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करुणानिधि मेमोरियल: शोक के बीच स्मारक के लिए अदालती दखल पर उठते सवाल

अदालत में देर रात सुनवाई और तुरंत फैसले में करुणानिधि के फिल्मी तिलिस्म का दोहराव ही दिखता है.

Updated On: Aug 08, 2018 02:33 PM IST

Virag Gupta Virag Gupta

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करुणानिधि मेमोरियल: शोक के बीच स्मारक के लिए अदालती दखल पर उठते सवाल

भारतीय राजनीति के वरिष्ठतम राजनेता एम. करुणानिधि के निधन से उपजा शोक, अदालती आदेश के दायरे में सिमट गया. मद्रास हाईकोर्ट के एक्टिंग चीफ जस्टिस ने देर रात सुनवाई के बाद चेन्नई के मरीना बीच में करुणानिधि के अंतिम संस्कार और स्मारक के लिए रास्ता साफ कर दिया. अदालत में देर रात सुनवाई और तुरंत फैसले में करुणानिधि के फिल्मी तिलिस्म का दोहराव ही दिखता है. इस फैसले से अनेक सवाल खड़े हो गए हैं.

पूर्व चीफ जस्टिस का आदेश हुआ बेमानी

मद्रास हाई कोर्ट की पूर्व चीफ जस्टिस इन्दिरा बनर्जी अब सुप्रीम कोर्ट की जज बन गई हैं. चेन्नई का मरीना बीच विश्व के सबसे बड़े नगरीय समुद्र तटों में से एक है. सीआरजेड नियमों का उल्लघंन करके समुद्रतट पर स्मारकों के निर्माण पर जस्टिस बनर्जी ने गंभीर आपत्ति जाहिर की थी, इसके बावजूद यह आदेश कैसे पारित हुआ?

तमिलनाडु सरकार की नीति को हाईकोर्ट ने क्यों बदला?

इस मामले पर सुनवाई के दौरान सरकार की तरफ से पेश वकीलों ने कहा कि मरीना बीच पर अन्ना दुराई और एमजी रामचन्द्रन के स्मारक हैं. वर्तमान मुख्यमंत्रियों के निधन पर ही स्मारक बनाने के नियम के तहत ही, एमजीआर की पत्नी जानकी राम चन्द्रन को पूर्व मुख्यमंत्री होने के बावजूद मरीना बीच में स्मारक के लिए स्थान नहीं दिया गया, तो फिर पूर्व मुख्यमंत्री करुणानिधि के लिए अपवाद क्यों ?

रातों-रात पुरानी पीआईएल कैसे रद्द हुई?

मरीना बीच पर स्मारकों के निर्माण के खिलाफ ट्रैफिक रामास्वामी, पीएमके नेता बालू और दोरई स्वामी की ओर से फाइल अनेक पीआईएल मद्रास हाईकोर्ट में लंबित थे. करुणानिधि के मामले पर फैसला देने के लिए पुराने मामलों को रातों-रात वापस लिया गया. पुरानी याचिकाओं में उठाए गए कानूनी बिंदु और आपत्तियां रातों-रात कैसे निरर्थक हो गईं? यदि ऐसा है तो फिर राजनीतिक कारणों से दायर की गई जनहित याचिकाओं पर अदालतों को विचार ही क्यों करना चाहिए?

आधी-रात को सुनवाई के लिए क्या हैं नियम?

मई 2018 में कर्नाटक में राष्ट्रपति शासन और जुलाई 2015 में याकूब मेमन की फांसी को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे आधी रात को खुले थे. आधी रात को सुनवाई के और भी मामले हैं. अयोध्या में विवादित ढांचा गिरने के दौरान 6-7 दिसंबर 1992 को तत्कालीन जज वेंकटचलैया ने देर रात तक सुनवाई की थी. रंगा-बिल्ला और निठारी कांड के अभियुक्त सुरेंद्र कोहली को फांसी के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने देर रात सुनवाई की थी.

सबसे आश्चर्यजनक मामला उद्योगपति एल. एम. थापर का था जिन्हें फेरा के आपराधिक मामले में 1985 में तत्कालीन चीफ जस्टिस द्वारा आधी रात की सुनवाई के बाद जमानत दे दी गई. करुणानिधि और जयललिता जैसे नेताओं के करोड़ों समर्थकों और भारतवासियों को इसी तरह से आधी रात को अदालतों से तुरंत न्याय यदि मिल जाए तो फिर संविधान के अनुच्छेद-14 के तहत बराबरी का स्वप्न साकार हो जायेगा.

मद्रास हाईकोर्ट में सभी नियमों को तिलांजलि

फाइलिंग, सर्विस, नोटिस, जवाब और गवाही की जटिल प्रक्रियाओं की वजह से देश में तीन करोड़ से ज्यादा मुकदमे लंबित हैं. करुणानिधि के स्मारक हेतु राज्य सरकार ने गांधी मंडपम के पास दो एकड़ जमीन आवंटित कर दी थी. मरीना बीच में करुणानिधि के स्मारक को अस्वीकार करने के लिए सरकार ने कोई आदेश ही नहीं जारी किया तो फिर किस कानून के तहत इस मामले में हाईकोर्ट द्वारा सुनवाई की गई? सवाल यह है कि अनुच्छेद-14 के तहत सभी नागरिकों को बराबरी की बात, संविधान के पन्नों में ही क्यों कैद है?

दिल्ली में स्मारकों की राजनीति बंद तो राज्यों में खेल शुरू

दिल्ली में राजघाट के करीब 240 एकड़ के इलाके में लगभग 15 समाधियां हैं. राजघाट में महात्मा गांधी, शांति वन में जवाहरलाल नेहरु व संजय गांधी, विजय घाट में लाल बहादुर शास्त्री व उनकी पत्नी, शक्तिस्थल में इन्दिरा गांधी, वीरभूमि में राजीव गांधी, किसान घाट में चरण सिंह, संघर्ष स्थल में देवीलाल, समता स्थल में बाबू जगजीवन राम, एकता स्थल में ज्ञानी जैल सिंह, उदय भूमि में के.आर. नारायणन, स्मृति स्थल में चन्द्रशेखर, डॉ. शंकरलाल शर्मा और आर. वेंकटरमन की समाधि स्थल बने हुए हैं.

सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद सरकार ने यहां पर और निर्माण करने पर रोक लगा दी, लेकिन राज्यों में जनता के पैसे से नेताओं का खेल बदस्तूर जारी है. मुंबई में शिवाजी पार्क में बाल ठाकरे का स्मारक और उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में अनेक स्मारक ऐसी ही कुछ बानगी हैं.

नास्तिक करुणानिधि को देवत्व का दर्जा देकर, मरीना बीच के स्मारक से राजनीति का झंडा बुलंद ही होगा. आम जनता को जीने का अधिकार भले ही ना हो लेकिन रसूखदारों के लिए मौत के बाद भी अदालतों के दरवाजे आधी रात को आगे भी खुलते रहेंगे.

(लेखक सुप्रीम कोर्ट में वकील हैं.)

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