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एटम बम से भारत ही क्यों डरता है?

भारत को बलूच, सिंधियों, कश्मीरियों और पख्तूनों को मजबूत करने की रणनीति बनानी होगी.

Updated On: Dec 04, 2016 08:26 AM IST

Tufail Ahmad Tufail Ahmad

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एटम बम से भारत ही क्यों डरता है?

भारतीयों का दिमाग सिर्फ अध्यात्मिकता में लीन रहता है. वे मान कर चलते हैं कि सब अच्छा है. उसे वो कड़वी और कठोर सच्चाई नहीं दिखती जो अनेक राष्ट्रों वाली इस व्यवस्था में निहित हैं. हर भारतीय एक योग गुरु है. हर योग गुरु, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल हैं. वे यह सोचते हैं कि बिना कोई घाव खाए, भारत को महान शक्ति बना देगा. विभिन्न देशों वाला अंतरराष्ट्रीय समाज खतरनाक जगह है.

यही खतरा 18 सितंबर को उस समय दिखाई दिया जब उड़ी में भारतीय सेना के कैंप पर हुए हमले में भारत के 18 सैनिक मारे गए और दर्जनों घायल हो गए. पाकिस्तान ने इस हमले की योजना बनाई, उसे प्रायोजित किया और अंजाम तक पहुंचाया. यह हमारा चिरपरिचित दुश्मन है. चिरपरिचित दुश्मन हम पर चिरपरिचित तरीकों से और चिरपरिचिति जगहों पर हमला करता है.

हमें पढ़ाया गया है कि महमूद गजनी ने 1000 से 1027 ई. तक भारत के विभिन्न शहरों पर 17 बार हमला किया, चिरपरिचित तरीकों से, चिरपरिचित रास्तों से और आखिरी हमले में गुजरात के सोमनाथ मंदिर पर कब्जा कर लिया. लेकिन हमें यह नहीं पढ़ाया जाता कि हमने हर बार उसके हमले का इंतजार किया, हम उसे रोकने, काबू करने, उससे लड़ने, उसे खत्म करने के लिए अपनी सीमाओं के पार नहीं गए.

इतिहास में आपको ऐसी मिसालें नहीं मिलेंगी कि जब एक चिरपरिचित दुश्मन ने पूरी जनता को इतनी बार परेशान किया और इसका लोगों ने कोई जवाब नहीं दिया. महमूद गजनी की तरह चिरपरिचित दुश्मन पाकिस्तान भी हमें हर बार जम्मू-कश्मीर में पीड़ा देता है. हर बार हमें पहले से खुफिया जानकारी पता होती है. हर बार हम इंतजार करते हैं. हर बार, हम जवाब देने की योजना नहीं बनाते.

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लापरवाही की कीमत

18 सितंबर का उड़ी हमला शायद 14 मई 2002 के कालूचक हमले के बाद सबसे घातक पाकिस्तानी हमला है. कालूचक हमले में तीन सैनिक, भारतीयों सैनिकों के 18 परिजन और दस आम लोग मारे गए थे. इस साल 2 जनवरी को दुश्मन ने पठानकोट में भारतीय वायुसेना के बेस पर धावा बोला, जिसमें सात सैनिक मारे गए. दुश्मन ऐसा इसलिए कर पाया क्योंकि पंजाब में भारतीय पुलिस के कर्मचारी ड्रग्स के अवैध कारोबार के जरिए पैसा कमाने के लिए दुश्मन से मिले हुए थे.

ऐसे हमले जम्मू कश्मीर में नियमित रूप से होते रहे हैं. 1999 में करगिल में घुसपैठ करके, पाकिस्तान ने मौजूदा दौर के सबसे बड़े जिहादी युद्ध को अंजाम दिया और हम जनरल परवेज मुशर्रफ को बिरयानी परोसने में लगे थे. भारत और पाकिस्तान दोनों के पास परमाणु बम हैं. लेकिन इससे खतरा सिर्फ भारतीय ही महसूस करते हैं.

दुश्मन पाकिस्तान को आधुनिक दौर के हिसाब से चोला बदलना खूब आता है. जिन आतंकवादियों का वह समर्थन करता है, उन्हें वह ‘नॉन स्टेट एक्टर्स’ कहता है और दुनिया उसकी बात पर भरोसा कर लेती है. वह अपने आतंकवादियों को ‘अच्छे तालिबानी’ कहता है. वह यूरोपियों और अमेरिकियों को यह बताने में सालों लगा देता है कि यहां ‘अच्छे’ का मतलब बुरे से है.

वह एक लेखक को दिल्ली में सूफी दरगाह पर किताब लिखने के लिए भेजता है. भारतीय इस लेखक के ऊपर भरोसा करते हैं. इस किताब का शीर्षक डेल्ही बाय हर्ट इंटर सर्विसेज इंटेलीजेंस (आईएसआई) ने दिया, जिसने जैश ए मोहम्मद, लश्कर ए तैयबा और तालिबान को खड़ा किया है. इस किताब का मकसद इसके लेखक को ट्रैक 2 कूटनीति में दाखिल करना था.

दुश्मन ने साड़ी भेजी, अपने दुश्मन के नेता की मां के लिए. इस साड़ी की कीमत थी: सात सैनिक जो पठानकोट में मारे गए और वह आघात जो एक सौ पच्चीस करोड़ भारतीयों के आत्मविश्वास को लगा. लड़ाई में अपनी चाल को दुश्मन के बचाव के अनुरूप ढाल लेना सफल रणनीति होती है. पाकिस्तान इस काम में माहिर है.

घुसपैठ के बीज

1971 के बांग्लादेश युद्ध में आत्मसमर्पण करने वाले पाकिस्तानी सेना के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल ए.ए.के नियाजी दूसरे विश्व युद्ध में बर्मा के मोर्चे पर तैनात थे. 1964 में जब वह ब्रिगेडियर थे, तब उन्होंने कहा था कि पाकिस्तान जैसे कमजोर देश को घुसपैठ की रणनीति पर निर्भर रहना होगा, इसका ‘मतलब है कि छोटे-छोटे दस्तों में दुश्मन की चौकियों से आगे बढ़ जाना. ये दस्ते एक पूर्व निर्धारित लक्ष्य के साथ उनके इलाके में अंदर तक घुस जाएं’ या ‘दुश्मन के इलाके में लेट जाएं और जरूरत पड़े तो कुछ समय तक वहीं रहें.’ नियाजी ने कहा, ‘हमारे जैसे कम विकसित देश के लिए इस तरह (घुसपैठ) की रणनीति को अपनाना बहुत जरूरी है.’ नियाजी की रणनीति और पाकिस्तानी सेना की जिहादी मानसिकता का विस्तृत ब्यौरा सी. क्रिस्टीन फेयर ने अपनी किताब फाइटिंग टू द एंड: द पाकिस्तानी आर्मीज वे ऑफ वॉर में दिया है.

पाकिस्तान ने हमेशा घुसपैठ की इस रणनीति और गुरिल्ला युद्ध का इस्तेमाल किया है. बात चाहे 1965 के युद्ध की वजह बना ऑपरेशन जिब्राल्टर की हो, 1999 के करगिल युद्ध की हो, 26/11 के मुंबई हमलों की हो या फिर इंडियन मुजाहिदीन के जरिए भारत के अलग-अलग हिस्सों में कराए जाने वाले अन्य हमलों की. लगातार तीन दशकों से जम्मू कश्मीर में भी पाकिस्तान इस रणनीति पर अमल कर रहा है.

दुश्मन के व्यवहार से हम अच्छी तरह परिचित हैं, उसकी रणनीति हमें पता है. अगर भारत, कश्मीर पाकिस्तान को दे भी दो तो दुश्मन की फितरत ऐसी है कि वह भारत के अन्य क्षेत्रों को निशाना बनाना शुरू कर देगा. इस दुश्मन को जानने के बावजूद, इससे निपटने की भारत की रणनीति तैयार नहीं है. न तो वह हमें पता है, न वह प्रभावी है और न ही परिमाण देने वाली है. लेकिन महमूद गजनी की तरह दुश्मन बार-बार हमला करेगा. ये रणनीति इस्लामी अतीत का हिस्सा है.

शाहीन मिसाइल

पाकिस्तानी मिसाइल शाहीन

पहला इस्लामी हमलावर

एक भारतीय-पाकिस्तानी मार्क्सवादी सिब्ते हसन (1912-1986) अपनी किताब ‘पाकिस्तान में तहजीब का इरतिका’ में लिखते हैं कि कैसे मोहम्मद बिन कासिम भारत का पहला इस्लामी आक्रमणकारी नहीं था.

सिंध और बलूचिस्तान पर पहला इस्लामी हमला इस्लाम के दूसरे खलीफा उमर बिन खतब के दौर में हुआ था. खलीफा उमर ने 634 से 644 ई. तक राज किया था.

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट सिब्ते हसन लिखते है कि उमर की अनुमति तो नहीं ली गई थी लेकिन उस वक्त बहरीन के एक गवर्नर की मंजूरी से यह पहला हमला किया गया और इसका नेतृत्व मुगीरा इब्न अबी अल-आस ने किया और कराची के पास देवल में बंदरगाह को निशाना बनाया गया था. 644 से 656 ई. तक राज करने वाले तीसरे इस्लामी खलीफा उस्मान बिन अफान ने सिंध पर हमला करने के बारे में सोचा. उस समय बलूचिस्तान के एक हिस्से मकरान पर पहले ही एक मुसलमान गवर्नर का राज था.

जब उमायाद वंश के पहले शासक मुआवियाह इब्न अबी सूफयान (शासन 661 से 680 ई.) खलीफा बने तो उन्होंने कई बार अपनी सेना को अभियान पर भेजा. इन अभियानों का नेतृत्व अब्दुल्लाह बिन सावर अब्दी, राशिद बिन उमरू, सनन बिन सलमाह को दिया गया था. लेकिन सभी अभियानों में हार हाथ लगी.

सिब्ते हसन लिखते हैं कि जब हजाज बिन यूसुफ 694 ई. में इराक के गवर्नर बने तो उन्होंने फिर से सिंध को जीतने का फैसला किया और अपने दामाद मोहम्मद बिन कासिम को इस आक्रमण का नेतृत्व करने के लिए चुना. कासिम ने 712 से 715 ईसवी के बीच कई विजय हासिल कीं. मोहम्मद बिन कासिम से पहले और उसके बाद मुसलमान विजेताओं ने नए इलाकों को फतह करने का सिलसिला रुका नहीं क्योंकि इस्लाम मुसलानों से पूरी दुनिया जीतने के लिए कहता है.

कुरान की आयत 8:39 कहती है

‘तब तक लड़ाई करो जब तक फितना खत्म न हो जाए और वहां सिर्फ अल्लाह का धर्म कायम न हो जाए.’

फितना शब्द का अनुवाद बुराई होता है, लेकिन इस्लामी साहित्य में इसका इस्तेमाल हर उस चीज के लिए होता है जो गैर-इस्लामी है. ‘लड़ाई’ के लिए इस आयत में कत्ले-हुम शब्द का इस्तेमाल किया गया है जिसका अर्थ होता है, ‘उनकी हत्या कर दो.’

कुरान की आयत से खिलवाड़

कश्मीर विवाद आज पाकिस्तान की धार्मिक पहचान से जुड़ गया है. कलमा यानी इस्लाम में किसी व्यक्ति के विश्वास को प्रदर्शित करने वाले शब्द हैं: ‘ला इलाहा इल्ललाह मुहम्मद-उर-रसूलुल्लाह.’ इसका अनुवाद होता है: अल्लाह के अलावा कोई और ईश्वर नहीं है और मुहम्मद उसके संदेशवाहक हैं.

लेकिन पाकिस्तान में मौलवियों ने इसका अलग ही अनुवाद किया है और पाकिस्तानी लोगों में ये बहुत प्रचलित है: ‘पाकिस्तान का मतलब क्या, फिर लोग कहते हैं- ला इलाहा इल्ललाह मुहम्मद-उर-रसूलुल्लाह .’ दुनिया में किसी जगह कलमा का इस तरह अनुवाद नहीं हुआ है. जब तक पाकिस्तान की पहचान को लेकर बड़े बदलाव नहीं होंगे तब तक बहुत मुमकिन है कि वह खुद को मुस्लिम उम्मा का रखवाला समझता रहेगा.

पाकिस्तान में आम तौर पर यह समझा है कि पाकिस्तान की सीमाएं दो तरह की हैं: एक भौगोलिक और दूसरी वैचारिक. आईएसआई आतंकवादी गुटों को खड़ा करती है, उनकी परवरिश करती है और उनकी रक्षा करती है, यह आईएसआई खुद को पाकिस्तान का वैचारिक रखवाला कहती है.

पाकिस्तान इस्लाम के नाम पर बना दूसरा देश है, पहला मदीना था.

बलूच विद्रोही

पाकिस्तान सेना के खिलाफ लड़ते बलूच विद्रोही

दुश्मन के दिल पर करना होगा चोट

भारत के लोगों के यह बात स्वीकार करनी होगी कि जब तक पाकिस्तान अपनी मौजूदा पहचान को बरकरार रखेगा, तब तक कश्मीर में जिहादी हमले होते रहेंगे. भारतीय राज्य को अपने चिरपरिचित दुश्मन के खिलाफ 100 साल वाली एक रणनीति तैयार करनी होगी. भारत को वैसी ही रणनीति अपनानी होगी जैसी हमारे गांव में पड़ोसी व्यवहार करते हैं. जब आपका पड़ोसी आपको नुकसान पहुंचाता है तो आप उससे आंख मिलाना छोड़ देते हैं और उसकी शादी में भी हिस्सा नहीं लेते हैं. जब पड़ोसी आपकी जमीन का अतिक्रमण करने लगता है तो आपको उसे पीछे धकेलते हैं. जब पड़ोसी आपकी जमीन पर कब्जा करता है तो आप उसकी नाक तोड़ देते हैं.

पाकिस्तान के मामले में थोड़ा का अंतर है. यह दुश्मन चुप बैठने वाला नहीं है, यहां तक कि खुशी के मौके पर भी नहीं, रजमान में भी नहीं.

भारत को बलूच, सिंधियों, कश्मीरियों और पख्तूनों को मजबूत बनाने की रणनीति बनानी होगी. साथ ही एक रणनीति दुश्मन के दिल पर हमला कर पाकिस्तान को तोड़ने की भी तैयार करनी होगी.
पाकिस्तान का यह दिल है, पंजाब का एलीट तबका यानी ठीक सीमा पार का पंजाब.

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