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बेंगलुरु घटना के बाद शहर को कैसे फिर से अपना बनाएं?

जैसमीन लवली जॉर्ज बेंगलुरु में सेक्सुअलिटी और कानून के मुद्दे पर लॉ एंड जेंडर फोरम के साथ एक वॉक का आयोजन करती है.

Updated On: Jan 10, 2017 11:09 AM IST

Ila Ananya

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बेंगलुरु घटना के बाद शहर को कैसे फिर से अपना बनाएं?

मेरा एक दोस्त है, जो हैदराबाद में रहता है. उसे रात में जब उसके रूम-मेट सो जाते हैं तब अपने घर के आसपास के इलाकों में घूमने-फिरने या यूं कहे कि टहलने की बहुत आदत है. वो अक्सर इससे जुड़े किस्से मुझे सुनाता रहता है. वो एक बहुत ही अलग-थलग इलाके में रहता है, लेकिन उसके घर के नजदीक ही चाय और सिगरेट की एक दुकान देर रात तक खुली रहती है.

इस दुकान से सटी हुई एक और छोटी सी दुकान है जिसमें बहुत ही स्वादिष्ट बिरयानी मिलती है. वो मुझे तब तक इस बिरयानी वाली दुकान का नाम नहीं बताता जब तक कि मैं खुद वहां नहीं जाती. उसका दावा है कि रहीम भइया जैसी स्वादिष्ट बिरयानी हैदराबाद का मशहूर रेस्त्रां पैराडाइज भी नहीं बनाता.

फिर वो मुझसे पूछता है कि मैं बेंगलुरु में रात के समय कहां घूमने जाती हूं. उसके सवाल के बाद मैं सोचने लगती हूं और मुझे सिर्फ मेरे घर के आसपास की इक्की-दूक्की सड़कें ही याद आती हैं, जहां मैं घूमना पसंद करुंगी या फिर वो पार्क जहां मैं बैठना पसंद करुंगी. मैंने दोनों में से कुछ भी नहीं किया है.

मुझे इस बातचीत की याद तब आयी जब नारीवादी कार्यकर्ता और स्वतंत्र शोधकर्ता जैसमीन लवली जॉर्ज बेंगलुरु में सेक्सुअलिटी और कानून के मुद्दे पर लॉ एंड जेंडर फोरम के साथ एक वॉक का आयोजन करती है.

सुकून, शांति और आनंद

जैसमीन हिडन पॉकेट्स नाम से चलने वाले एक प्रोजेक्ट की संस्थापक है. ये प्रोजेक्ट सेक्सुलिटी और स्पेसेज विषय पर काम करती है. इसके तुरंत बाद इस वॉक के फेसबुक पेज पर बताया जाता है कि, वे लोग शहर में वैसी जगहों की खोज कर रहे हैं, जो हिडन पॉकेट्स के साथ-साथ प्लेजर पॉकेट्स हो. यानि कि वो जगह जहां रहकर कोई भी व्यक्ति सुकून, खुशी और आनंद तीनों पा सके.

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बेंगलुरु के एमजी रोड पर हुई सामूहिक छेड़छाड़ के दौरान महिला पुलिसकर्मी से बचाव की गुहार लगाती युवती. (फोटो साभार: बेंगलुरु मिरर)

ये एक खोजी अभ्यास है जिसकी कोशिश दिल्ली में भी की गई थी, जहां इन लोगों ने दिल्ली की औरतों से ऐसी जगहों के बारे में पूछा, जहां जाना उनको अच्छा लगा और जहां उन्होंने खूब इंजॉय किया. उदाहरण के तौर पर, कनॉट प्लेस उन्हें काफी सुरक्षित, व्यस्त और मजेदार लगा. लोधी गार्डन भी उन्हें सुरक्षित और शांत लगा.

जब हम 20 लोगों ने शुरुआत की तो हममें से ज्यादातर महिलाएं थीं और कुछ पुरुष - हम यूनिवर्सिटी के नीचे के रास्ते से होते हुए डेयरी सर्किल पहुंचे. क्राइस्ट यूनिवर्सिटी में लगभग हर कोई कानून का विद्यार्थी है. हमारा पहला पड़ाव डेयरी सर्किल के नीचे बना फ्लाईओवर है. हमारे आस-पास से गुजर रही गाड़ियां बेतरह हॉर्न बजा रही हैं और जब हम सब जैसमीन को घेरकर खड़े हो जाते हैं तो वे हमें बताती हैं कि जिस सड़क पे चलते हुए हम यहां तक पहुंचे हैं ये वही सड़क है जिसपर उनके जमाने में लड़कियां रात को अकेली आने बचा करती थी.

उन्हें क्राइस्ट यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किए हुए सालों हो गए हैं, लेकिन इस मुख्य सड़क पर अभी भी बत्ती नहीं लगी है. यहां आई ज्यादातर महिलाओं का कहना था कि इस सड़क पर लाइट नहीं होने से उन्हें असुविधा होती है और यही वो वजह है जिस कारण वे रातों में बाहर निकलने से बचती हैं.

चर्चा में बेंगलुरु

जब से बेंगलुरु के ब्रिगेड रोड में नए साल के मौके पर लड़कियों के उत्पीड़न की खबर आई है, बेंगलुरु तब से चर्चा में है. जैसे, कुछ साल पहले दिल्ली की पहचान भारत के रेप कैपिटल के तौर पर होने लगी थी. ठीक वैसे ही जैसे बेंगलुरु जो अब तक एक सुरक्षित शहर माना जाता था अचानक ही महिलाओं के लिए एक असुरक्षित शहर माना जाने लगा है.

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इस घटना के बाद वहां रोज विरोध प्रदर्शन हो रहा है

अखबारों में अचानक से ऐसी खबरों की बाढ़ सी आ गई है जो बेंगलुरु में बलात्कार और लड़कियों को परेशान करने की जानकारी देता रहा है. ‘बेंगलुरु शहर को अचानक से क्या हो गया है?’

बेंगलुरु में पली-बढ़ी मेरी एक दोस्त मुझसे पूछती है. मेरी दादी जो इस घटना से पहले तक मेरे घर देर रात को लौटने पर थोड़ी बहुत नाराजगी दिखाती थीं वो भी चुपचाप, वो इस घटना के बाद और ज्यादा मुखर हो गई हैं. अब मैं जब भी कहती हूं कि मैं रात में घर देर से आउंगी वो बहुत परेशान हो जाती हैं और कहती हैं : ‘आजकल ज्यादातर लोग ऐसे ही होते हैं, तुम जानती हो न कैसे.’

डेयरी सर्किल के नजदीक बने फ्लाईओवर के नीचे खड़े हम सभी छात्र-छात्राएं 20-25 साल के बीचे के हैं. जैसमीन हमें कहती हैं कि, चाहे जो भी समय हो, हमें इन रास्तों से डरना नहीं चाहिए. अपनी बात कहते हुए वे अपने पांव को जोर से पटकते हुए कहती हैं - ‘इस शहर को अपना शहर समझो.’ उनकी बात सुनकर लड़के हामी में अपना सिर हिलाते हैं. मेरे बगल में कानून की तीसरे वर्ष की छात्रा अपने साथ खड़ी अपनी दोस्त के कानों में कहती है कि - परेशानी इन सड़कों से नहीं बल्कि इन सड़को पर चलने वाले पुरुषों से है. उसकी सहेली उसकी बात सुनकर समर्थन में सिर हिलाती है, लेकिन ये भी कहती है, ‘लेकिन इस वजह से हम सड़क पर चलना छोड़ तो नहीं सकते.’

टच मी नॉट

ठीक इसी समय पर जैसमीन हमें आगाह करते हुए कहती है कि हम यहां विरोध जताने के लिए इकट्ठा नहीं हुए हैं. 1 जनवरी की घटना के बाद बेंगलुरु में इस तरह के कई कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है. यहीं की औरतों ने एक मानव श्रंखला बनाई जिसका विषय था, ‘टच मी नॉट’ यानि ‘मुझे हाथ न लगाएं.’

ये प्रदर्शन कर्नाटक विधान सभा के बाहर आयोजित किया गया था. कुछ और लोगों ने ब्रिगेड रोड में रात को एक वॉक का आयोजन किया था जिसका मजमून था ‘मैं बाहर जाऊंगी.’

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बेंगलुरु की महिलाओं ने टच मी नॉट के नाम से एक मानव श्रंखला भी बनाई

मेरे बगल में खड़ी दोनों महिलाएं लगातार मेरे कान में उन जगहों के नाम फुसफुसा रही हैं जहां वे अकेले रात में जाना चाहती हैं. जैसे - एसडी पाल्या पार्क, एक सुट्टा की दुकान, रसल बाजार, उनके कॉलेज के पास की एक गंदा सा शराबखाना जो सिर्फ पुरुषों के लिए है. मैं अपने घर के आसपास की सड़कों और पार्क के बारे में सोचती हूं जहां मैं बैठना चाहती हूं और जहां बैठने पर शाम के 7 बजे भी मुझे कॉलेज जाने वाले लड़के कई बार असुविधा  जाते हैं.

इस वॉक के अगले पड़ाव तक ये साफ हो गया कि हर किसी के पास अपनी खुद की एक सोच है कि ऐसी जगहों पर किन्हें आने दिया जाना चाहिए और किन्हें नहीं. तब तक हमलोग एसजी पाल्या के पास एक अंधेरे कोने में इकट्ठा हो चुके होते हैं – वही जगह जिसके बारे में दोनों लड़कियां थोड़ी देर पहले धीरे-धीरे बोल रहीं थी, जिसके बारे में जैसमीन कहती है कि - वो वहां अक्सर वहां जॉग करने लिए जाती थीं और हमेशा परेशान की जाती थीं. ये स्पष्ट है कि इन रास्तों पर सिर्फ मर्द ही गाड़ी चलाते हैं क्योंकि सड़क पर लाइट की व्यवस्था नहीं है.

हमारे ग्रुप में शामिल ज्यादातर लड़कियां जो अमूमन दूसरे शहरों से यहां आकर रह रही हैं, और लड़के सभी इस बात पर सहमत होते हैं कि पार्क में शराब और सिगरेट पीने पर रोक लगनी चाहिए. मेरे सामने खड़ी लड़की के चेहरे पर एक बनावटी भाव आता है, फिर वो हंस देती है जब उसे एहसास होता है कि मैं भी वही कर रही हूं. जब तक मैं उसे छोड़कर वहां खड़े दूसरे आदमी से बात करने लगती हूं - उसने बाद में बताया कि वो आरएसएस से जुड़ा हुआ है और कानून का विद्यार्थी है.

निजी दायरे में कैमरा नहीं चाहिए

थोड़ी देर बाद वो लगभग चेतानवी देने के लहजे में कहता है कि सार्वजनिक जगहों पर प्रेम संबंध स्थापित करना बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं है, क्योंकि हम एक मां को अपनी चार साल की बच्ची के साथ सड़क पर चलते हुए ये सब देखने कैसे दे सकते हैं?

Demonstrators shout slogans during a protest against the rape and murder of a law student in the southern state of Kerala, in Mumbai, India

महिलाओं का साफ कहना है कि वे निजी दायरे में निगरानी नहीं चाहती

इसके तुरंत बाद वहां एक बहस छिड़ जाती है. 22 साल के आसपास की तीन लड़कियां उस लड़के को कहती हैं के ये उनकी सड़क है और अगर उसे दिक्कत है तो वो दूसरी तरफ देख सकता है. तभी ये बहस सुरक्षा के सवाल की तरफ मुड़ जाती है. ‘बुरा से बुरा हमारे साथ क्या होगा, बलात्कार या हत्या, उससे ज्यादा क्या?’ जैसमीन ने हमसे पूछा, लेकिन किसी ने जवाब नहीं दिया.

उन दोनों लड़कों के मुताबिक इसका समाधान सीसीटीवी कैमरा है. ‘मैं नहीं चाहती कि ये सरकार हर समय मुझपर नजर रखे,’ उनमें से एक लड़की ने कहा, ‘पहले ही मेरे घरवाले हर समय मुझपर नजर रखते है.’

इसके तुरंत बाद, उस आरएसएस से जुड़े व्यक्ति ने ये कहना शुरु किया कि हम जैसे कम्यूनिस्ट और फेमिनिस्टों को कुछ पता नहीं है. फिर वो भारत माता की जय के नारे लगाने लगा, जिसपर हमारे ग्रुप के अन्य लोगों ने उसे मुंह बंद करने को कहा और तेजी से दूसरी तरफ चल दिए.

हमलोग श्रीनिवासा थियेटर से वापिस क्राइस्ट यूनिवर्सिटी की तरफ जाने लगे और हमारा समूह धीरे-धीरे टूटने लगा. इस समय रात के सवा दस बज रहे थे. मेरे सामने दो लड़कियां सड़क पर जा रहीं थीं, उसी सड़क पर जहां कुछ देर पहले हम लोग चल रहे थे क्योंकि कुछ छात्रों ने जैसमीन को कहा था कि उन्हें वहां डर लगता है. वे लड़कियां बातें करते हुए खिलखिला रहीं थी, उनकी हाथों में जूस का एक ग्लास था जो उन्होंनो श्रीराज लस्सी बार से खरीदी थी. ये सड़क उनकी थी.

साभार: दि लेडीज फिंगर

दि लेडीज फिंगर (टीएलएफ) महिलाओं की एक ऑनलाइन पत्रिका है.

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