजूद इंडिया में जो बात होती है उसका पकिस्तान में असर होता है और इसी तरह पाकिस्तान की बातों का इंडिया में असर होता है. तो जो बात मैं यहां कर रहा हूं, वो वहां पहुंच रही है. ये मत समझें कि बात पहुंच नहीं रही. जब मैं इंडिया के किसी चैनल पर बात कर रहा होता हूं तो उसका क्लिप कराची, कोएटा और पेशावर में भी देखा जाता है. अहम बात ये है कि जो संकेत हैं वो वैसे ही हैं जैसे मैंने अपनी किताब में बयान किए हैं, जिन्हें पाकिस्तान के सैनिक राज में लिखना मुमकिन नहीं है. मगर यह बातें अगर वहां तक पहुंच जाएं तो लोगों की सोच को प्रभावित जरूर करेंगी.

फ़र्स्टपोस्ट: बड़ी अजीब लगता है कि जिनके उपर ज़िम्मेदारी हो वही अपनी ज़िम्मेदारी से ही आँख चुराएं. ये जो पाकिस्तान बार-बार कहता है कि वह तो खुद ही दहशतगर्दी का शिकार है. इसको किस तरह से देखा जाए?

जवाब: अब इसे यूं समझिए कि अगर कोई हाथ में बंदूक लिए हुए हैं और किसी और को मारने की कोशिश में है और खुद ज़ख़्मी हो जाए, तो शिकार तो वह ज़रूर हुआ लेकिन वह शिकारी भी तो है.

फ़र्स्टपोस्ट: दरअसल जब उनसे कहा जाता है कि आपके यहां से आतंकवाद हो रहा है तो उसके जवाब में वो कहते हैं कि हम क्या करें हम भी तो इसके शिकार हैं?

जवाब: इस सवाल का जवाब मेरे पास ये है कि जी हां आप शिकार ज़रूर हैं लेकिन आप शिकार इस वजह से हैं कि आपने अपने यहां ही इनको पाल के रक्खा हुआ है. जैसा की हिलेरी क्लिंटन ने कहा था कि आपने सांप पले हुए हैं, अब जब सांप पाले हुए हैं तो वो आपको भी काटेंगे...

फ़र्स्टपोस्ट: एक तरफ आतंकवाद है तो दूसरी तरफ बलूचिस्तान है जो अपनी आजादी के लिए लगातार लड़ रहा है. क्या आपको उम्मीद है कि उनकी ये उम्मीद पूरी होगी?

जवाब: देखिए बलोचों को उनके हुकूक तो देने पड़ेंगे, क्योंकि आप किसी भी कौम को दबा कर इस तरह से नहीं रख सकते. फ़र्स्टपोस्ट ये है कि बलोचों के अधिकार किस तरह से उन्हें मिलेंगे तो इस बात पर बलोच लीडरों में और पाकिस्तान की केन्द्रीय सत्ता के बीच बातचीत से ही कोई फैसला निकलेगा जिसके आसार अभी तो नज़र नहीं आ रहे हैं.

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फ़र्स्टपोस्ट: अब पाकिस्तान और हिंदुस्तान के बाच में एक चीनी सड़क आ गई है. ये सिर्फ एक सड़क है या इसके कुछ और भी मायने हैं?

जवाब: देखिए चीन का मकसद तो ये है कि किसी तरह से पाकिस्तान और भारत के बीच ऐसी टेनशन रखी जाए कि जिसके नतीजे में भारत की तीन-चार लाख फ़ौज हमेशा पाकिस्तान की सीमा पर बैठी रहे. देखना तो पाकिस्तान को है. सड़क का फायदा उस वक्त होता है जब सड़क पर गाड़ियां भी चलें, पोर्ट का फायदा उस वक़्त होता है जब वहां पर जहाज़ आएं. तो अगर पाकिस्तान सडकें और बंदरगाहें बनवाकर अपनी इकोनॉमी को भी मज़बूत कर सका तब तो अच्छी बात होगी लेकिन अगर ये सड़क सिर्फ पाकिस्तान को कर्जे के बोझ में दबाने वाली बन गयी तो उससे फिर पाकिस्तान के साथ उल्टा होगा जैसा की पहले अमरीका के साथ हुआ.

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फ़र्स्टपोस्ट: कम्युनिस्ट सोच वाला चीन और मजहबी कट्टरपंथी पाकिस्तान एक दूसरे के साथ दोस्ती को बड़ी अहमियत देते हैं लेकिन क्या आपको यह दोस्ती बनावटी नहीं लगती?

जवाब: देखिए अंतरराष्ट्रीय संबंध जो होते हैं उसमें लोगों के स्वभाव से ज्यादा अहम लोगों का फायदा होता है. तो चीन की लीडरशिप चीन का जो फायदा देख रही है पाकिस्तान की लीडरशिप पाकिस्तान का जो फायदा समझती है ये रिश्ता उसकी बुनियाद के ऊपर होता है. इसका न तो कम्युनिज्म से कोई ताल्लुक है न ही मजहबी कट्टरता से. अंतरराष्ट्रीय संबंधों में अनुकूलता तो नहीं होती है.

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