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भारत में महाभियोग का इतिहास: पहले भी शुरुआती चरण में खारिज हो चुके हैं प्रस्ताव

ये पहली बार नहीं है जब जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग पर कार्यवाही की गई हो, इससे पहले भी कई न्यायधीशों के साथ ऐसा हो चुका है

Updated On: Apr 24, 2018 01:21 PM IST

Bhasha

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भारत में महाभियोग का इतिहास: पहले भी शुरुआती चरण में खारिज हो चुके हैं प्रस्ताव
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भारत के चीफ जस्टिस ( सीजेआई ) दीपक मिश्रा के खिलाफ विपक्ष के महाभियोग नोटिस को राज्यसभा के सभापति एम वेंकैया नायडू द्वारा शुरूआती चरण में खारिज किए जाने जैसा वाकया करीब पांच दशक पहले हुआ था जब सुप्रीम कोर्ट के एक जस्टिस को पहली बार ऐसे कदम का सामना करना पड़ा था.

पूर्व सरकारी सेवक ओ पी गुप्ता की एक मुहिम के बाद मई 1970 में लोकसभा स्पीकर जी एस ढिल्लों को न्यायमूर्ति जे सी शाह के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव सौंपा गया था. गुप्ता ने शाह पर तब बेईमानी का आरोप लगाया था जब जज ने एक सुनवाई के दौरान उनके खिलाफ कुछ टिप्पणियां की थी. बहरहाल,स्पीकर ने नोटिस को ‘महत्वहीन’ करार देकर खारिज कर दिया था.

जब जस्टिस जे बी पारदीवाला पर लगा था आरक्षण के खिलाफ ‘असंवैधानिक’ टिप्पणी करने का आरोप 

सीजेआई मिश्रा और न्यायमूर्ति शाह के खिलाफ शुरूआती चरण में ही नोटिस खारिज होने के मामलों के अलावा एक अन्य ऐसा मामला है जब राज्यसभा के 58 सदस्यों ने 2015 में गुजरात हाई कोर्ट  के जस्टिस जे बी पारदीवाला के खिलाफ राज्यसभा के तत्कालीन सभापति हामिद अंसारी के समक्ष एक याचिका दी थी जिसमें पारदीवाला पर आरक्षण के खिलाफ ‘असंवैधानिक’ टिप्पणी करने का आरोप था.

अपने खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव की संभावना देखते हुए न्यायमूर्ति पारदीवाला ने आरक्षण के खिलाफ अपनी टिप्पणियों को रिकॉर्ड से हटवा दिया था. उन्होंने पाटीदार नेता हार्दिक पटेल से जुड़े एक केस में आरक्षण के खिलाफ कथित टिप्पणी की थी.

बाद में पारदीवाला के खिलाफ महाभियोग के नोटिस पर आगे की कोई कार्यवाही नहीं की गई थी.

1993 में की गई थी महाभियोग पर कार्यवाही

संसद में न्यायाधीशों के खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही में प्रगति 1993 में पहली बार तब हुई थी जब सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस वी रामास्वामी को एक जांच आयोग की रिपोर्ट के बाद भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना करना पड़ा था. वरिष्ठ वकील और कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य कपिल सिब्बल ने उस वक्त लोकसभा में रामास्वामी का जोरदार बचाव किया था.

सीजेआई दीपक मिश्रा पर महाभियोग चलाने की मुहिम में सिब्बल अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं.

पी वी नरसिंह राव सरकार के दौरान लाया गया महाभियोग प्रस्ताव लोकसभा में विफल हो गया था , क्योंकि उसे संविधान के अनुच्छेद 124 (4) के तहत जरूरी सदन के दो - तिहाई सदस्यों का समर्थन प्राप्त नहीं हो पाया था.

2011 में जस्टिस सौमित्र सेन के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव

जस्टिस रामास्वामी के अलावा , 2011 में कलकत्ता हाई कोर्ट के जस्टिस सौमित्र सेन के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था. उन पर एक जस्टिस के रूप में वित्तीय गबन और गलत तथ्यों को पेश करने के आरोप थे. उनके खिलाफ लाया गया प्रस्ताव राज्यसभा में पारित हो गया और राज्यसभा में अपना बचाव करने वाले सेन को जब नतीजे का आभास हो गया तो लोकसभा में प्रस्ताव पर चर्चा से पहले ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया.

सिक्किम हाई कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति पी डी दिनाकरण ने 2011 में महाभियोग की कार्यवाही शुरू होने से पहले ही इस्तीफा दे दिया था. उन्हें एक जांच समिति ने जमीन हड़पने , भ्रष्टाचार और न्यायिक पद का दुरूपयोग करने का दोषी पाया था. जब उन्होंने छुट्टी पर जाने के आदेश का पालन नहीं किया तो कर्नाटक हाई कोर्ट से उनका तबादला सिक्किम हाई कोर्ट में कर दिया गया था.

2016 में  न्यायमूर्ति नागार्जुन रेड्डी  के खिलाफ महाभियोग

साल 2016 में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति नागार्जुन रेड्डी उस वक्त चर्चा में आए थे जब राज्यसभा के 61 सदस्यों ने एक ‘दलित’ न्यायाधीश को ‘प्रताड़ित’ करने के आरोप में उनके खिलाफ महाभियोग चलाने के लिए याचिका दी थी.

बाद में राज्यसभा के उन 54 में से 9 सदस्यों ने अपने दस्तखत वापस ले लिए थे जिन्होंने उनके खिलाफ कार्यवाही शुरू करने का प्रस्ताव दिया था.

पिछले साल राज्यसभा द्वारा गठित एक समिति ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के एक सेवारत न्यायाधीश को एक न्यायिक अधिकारी के कथित यौन उत्पीड़न के मामले में छानबीन के बाद क्लीन चिट दे दी थी.

राज्यसभा के तत्कालीन सभापति हामिद अंसारी ने उसुप्रीम कोर्ट की जस्टिस  आर भानुमति , जस्टिस   मंजुला चेल्लूर और न्यायविद के के वेणुगोपाल की समिति अप्रैल 2015 में गठित की गई थी. न्यायमूर्ति एस के गंगेले पर महाभियोग चलाने को लेकर राज्यसभा के 58 सदस्यों की ओर से दिया गया प्रस्ताव स्वीकार करने के बाद अंसारी ने यह जांच कराई थी.

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