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नीतीश की गांधी कथा: चंपारण आंदोलन ने भारतीय समाज और राजनीति को कैसे बदला

गांधी के सत्याग्रह ने समाज की कई रूढ़ियों को तोड़ा था, जिन्हें आज की पीढ़ी से जोड़े जाने की जरूरत है

FP Staff Updated On: Oct 16, 2017 05:06 PM IST

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नीतीश की गांधी कथा: चंपारण आंदोलन ने भारतीय समाज और राजनीति को कैसे बदला

पटना के एक कार्यक्रम में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 'गांधी कथा' सुनाई थी. हम आपको गांधी के चंपारण आंदोलन की वो कथा पढ़वा रहे हैं.

सबको मालूम है कि 11 अक्टूबर लोकनायक जय प्रकाश नारायण का जन्मदिन होता है और चम्पारण सत्याग्रह के सौ साल पूरा होने के बाद हम सब पूरे बिहार में शताब्दी समारोह मना रहे हैं. इस अवसर पर सम्राट अशोक कन्वेंशन केन्द्र के ज्ञान भवन में ‘गांधी कथावाचन और बापू आपके द्वार’ कार्यक्रम का शुभारंभ कर मुझे प्रसन्नता हो रही है. गांधी जी 10 अप्रैल 1917 को पटना आये, उस वक्त हमारा देश गुलाम था.

1757 ई में ईस्ट इंडिया कंपनी का देश में प्रवेश हुआ, वे लोग आये थे व्यापार करने, लाभ कमाने के लिए, लेकिन धीरे-धीरे उनका प्रभाव इतना बढ़ता चला गया कि हम सभी भारतीयों के बीच फूट डालकर राज करने लगे और जब 1857 का विद्रोह हुआ तो ब्रिटिश सरकार ने हिन्दुस्तान को अपने कब्जे में ले लिया.

लगभग दो सौ साल तक हमारा देश गुलामी के दंश को झेलता रहा और उसी सिलसिले में आजादी के लिए हमारे अनेक नायकों एवं महानायकों ने संघर्ष किया लेकिन अंततोगत्वा देश की आजादी की जो लड़ाई हुई, वह बापू के नेतृत्व में हुई. उन्होंने सब को अहिंसा का पाठ पढ़ाया और सत्याग्रह के जरिये अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिये मजबूर किया.

बापू का जीवन एक साधारण व्यक्ति के रूप में प्रारंभ हुआ. उन्होंने अपने जीवन से सबक सीखा और सत्य का मार्ग अपनाया. वे छात्र जीवन में जब स्कूल में पढ़ते थे तो स्कूल में पढ़ाई का निरीक्षण करने वाले शिक्षा विभाग के अधिकारी स्कूल आए हुए थे और उन्होंने लड़कों को कुछ शब्द लिखने के लिए दिया. वर्ग में उपस्थित शिक्षक चाहते थे कि हमारे स्कूल की प्रशंसा हो.

सभी बच्चे स्पेलिंग ठीक लिख रहे थे लेकिन बापू एक शब्द की स्पेलिंग गलत लिख रहे थे. शिक्षक ने बापू को इशारा किया कि बगल वाले बच्चे का नकल करके वे लिख लें लेकिन शिक्षक की बात को गांधी जी ने अस्वीकार कर दिया, हालांकि वे शिक्षकों का काफी सम्मान करते थे. जब जांच हुई तो गांधी जी का एक शब्द गलत पाया गया.

गांधी जी ने अपने छात्र जीवन से ही नकल को नहीं अपनाया और गलत मार्ग से खुद को अलग रखने का संकल्प लिया. गांधी जी भारत में पढ़ने-लिखने के बाद इंगलैंड गए और वहां से बैरिस्टर बनकर आए. बैरिस्टर बनने के बाद जब गांधी जी बॉम्बे कोर्ट में हाजिर हुए तो ठीक से बहस नहीं कर पाए और वे फिर राजकोट चले गए. गांधी जी के इलाके के ही कुछ लोग दक्षिण अफ्रीका में रह रहे थे, वहां उनका मुकदमा चल रहा था तो गांधी जी एक साल के कॉन्ट्रैक्ट पर दक्षिण अफ्रीका चले गए.

गांधी जी जब वहां कोर्ट में गए तो सिर पर पगड़ी धारण किए हुए थे, जो वे पहनते थे. कोर्ट में गांधी जी को पगड़ी उतारने को कहा गया लेकिन उन्होंने पगड़ी उतारने से इनकार कर दिया और कोर्ट से बाहर चले आए. इस बात की सब जगह खबर आ गई और गांधी जी की चर्चा शुरू हो गई. दक्षिण अफ्रीका में गांधी जी एक अच्छे वकील के रूप में प्रतिष्ठित हुए.

गांधी जी ने दक्षिण अफ्रीका में अनुभव किया कि वहां हिन्दुस्तानियों के साथ भेदभाव हो रहा था. वहां काले और गोरे का भेद था और हर हिन्दुस्तानी को वहां अपमानित किया जाता था. गांधी जी एक बार ट्रेन में फर्स्ट क्लास का टिकट लेकर यात्रा कर रहे थे. एक गोरा आया और देखा कि ट्रेन में एक हिन्दुस्तानी बैठा हुआ है. गोरे ने टीटीई से शिकायत की और जब टीटीई ने पूछा तो गांधी जी ने टिकट दिखाया कि मेरे पास फर्स्ट क्लास का टिकट है, फिर भी गांधी जी को ट्रेन से उतरने के लिए कहा गया. गांधी जी ने इन्कार कर दिया लेकिन इसके बाद उन्हें जबरन धक्का देकर बाहर निकाल दिया गया और उनके सामान को फेंक दिया गया. गांधी जी के जीवन में इस घटना ने बड़ा परिवर्तन ला दिया.

उन्होंने सोचा कि वाजिब टिकट होने के बाद भी यहां इतना भेदभाव है कि ट्रेन के फर्स्ट क्लास डिब्बे में यात्रा नहीं कर सकते. वहां तो जो भी हिन्दुस्तानी गए थे, कोई मजदूरी कर रहा था तो कोई व्यापार कर रहा था, सभी के साथ इस तरह के भेद-भाव होते थे. तरह-तरह के कानून बनाये गए, रजिस्ट्रेशन अनिवार्य कर दिया गया. शादी-विवाह का रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ तो उसे अवैध मान लिया जाता था. इन सबके विरोध में गांधी जी खड़े हुए तथा लोगों को गोलबंद किया.

उन्होंने अहिंसा के रास्ते पर चलने का लोगों को संदेश दिया और इस प्रकार सत्याग्रह की शुरूआत दक्षिण अफ्रीका से हुई और अंततोगत्वा गांधी जी का सत्याग्रह वहां कामयाब हुआ. हिन्दुस्तानियों के भेदभाव के लिए जो कानून बने हुए थे, उसे दक्षिण अफ्रीका को वापस लेना पड़ा. गांधी जी ने जो साउथ अफ्रीका में सत्याग्रह किया, उसका जो असर हुआ, वह अपने आप में बहुत बड़ी बात है.

भारत आने के बाद एक साल तक गांधी जी जगह-जगह गोखले साहब के कहने पर घूमते रहे, हालांकि इस अवधि में वे कुछ बोलते नहीं थे किन्तु जब बनारस हिन्दु यूनिवर्सिटी में गांधी जी को आमंत्रित किया गया और गांधी जी ने वहां भाषण दिया, उसे सुनकर सभी परेशान हो गए. बिहार में चम्पारण के किसान बहुत परेशान थे और बहुत जमाने से नील की खेती होती थी. नीले रंग की जरूरत यूरोप में बहुत होती थी. रंगों के तीन बुनियादी रंग होते हैं, लाल, पीला और नीला. नीले रंग की उपलब्धता कम होती थी.

इसी नील की खेती चम्पारण में होती थी, जिसका व्यापार होता था. चम्पारण के लोग अग्रेजों के हाथ गांव का गांव ठेके पर देते थे. किसानों को जबरन खेती करने को मजबूर करते थे. एक बीघा में तीन कट्ठा नील की खेती करनी थी और उसकी क्या कीमत होगी यह निलहे तय करते थे. अगर कोई नील की खेती नहीं करना चाहें तो मालगुजारी या और कई तरह के टैक्स लगा दिया करते थे और यही नहीं उस समय चंपारण में जो अत्याचार हो रहा था, वह बहुत ही अजीब था. 44 प्रकार के टैक्स लगाये जाते थे, अगर आप शादी-विवाह कर रहे हैं या पूजा-पाठ कर रहे हैं तो उस पर भी टैक्स देना पड़ता था. साथ ही जो निलहा वहां वाहन से जाते थे और उस पर जो खर्च होता था, उसको भी मेन्टेन करने के लिए लोगों पर टैक्स का बोझ लादा गया था.

जैसी स्थिति थी कि आज के युग में लोग सुनकर अचरज में पड़ जाएंगे. वहां के लोगों ने विद्रोह किया था लेकिन कामयाबी नहीं मिली. वहीं के किसान थे राजकुमार शुक्ल और पीर मुहम्मद मुनीस जो पत्रकार थे, हमेशा लिखते रहते थे. राजकुमार शुक्ल कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में भी गए थे, वहां भी उन्होंने अपनी बात रखी और 1916 में वे गांधी जी से मिले. जब गांधी जी को उन्होंने चंपारण के किसानों की व्यथा बताई तो गांधी जी ने कहा कि हम आपकी बातों को तो सुन लिए लेकिन जब तक हम चलकर देख नहीं लेंगे, तब तक हम कुछ नहीं कहेंगे.

कई बार राजकुमार शुक्ल ने गांधी जी को आमंत्रित किया, वे जहां भी जाते थे राजकुमार शुक्ल जी वहां पहुंच जाते थे और जब गांधी जी कानपुर पहुंचे तो वे वहां भी पहुंच गए और गांधी जी ने कहा कि मैंने वचन दे दिया है तो मैं जरुर जाऊंगा. अंत में गांधी जी ने कहा कि मैं कलकत्ता जाने वाला हूं और वहां के बाद मै चलूंगा.

मोतिहारी का ऐतिहासिक स्टेशन. फोटो सोर्स- द बेटर इंडिया

मोतिहारी का ऐतिहासिक स्टेशन. फोटो सोर्स- द बेटर इंडिया

10 अप्रैल 1917 को राजकुमार शुक्ल जी गांधी जी को लेकर पटना आये और उस समय के बहुत बड़े वकील डॉ राजेन्द्र प्रसाद, जो बाद में देशरत्न कहलाये और देश के प्रथम राष्ट्रपति बने उनके घर पर उनको लेकर गए. उस वक्त राजेन्द्र प्रसाद घर पर नहीं थे और वहां जो कर्मचारी थे, उन्होंने गांधी जी के साथ अच्छा बर्ताव नहीं किया. उन्हें न शौचालय का इस्तेमाल करने दिया और न ही स्नान करने में बर्तन या बाल्टी को इस्तेमाल करने की छूट दी.

गांधी जी बहुत परेशान थे, तब उनको याद आया कि मौलाना मजहरुल हक साहब याद आए जो गांधी जी के साथ लंदन में पढ़े थे, उन्हें संदेश भेजवाया. जब मजहरुल हक साहब को पता चला कि मोहनदास करमचन्द गांधी यहां आए हुए हैं, तब वे स्वयं गाड़ी लेकर आए और गांधी जी को अपने घर ले गए. वे चाहते थे कि गांधी जी उनके यहां रहे लेकिन गांधी जी ने बताया कि उन्हें चंपारण जाना है. मौलाना मजहरूल हक साहब ने बताया कि पहले मुजफ्फरपुर जाइए और 10 अप्रैल को ही गांधी जी राजकुमार शुक्ल जी के साथ मुजफ्फरपुर चले गए.

उस समय जेबी कृपलानी जी मुजफ्फरपुर में लंगट सिंह कॉलेज में पढ़ाते थे जो उस समय जेबीबी कॉलेज कहलाता था. जब कृपलानी जी को टेलीग्राम के माध्यम से पता चला कि गांधी जी आ रहें हैं, तब उन्होंने अपने छात्रों से कहा कि गांधी जी आ रहे हैं. एक बजे रात को गांधी जी मुजफ्फरपुर पहुंचे और लोगों ने रेलवे स्टेशन पहुंचकर गांधी जी का स्वागत किया. जिस गाड़ी पर गांधी जी को लेकर वे चलने लगे, उस गाड़ी को वहां के छात्र खुद खींचकर ले जा रहे थे लेकिन गांधी जी को यह सब ठीक नहीं लग रहा था, हालांकि वहां गांधी जी का भव्य स्वागत हुआ और मुजफ्फरपुर में चार दिन रहकर वहां के लोगों से और वकीलों से चंपारण की पूरी स्थिति से अवगत हुए.

निलहों की जो कमिटी थी, उसके सेक्रेटरी मुजफ्फरपुर में रहते थे. उनसे भी गांधी जी मिलें और तिरहुत के कमिश्नर से भी मिले. जिनसे उन्होंने कहा कि हम यहां कि स्थिति को समझने के लिए आये हैं और इसमें आपका भी सहयोग चाहिए. कमिश्नर और सचिव ने गांधी जी से सवाल किया कि आप बाहरी हैं, यहां कैसे आ गए तब गांधी जी ने कहा कि हम बाहरी कैसे हैं? हम भी इसी देश में रहते हैं. इस तरह चार दिनों तक रहकर बापू हर स्थिति से अवगत हुए और तब उन्होंने यह तय किया कि अब देर करने की जरूरत नहीं है.

चूंकि गांधी जी साउथ अफ्रीका में अंग्रेजों की हर हरकत से वाकिफ हो चुके थे और उन्हें पता था कि ये हमें आगे बढ़ने नहीं देंगे इसलिए जल्दी से गांधी जी चंपारण पहुंचे. वहां उन्हें पता चला कि जसौलीपट्टी के एक किसान पर अत्याचार हुआ है. अगली सुबह वे हाथी पर सवार होकर पीड़ित किसान को देखने चल दिए लेकिन रास्ते में ही उन्हें नोटिस थमा दिया गया कि पहली गाड़ी से ही चंपारण छोड़कर आपको चले जाना है. बाकी लोगों को गांधी जी ने कहा कि आप जाइए, उस पीड़ित किसान के यहां और देखकर आइये क्या स्थिति है, पर वे वापस लौट गए. 18 अप्रैल को वहां के सबडिविजनल मजिस्ट्रेट के कोर्ट में गांधी जी पेश हुए.

गांधी जी के साथ एक से बढ़कर एक जानकार वकील थे, लेकिन गांधी जी ने स्वयं कोर्ट में खड़े होकर कहा कि हम तो यहां आए हैं स्थिति को समझने के लिए न कि सरकार के किसी आज्ञा या कानून का उल्लंघन करने. हमारी अंतरात्मा की जो आवाज है, ऐसे में हम चम्पारण छोड़कर नहीं जा सकते हैं. अगर आपको लगे कि यह जुर्म है तो आपको जो सजा देनी है दीजिये, मुझे कबूल है. कोर्ट में मौजूद सभी अधिकारी परेशान थे कि धारा 144 के उल्लंघन का जो आरोप लगा है, इस व्यक्ति ने तो खुद ही कबूल कर लिया. मजिस्ट्रेट ने आदेश सुरक्षित रखते हुये गांधी जी को सौ रूपये के मुचलके पर जमानत दी, तब गांधी जी ने कहा कि उनके पास कोई जमानतदार नहीं है और न ही वे जमानत दे सकते हैं. अंत में मजिस्ट्रेट ने स्वयं मुचलका भरवाकर उन्हें जाने की आज्ञा दी.

गांधी जी ने कहा कि हम आदेश की अवहेलना नहीं करते लेकिन हमारी अंतरात्मा की जो आवाज है, ऐसे में हम चंपारण छोड़कर नहीं जा सकते. अंत में अंग्रेजी सरकार को झुकना पड़ा और मुकदमा वापस लेना पड़ा. न सिर्फ मुकदमा वापस लिया बल्कि डीएम ने सहयोग करने का आश्वासन भी दिया. इसके बाद गांधी जी ने लोगों से मिलना शुरू किया, उनके बयान लेने शुरू किये. इसके कारण लोगों में जागृति आई और लोग संगठित हुए. उस परिस्थिति को देखते हुए अंग्रेजी हुकूमत को जांच के लिये कमिटी बनानी पड़ी, जिसमें गांधी जी भी सदस्य थे. कमिटी की रिपोर्ट के आधार पर उस समय के काउंसिल में कानून बना और उसके हिसाब से जो तीनकठिया प्रणाली थी, उसे बंद कर दिया गया. किसानों के उपर जो टैक्स के बोझ लादे गए थे, उसे खत्म किया गया. यह मामूली बात नहीं थी.

गांधी जी जब चंपारण आए और जो दो-तीन बातें देखी, वे बहुत ही महत्वपूर्ण है. एक तो कि उनके साथ बड़ी तादाद में बड़े-बड़े वकील उनके साथ लग गए. उस समय जो जात-पांत छुआ-छूत का भेदभाव था, गांधी जी ने लोगों को समझाया और सबका खाना एक साथ बनने लगा, जो पहले अलग-अलग बनता था. यही नहीं उन्होंने देखा कि यहां स्वच्छता, शिक्षा और स्वास्थ्य के प्रति भी कोई जागृति नहीं है. गांधी जी ने लोगों को प्रेरित कर छह स्कूल चंपारण में खोला. लोगों के मानस में ये बात आने लगी कि सफाई पर ध्यान देना चाहिए. गांधी जी ने न सिर्फ चम्पारण सत्याग्रह के जरिये किसानों की तकलीफ को कम किया बल्कि उनके जीवन में शिक्षा का, स्वास्थ्य का संदेश दिया और स्वच्छता के प्रति जागृति लाए.

चंपारण में नील की खेती करते किसान फोटो सोर्स- द बेटर इंडिया

चंपारण में नील की खेती करते किसान फोटो सोर्स- द बेटर इंडिया

1917 में चम्पारण सत्याग्रह हुआ, वह देश के आजादी को लेकर चल रहे अभियान में इतना असरदार हुआ कि 30 साल के अंदर देश आजाद हो गया वरना उस समय तक तो कांग्रेस की सिर्फ बैठकें ही हुआ करती थी.

गांधी जी को क्या-क्या नहीं झेलना पड़ा, जब देश बंट रहा था तो किस प्रकार सांप्रदायिक उन्माद आए. हर जगह गांधी जी खूद सद्भावना कायम करने गए, अनशन किया लेकिन इन सबके बीच वे लोगों के साथ काम करते रहे और इसे बाद क्या हुआ, आप सभी जानते हैं. उनकी हत्या कर दी गयी. गांधी जी की हत्या तो जरुर की गयी लेकिन इस देश और दुनिया से गांधी जी के विचारों की हत्या कोई नहीं कर सकता.

चंपारण सत्याग्रह के सौ साल पूरा होने पर हमने शताब्दी समारोह मना रहे है. इसी साल इसी कन्वेंशन केन्द्र के ज्ञान भवन में हमलोगों ने गांधी जी पर 10 अप्रैल को राष्ट्रीय विमर्श का आयोजन किया, जिसमें देश भर के जाने-माने विद्वतजन आए, गांधी विचारक आये, एक्टिविस्ट आये.

7 अप्रैल 2017 को श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल में देश भर के स्वतंत्रता सेनानियों को हमने सम्मानित किया जिसमें तत्कालीन राष्ट्रपति जी भी आए थे. 11 अप्रैल 2017 को मुजफ्फरपुर में कार्यक्रम का आयोजन हुआ तथा 18 अप्रैल 2017 को मोतिहारी में हमने वहां से पदयात्रा की, जहां से गांधी जी को रास्ते से लौटना पड़ा था. पश्चिम चम्पारण के उस हिस्से में जहां राजकुमार शुक्ल जी के घर को उजाड़ दिया गया था, उसको भी देखने गांधी जी गए थे. हमलोग भी वहां गए थे.

चंपारण सत्याग्रह शताब्दी समारोह के आयोजन का मकसद है हम गांधी जी के विचारों को जन-जन तक पहुंचाएं. हम अगर अपनी नई पीढ़ी में गांधी जी के विचारों के प्रति जागृति पैदा कर देते हैं और वे जागरूक हो जाएंगे उनमें एक बार गांधी के विचारों के प्रति आकर्षण पैदा हो जाए तो यह बहुत बड़ी बात होगी. समाज में परिवर्तन आएगा.

इसलिए हमलोगों ने इस तरह के कार्यक्रमों की रूपरेखा तय की. विद्यालयों में कथावाचन कराने का निर्णय लिया. चूंकि गांधी जी ने कहा था कि मेरा जीवन ही मेरा संदेश है क्योकि जो उनका विचार है, वह उनके कामों से ही निकलता है. उनका विचार मौखिक नहीं था बल्कि जो उन्होंने किया, करके दिखाया, वही उनका विचार है. आज भी गांधी जी पर साहित्य के पुस्तकों की कमी नहीं है.

इसके बावजूद हमलोगों ने सोचा कि अपने स्कूल के बच्चे-बच्चियों को गांधी जी के बारे में बताएं, जो स्कूलों में पढ़ रहे हैं. उनको अलग तरीके से कहानियों को संकलित करके कथावाचन एक-एक दिन कराया जाए, वह भी सरल और सहज भाषा में ताकि हमारे बच्चों को समझ में आ सके. जो मर्म है उसको वह ग्रहण कर सकें.

हमारे साक्षरता कर्मी गांव-गांव, घर-घर जाकर दस्तक देंगे और बापू के विचारों को सुनाएंगे और गांधी जी के संकलित विचारों का जो आज विमोचन हुआ है, उसे लोगों के बीच वितरित करेंगे. सात सामाजिक बुराइयां- सिद्धांतरहित राजनीति, परिश्रमरहित धनोपार्जन, विवेकरहित सुख, चरित्रशून्य ज्ञान, सदाचाररहित व्यापार, संवेदना रहित विज्ञान, वैराग्य विहीन उपासना, इससे बचने की सलाह गांधी जी ने दी है.

गांधी को पुलिस ने चंपारण में गिरफ्तार कर लिया था. फोटो सोर्स- द बेटर इंडिया

गांधी को पुलिस ने चंपारण में गिरफ्तार कर लिया था. फोटो सोर्स- द बेटर इंडिया

उनका मानना था कि जिस परिवर्तन को तुम दुनिया में देखना चाहते हो तो उसकी शुरुआत खुद से पहले करो. मौलिक विचार कर्म पर आधारित होनी चाहिये. ‘माय एक्सपेरिमेंट विथ ट्रुथ’ पुस्तक में गांधी जी ने बताया है कि मेरा जीवन ही मेरा संदेश है. मेरी तो मान्यता है कि नई पीढ़ी के 10-15 प्रतिशत लोग भी अगर गांधी जी के विचारों को आत्मसात कर ले तो बिहार ही नहीं पूरा देश बदल जाएगा, ऐसा मेरा विश्वास है. बहुत कुछ हो गया और जो बाकी है, उसको करेंगे.

बच्चों, अब मैं बापू से जुड़ी दो कहानियों का कथावाचन करता हूं-

च से चंपारण

हमारी दुनिया में तीन बुनियादी रंग होते है, लाल, हरा और नीला. कपड़ों की रंगाई के लिए लाल और हरा रंग तो आसानी से मिलता है, कई तरह के पेड़-पौधों से, पर प्रकृति में नीला रंग मुश्किल से मिलता है.

भारत में नील के पौधे की खेती बहुत पहले से होती आ रही है, कपड़े रंगने की नील बनाने के लिए. तभी से भारत नील का व्यापार दुनिया भर के साथ करता रहा है. भारत पर अंग्रेजों का राज जमने के बाद नील के व्यापार पर भी उन्हीं का कब्जा हो गया. सारा मुनाफा अंग्रेज व्यापारियों के पास ही जाता था, हिंदुस्तान के किसानों को नुकसान ही होने लगा.

बिहार के चंपारण इलाके में नील का व्यापार जिन अंग्रेज व्यापारियों के पास था, वे ‘निलहे’ कहलाते थे. वे जमींदारों से भी ज्यादा ताकतवर थे और जबरदस्ती किसानों से नील की खेती करवाते. किसानों से फसल कम दाम पर खरीदते और उसे बड़े मुनाफे पर विदेश में बेचते. जो किसान नील की खेती नहीं करते, उन से निलहे दुगुना लगान वसूल करते. चंपारण के किसानों पर 44 तरह के अलग-अलग कर लगे हुए थे, यानी टैक्स.

निलहे मनचाहे करार-नामों पर किसानों से दस्तखत करवाते, और उसे पूरा न करने पर किसानों को सताते. सरकार तो अंग्रेजों की ही थी. वह निलहों का ही साथ देती थी. चंपारण के किसानों ने कई आंदोलन किए, लेकिन उनकी हालत सुधरी नहीं.

फिर सन् 1917 के अप्रैल के महीने में कुछ किसान गांधी जी को चंपारण ले आए. गांधी जी उस साल के अंत तक चंपारण में रहे और किसानों के साथ एक आंदोलन चलाया. यह भारत में पहला सत्याग्रह था, जिसकी वजह से अंग्रेज सरकार ने किसानों पर निलहों के अत्याचार पर रोक लगाई.

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मिट्टी से नेता भी बनते हैं

तो क्या गांधी जी अकेले चंपारण पहुंचे और निलहे डर के भाग गए? ऐसा नहीं है. गांधी जी ने हिम्मत दिखाई, तो उनके साथ बहुत से लोग किसानों की मदद के लिए आगे आ गए. आखिर कमजोर ताकतवर का साथ चाहिए. गांधी जी ने मजबूर किसानों को बड़े-बड़े वकीलों से जोड़ा. एक से दूसरा जुड़ता गया, हिंदुस्तानी लोग मजबूत होते गए.

गांधीजी सौराष्ट्र में पैदा हुए थे और दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने काम किया था. उन्हें बिहार या चंपारण या नील के बारे में कुछ भी नहीं पता था. उन्हें चंपारण लेकर आने वालों में किसान राजकुमार शुक्ल और पत्रकार पीर मुहम्मद मूनिस का नाम सबसे पहले आता है. इन्होंने लगातार बात करके उन्हें बिहार आने के लिए मनाया.

नील की खेती से जुड़ी महिलाओं को संबोधित करते गांधी. फोटो सोर्स- द बेटर इंडिया

नील की खेती से जुड़ी महिलाओं को संबोधित करते गांधी. फोटो सोर्स- द बेटर इंडिया

पटना पहुंचने पर गांधीजी और राजकुमार शुक्ल का कोई संपर्क या मददगार नहीं था. तब गांधीजी को याद आई, उनके साथ इंग्लैंड में पढ़ने वाले वकीलों की. उन्हीं में से एक के घर पहुंचे और आगे चल कर ये वकील आजादी की लड़ाई के बड़े नेता बने. उनका नाम था मौलाना मजहरुल हक. गांधी जी के साथ धीरे-धीरे दूसरे बड़े वकील भी आ गए. इनमें राजेंद्र प्रसाद भी थे, जो आजाद भारत के पहले राष्ट्रपति बने.

उन्हीं की तरह रुतबे वाले और लोग भी गांधी जी के पीछे चंपारण पहुंच गए. ब्रजकिशोर प्रसाद, हसन इमाम, धरणीधर प्रसाद और शंभू शरण. कुछ बड़े वकील तो एक मामले में कानूनी सलाह के लिए 10,000 रुपये तक लेते थे. ऐसे साधन-संपन्न और गुणवान लोग अब गरीब किसानों की सेवा में लग गए थे.

जब धनी लोग निर्धन इलाके में आते हैं, तो उनका रहन-सहन गरीब लोगों के लिए अजूबा होता है. इन रईस वकीलों के कई नौकर-चाकर उनके साथ चलते थे. कोई भोजन पकाता, कोई देह दबाता, कोई कपड़े धोकर इस्त्री करता, कोई पंखा झलता. इनका खाना-पीना भी रईसों वाला होता था. पूरे साहब बहादुरों वाले ठाठ थे. जाति की छुआछूत भी खूब थी. गांधी जी के प्रभाव में यह सब बहुत जल्दी बदल गया.

गांधी जी सबका भोजन एक साथ बनवाने लगे. रसोई की जिम्मेदारी अनुग्रह नारायण सिन्हा को सौंप दी गई, जो आजादी के बाद बिहार के उप-मुख्यमंत्री चुने गए थे. भोजन सादा हो गया, उस पर खर्च कम होने लगा, छुआछूत खत्म हो गई और किसानों की निलहों से मुक्ति का काम और तेजी से होने लगा.

जीवतराम कृपलानी गांधी जी के बिहार में शुरुआती सहयोगी में से थे. वे गांधी जी की ही तरह सादा जीवन जीते थे और बाद में आचार्य कृपलानी के नाम से मशहूर हुए. चंपारण में एक बार एक छोटे से मामले में अंग्रेज सरकार ने पलानी जी पर शांति भंग करने का मुकदमा लगा दिया, जिसमें गवाह पुलिस के आला अफसर थे. कई वकील थे उनका मुकदमा लड़ने के लिए, लेकिन गांधी जी ने उन्हें मना किया. उन्होंने कृपलानी जी से 15 दिन की जेल की सजा काटने के लिए कहा. कयों? क्योंकि गांधीजी ने समझ लिया था कि चंपारण के लोग जेल जाने से बहुत डरते हैं. अगर कृपलानी जी जेल जाएंगे, तो लोगों के मन से जेल का आतंक कम होगा. गांधी जी मिट्टी से इंसान बना देते थे, आचार्य कृपलानी जी ने बाद में लिखा था.

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तो इस प्रकार गांधी जी ने अपने कामों से लोगों को संदेश दिया. गांधी जी के विचार को कहानी के माध्यम से नई पीढ़ी तक पहुंचाएंगे. अब ‘बापू आपके द्वार’ अभियान के जरिये लोगों तक बापू के विचारों को पहुंचाने का काम हमलोग करेंगे. गांधी जी के विचारों के प्रति हमारी प्रतिबद्धता है. 10 अप्रैल 1917 को गांधी जी चंपारण जाने के लिए आए थे, उसके ठीक सौ साल बाद अप्रैल 2016 में बिहार में शराबबंदी लागू की गई क्योंकि गांधी जी शराब के खिलाफ थे और इसके पक्ष में थे कि शराबबंदी होना चाहिए और लगातार इसके लिए कोशिश करते थे. हमें लगा कि गांधी जी के चम्पारण सत्याग्रह का जब शताब्दी वर्ष मनाएंगे तो सिर्फ मीटिंग वगैरह करके, स्मारक बनवा कर काम नहीं चलेगा, कुछ और काम तो करना पड़ेगा इसलिए हमलोगों ने अप्रैल 2016 से शराबबंदी बिहार में लागू की.

गांधी जी की विचारों के प्रति हम सब लोगों में प्रतिबद्धता है और शराबबंदी होने से समाज में कितना बड़ा फर्क आया है. सामाजिक परिवर्तन की बुनियाद रखी गयी है. घर-परिवार में जो कोलाहल था, महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकार होती थीं, यह सब आज बदल गया है. महिलाएं कितनी प्रसन्न हैं और अब जो पीने के आदि भी थे, उनका भी पीना बंद हो गया है, अब उनके भी चेहरे खिले हुए हैं और खुशी का भाव है. चंद लोग ही ऐसे हैं, जिनके पास ज्यादा धन है या जो ज्यादा पढ़े-लिखे है, वे इसे अपनी आजादी से जोड़कर देखते है. इसका आजादी से कोई संबंध नहीं है.

माननीय सर्वोच्च न्यायालय का भी फैसला आया है कि शराब पीना या शराब का कारोबार करना किसी का मौलिक अधिकार नहीं है, फिर भी कुछ लोग अपनी लिबर्टी से इसको जोड़कर देखते हैं. शराबबंदी का कितना प्रभाव समाज पर पड़ा है, जिन घरों में दो-ढाई सौ की आमदनी थी, शराब में पैसा गवां देते थे, परिवार उलझन में रहते थे, लेकिन अब शराबबंदी के बाद स्थिति बेहतर हुई है. जो महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकार थीं, आज चैन का जीवन जी रही हैं. अब हम शराबबंदी से नशामुक्ति की ओर जा रहे हैं. 21 जनवरी 2017 को जो मानव श्रृंखला बनी, उसमें चार करोड़ लोगों ने हिस्सा लिया, यह कोई मामूली बात नहीं है. दुनिया में इतनी बड़ी मानव श्रृंखला आज तक नहीं बनी.

शराबबंदी और नशामुक्ति के पक्ष में यह लोगों के भावना का प्रकटीकरण है. यहां के लोगों का भाव है कि समाज में शराबबंदी और नषामुक्ति होना चाहिए. जहां बिहार में 12 करोड़ से कम की आबादी है, वहां 4 करोड़ लोग मानव श्रृंखला में सम्मिलित हुए, यह बहुत बड़ी बात है. यह अभियान निरंतर चलते रहना चाहिए क्योंकि सड़कों पर लिखा रहता है कि सावधानी हटी, दुर्घटना घटी. अगर सजग और सचेत नहीं रहिएगा तो पता नहीं लोग कब फिर से पीने लगे और अगर पीने को नहीं मिलेगा तो कोई नशीला पदार्थ खाने लगेंगे, इसलिए इस अभियान को निरंतर चलाते रहना होगा. इससे सामाजिक परिवर्तन की बुनियाद पड़ गई है. अब बुनियाद मजबूत हो रही है तो हमलोगों को लगा कि अब आगे बढ़ना चाहिए.

हम गांधी जी के चम्पारण सत्याग्रह के शताब्दी वर्ष मना रहे हैं तो ऐसी स्थिति में गांधी जी के विचारों को हमें अपनाना ही पड़ेगा. अब हमलोगों ने सामाजिक कुरीति बाल-विवाह और दहेज-प्रथा से लोगों को छुटकारा दिलाने का तय किया है और इसको लेकर अभियान की शुरुआत भी हो चुकी है. दहेज प्रथा एवं बाल विवाह को लेकर पहले से ही कानून बना हुआ है. 18 साल से कम उम्र की लड़की और 21 साल से कम उम्र के लड़के की शादी वर्जित है, लेकिन बिहार में जो शादियां होती है, उसमे 39 प्रतिशत शादियां बाल-विवाह होता है. बाल-विवाह होने से विभिन्न प्रकार की समस्याएं पैदा होती है, कम उम्र में शादी होने पर यदि महिला गर्भवती हो गयी तो ऐसी स्थिति में बहुत महिलाएं मौत की शिकार हो जाती हैं. ऐसे में गर्भ से उत्पन्न बच्चों में भी कई तरह की परेशानियां उत्पन्न होती है.

एडवोकेट गोरखप्रसाद का वो घर जहां गांधी पहली बार रुके थे. फोटो सोर्स- द बेटर इंडिया

एडवोकेट गोरखप्रसाद का वो घर जहां गांधी पहली बार रुके थे. फोटो सोर्स- द बेटर इंडिया

आपको बता दूं कि हमारी नई पीढ़ी के लोग बौनेपन का शिकार हो रहें हैं. बौनेपन की जो समस्या है, उसका एक बहुत बड़ा कारण बाल-विवाह. ऐसी स्थिति में बाल-विवाह के खिलाफ जागृति लानी होगी. बिहार में महिलाओं के प्रति अपराध कम है. भारत सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा हर वर्ष अपराध के आंकड़ों को प्रकाशित किया जाता है, जिसमे बिहार 26वें नम्बर पर है लेकिन दहेज हत्या के मामले में बिहार उतर प्रदेश के बाद दूसरे नम्बर पर है. यह सोचकर तकलीफ होती है. दहेज उत्पीड़न की वही हालत है. दहेज प्रथा एक सामाजिक बुराई है, जिसके लिए कानून भी बना हुआ है, फिर भी हो रहा है और दहेज प्रथा का प्रचलन अब नीचे तबकों की ओर भी बढ़ रहा है. महिलाएं इसकी शिकार हो रही हैं और दहेज-प्रथा के कारण ही बाल-विवाह को बढ़ावा मिल रहा है.

लोगों को लगता है कि हमारी लड़की बड़ी हो रही है दहेज कहा से देंगे, ऐसे में बाल-विवाह और दहेज प्रथा दोनों एक दूसरे से जुडी हुई है. इसलिए हमलोगों का संकल्प है कि बाल-विवाह और दहेज प्रथा के खिलाफ सशक्त अभियान चलाएंगे. इस बार बापू जयंती के अवसर पर 2 अक्टूबर से इसकी शुरुआत हो चुकी है. अब इस अभियान को गति देने की आवश्यकता है, तभी सही मायने में बापू के विचारों के प्रति हमारी प्रतिबद्धता पूरी होगी. कर्म से इसको स्वीकार करना है, जुबान से नहीं और बिहार में हमारी प्रतिबद्धता है कि जो विकास का काम है, उसमे भी विकेंद्रीकरण हो.

गांव के लोगों की हर जरूरत पूरी हो इसलिए विकेंद्रीकृत तरीके से काम कर रहे हैं. गांधी जी ने बहुत बड़ी बात कही थी कि हम सब लोगों को पर्यावरण के प्रति भी सजग रहना चाहिए. हम पर्यावरण के साथ इतना छेड़छाड़ कर रहे हैं कि आनेवाले पीढ़ी के जीवन को और दुष्कर बनाते जा रहे हैं. गांधी जी ने कहा था कि यह जो पृथ्वी है वह इंसान के हर जरूरतों को पूरा करने में सक्षम है लेकिन लालच को पूरा करने में सक्षम नहीं है इसलिए मन से लालच को भगाइए.

आज मुझे बेहद खुशी है क्योंकि आज ही सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आया है और सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से जो बाल-विवाह का अभियान हमने चलाया है, मै समझता हूं कि उससे उसे काफी गति मिलेगी और लोग इसे स्वीकार करेंगे. सुप्रीम कोर्ट ने आईपीसी की धारा 375 के अपवाद को असंवैधानिक करार दे दिया है. अगर पति 15 से 18 वर्ष की पत्नी के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाता है तो उसे बलात्कार माना जाएगा, उस पर रेप का मुकदमा चलेगा.

इसलिए यह जन-जन तक पहुंचा देना है कि 18 वर्ष से कम उम्र की लड़की और 21 वर्ष से कम उम्र के लड़के की शादी नहीं करना है. बाल-विवाह और दहेज प्रथा एक कुप्रथा है जिसको हम सामाजिक कुरीति मानते हैं. गांधी जी के प्रति हमारा समर्पण का भाव है शराबबंदी नशामुक्ति का अभियान जारी रखने के साथ-साथ गांधी जी के विचारों को जन-जन तक पहुचाएंगे, जिसे अगर नयी पीढ़ी अपनाएगी तो सचमुच समाज में बदलाव आएगा. बुलंदी के साथ आगे बढ़िये, सत्य और अहिंसा के मार्ग को अपनाइए.

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