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दोस्त और साझीदार रहे रतन टाटा से कैसे बिगड़े नुस्ली वाडिया के रिश्ते..!

टाटा ग्नुुप की तीन कंपनियों के निदेशक नुस्ली वाडिया ने रतन टाटा के लिए गए कई फैसलों पर मुहर लगाई थी

Updated On: Dec 22, 2016 11:59 AM IST

Shantanu Guha Ray

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दोस्त और साझीदार रहे रतन टाटा से कैसे बिगड़े नुस्ली वाडिया के रिश्ते..!

टाटा संस के खिलाफ नुस्ली वाडिया की शिकायतों और आरोपों की फेहरिस्त काफी लंबी है. उन्होंने टाटा संस के तमाम फैसलों पर सवाल उठाए हैं. लेकिन अब वाडिया के आरोपों की हवा निकलती दिख रही है. क्योंकि हमारे हाथ कुछ ऐसे दस्तावेज लगे हैं जो ये दिखाते हैं कि नुस्ली वाडिया ऐसे कई फैसलों में रतन टाटा के साथ थे, जिन पर अब वो सवाल उठा रहे हैं.

फर्स्टपोस्ट के हाथ लगे दस्तावेजों से ये पता चलता है कि नुस्ली वाडिया जो टाटा ग्रुप की तीन कंपनियों में स्वतंत्र निदेशक के तौर पर काम कर रहे थे उन्होंने खुशी-खुशी रतन टाटा के लिए गए कई फैसलों पर मुहर लगाई थी.

इतना ही नहीं उन्होंने टाटा संस के चेयरमैन रतन टाटा को कई प्रोजेक्ट्स के लिए बधाई देते हुए मदद का हाथ भी बढ़ाया था.

ऐसे में अब उन्हीं फैसलों पर नुस्ली वाडिया का सवाल उठाना या उन्हें विवादित कहना ठीक नहीं है.

इन में से एक फैसला साल 2008 में लॉन्च की टाटा की छोटी कार नैनो से जुड़ा हुआ है. टाटा मोटर्स के शेयरधारकों को नुस्ली वाडिया ने 13 पन्नों की चिट्ठी लिख कर नैनो प्रोजेक्ट की प्लानिंग और इसके अमलीकरण पर सवाल खड़ा किया है.

अपने इस तीन पेज की चिट्टी में वाडिया ने लिखा है कि वे नैनो प्रोजेक्ट के नाकाम रहने के बावजूद इसे जारी रखने के रतन टाटा के फैसले से सहमत नहीं थे.

टाटा को कठघरे में खड़े करते हुए वाडिया लिखते हैं, 'नैनो कार लॉन्च होने के साथ ही नाकाम साबित हुई थी. मैंने इस प्रोजेक्ट को जारी रखने का विरोध किया था. इसमें और पैसे लगाने का भी मैंने विरोध किया था'.

लेकिन जो दस्तावेज फ़र्स्टपोस्ट के हाथ लगे हैं, उनसे साफ होता है कि नुस्ली वाडिया, पश्चिम बंगाल में शुरू किए गए नैनो प्रोजेक्ट पर शुरुआत से नजर रखे हुए थे.

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रतन टाटा ने 2007 में नुस्ली को शुक्रिया कहते हुए चिट्टी लिखी

अगस्त 2008 में जब रतन टाटा ने पश्चिम बंगाल से नैनो का प्लांट हटाने का फैसला किया था, तब नुस्ली वाडिया ने एक ई-मेल भेज कर रतन टाटा को नैनो प्लांट महाराष्ट्र के सांगली में शिफ्ट करने में मदद का ऑफर दिया था. सांगली उस वक्त महाराष्ट्र के वित्त मंत्री रहे जयंत पाटिल का इलाका था.

नैनो प्लांट में मदद की पहल

27 अगस्त 2008 को रतन टाटा को भेजे गए मेल में नुस्ली वाडिया ने लिखा, 'जयंत पाटिल आकर आपसे मिलना चाहते हैं. अगर आप उन्हें मिलने का वक्त दे दें या उनसे बात कर लें तो अच्छा रहेगा.'

ऐसा ही उदाहरण रतन टाटा के ब्रिटिश स्टील कंपनी कोरस स्टील में निवेश को लेकर नुस्ली वाडिया के रुख में भी देखने को मिलता है.

इससे जुड़ी एक दूसरी चिट्ठी में वाडिया ने लिखा कि वो इस निवेश के खिलाफ थे. उन्होंने ये भी आरोप लगाया कि रतन टाटा, टाटा स्टील के बजाय कोरस पर ज्यादा ध्यान दे रहे थे.

वाडिया ने इसी महीने टाटा के शेयरधारकों को अपनी चिट्ठी में लिखा है कि, 'मैं किन्हीं ठोस कारणों की वजह से कोरस को खरीदने के बिल्कुल खिलाफ था. लेकिन आखिर में सबकी सहमति से कोरस को खरीदने का फैसला लिया गया.'

वाडिया ने पत्र में आगे लिखा, 'मेरे जेहन में कुछ मूल सवाल थे कि क्या टाटा स्टील का ब्रिटेन में कारोबार बढ़ाना ठीक होगा. मेरा विचार था कि टाटा स्टील को तेजी से बढ़ रहे भारतीय बाजार पर ध्यान देना चाहिए और अपनी ग्रीनफील्ड प्लांट को विकसित करने में पूरा ध्यान लगाना चाहिए जहां मुनाफा ज्यादा होगा'.

लेकिन उन्होंने टाटा के शेयरधारकों को ये बात नहीं बताई कि 'कोरस' को खरीदने के रतन टाटा के फैसले की सबसे पहले उन्होंने ही तारीफ की थी. उस वक्त उन्होंने रतन टाटा को फोन करके इसकी बधाई भी दी थी.

वाडिया के फोनकॉल के जवाब में टाटा ने उन्हें 1 फरवरी 2007 को चिट्ठी लिखी थी. जिसमें रतन टाटा ने लिखा था, 'कोरस पर आपके संदेश का बहुत शुक्रिया. आपकी बातों से मुझे बहुत हौसला मिला है'.

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नुस्ली वाडिया रतन टाटा से बिजनेस के संबंध में लगातार बात रहे हैं

कॉरपोरेट घराने अवाक्

दिल्ली और मुंबई में कॉरपोरेट घरानों के करीबी सूत्रों को नुस्ली वाडिया का रवैया अजीब लगता है. नुस्ली वाडिया के बेटे जेह वाडिया की सस्ती एयरलाइन गो-एयर और टाटा की एयर विस्तारा और एयर एशिया के बीच मुकाबला है.

ऐसे में बरसों से एक दूसरे के साथी और साझीदार रहे नुस्ली वाडिया का टाटा का विरोध करना थोड़ा अजीब है. खासतौर से तब, जब नागरिक उड्डयन मंत्रालय, देसी हवाई कंपनियों को विदेशी उड़ानों की इजाजत देने की शर्त में फेरबदल करने की सोच रहा हो.

इस समय के नियमों के अनुसार किसी कंपनी को विदेशी उड़ान की शुरुआत करने की इजाजत तभी दी जा सकती है जब वो कंपनी पांच साल से ज्यादा पुरानी हो और उसके पास बीस से ज्यादा विमान हों.

लेकिन अब, कुछ दस्तावेजों के हवाले से ये पता चला है कि नुस्ली वाडिया दिल्ली में सत्ता के गलियारों में अपना एजेंडा बढ़ाने के लिए रतन टाटा की मदद मांग रहे थे. रतन टाटा उस वक्त टाटा संस के चेयरमैन होने के साथ-साथ, केंद्र सरकार के बनाए गए निवेश आयोग के भी प्रमुख थे.

नुस्ली वाडिया ने रतन टाटा को 6 दिसंबर 2008 को एक चिट्ठी लिखी थी जिसमें उन्होंने लिखा था, 'जैसा कि आपको पता ही है भारत में नागरिक उड्डयन का कारोबार कई मुश्किलें झेल रहा है. पिछले एक साल में इसने बहुत ज्यादा नुकसान उठाए हैं.'

वाडिया आगे लिखते हैं हालांकि, 'सरकार इन दिक्कतों को दूर करने के लिए लगातार टैक्स और दूसरे खर्चों के स्तर पर काम कर रही है. लेकिन जिस एक बिंदु पर सरकार ध्यान नहीं दे रही है वो इस कारोबार में पूंजी जुटाने का मसला है. जिसके बगैर इस व्यापार को लंबे समय तक चलाया मुश्किल है'.

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नुस्ली चाहते थे कि टाटा उनकी एविएशन बिजनेस में मदद करें

वाडिया ने लिखा, 'मैं आपको इसी विषय पर एक नोट भेज रहा हूं जिसे मैंने निवेश आयोग के विचार के लिए तैयार किया है. अगर निवेश आयोग इसे सही समझता है तो मैं चाहुंगा कि आप इस मुद्दे को प्रधानमंत्री और दूसरे मंत्रियों के साथ बातचीत में उठा सकते हैं. इस मामले में अगर आपको कोई और जानकारी चाहिए तो मैं वो भी मुहैय्या कराने को तैयार हूं'.

इस नोट में वाडिया ने सुझाव दिया था कि, सरकार को 49% विदेशी निवेश के अपने नियम में बदलाव करना चाहिए. ताकि विदेशी एयरलाइन भी इसके दायरे में आएं. वो सरकार की इस राय से भी सहमत नहीं थे कि 'उड़ान'  को संवेदनशील उद्योग मानने के भी विरोधी थे.

वाडिया ने चिट्ठी में लिखा था, 'ये दावा गलत है कि एयरलाइन उद्योग बेहद संवेदनशील क्षेत्र है. दूरसंचार और बीमा क्षेत्रों के बारे में भी यही कहा जाता था. पहले इनमें भी विदेशी निवेश की सीमा नहीं बढ़ाई जा रही थी'. वाडिया चाहते थे कि रतन टाटा उनका ये संदेश निवेश आयोग तक पहुंचाते.

लेकिन पुराने साथी नुस्ली वाडिया और रतन टाटा अब आमने-सामने खड़े हैं. टाटा के खिलाफ वाडिया की शिकायतों की लिस्ट रोज लंबी हो रही है.

अब वो ये इल्जाम भी लगा रहे हैं कि रतन टाटा और टाटा के ट्रस्टी एनए सूनावाला ने टाटा ग्रुप की कंपनियों के बारे में अंदरूनी जानकारी निकलवाने की कोशिश की थी. ऐसा करके दोनों ने सेबी के इनसाईडर ट्रेडिंग को रोकने वाले नियमों का उल्लंघन किया था.

जानकारों की माने तो देश के दो बड़े कारोबारी घरानों के बीच का ये झगड़ा जल्द शांत होने वाला नहीं.

इस बारे में जानकारी हासिल करने के लिए हमने 20 दिसंबर को नुस्ली वाडिया से मेल के जरिए प्रतिक्रिया मांगने की कोशिस की लेकिन अब तक उनके दफ्तर से कोई जवाब नहीं आया है.

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